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July 18, 2026

डॉ. पुष्पा खंडूरी की कविता- मैं ख़ुश हूं

मैं ख़ुश हूं बहुत कि अपनी
ख़ुशी की, अब मैं स्वयं ही तलबगार हूं
मुझे चाहत नहीं अब तेरे प्यार की।
मैं तो अपने प्यार की ख़ुद ही अब हकदार हूं।
मेरी जिम्मेदारी अब मैंने उठाई है ख़ुद।
कोई मेरी ख़ुशी के लिए
क्यों जिए अब जबर,
मुझको ज़ीना है अब तो अपनी ख़ुशी के लिए।
मैं ख़ुश हूं कि अपनी ख़ुशी की,
अब मैं स्वयं ही तलबगार हूं।
मेरे सपने भी मेरे हैं, नीदें भी अपनी।
मेरी पलकें ही अब मेरी पहरेदार हैं।
मैंने देखूँ उसे क्यों, जिसे देखकर।
मेरी आँखें आंसू में डूबें , या फिर मैं ग़मखार हूं ।
मैं ख़ुश हूं कि अपनी ख़ुशी की,
अब मैं स्वयं ही तलबगार हूं॥ (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)

हक़ किसी को नहीं अब दिया जानिबे,
जो समझता हो मुझ पर उसका अख़्तियार हो।
निभा ली अब बहुत रस्में क़समें तुम्हारी बनाई हुईं,
अब क़सम ख़ुदा की निभाएंगे सिर्फ,
क़समे वही, जो क़सम हमने ख़ुद से है खाई हुई।
मैं ख़ुश हूं कि अपनी ख़ुशी की,
अब मैं स्वयं ही तलबगार हूं॥
अब दुनिया भी मेरी ही,
हैं दस्तूर भी अपने।
अब हल्फनामे भी मेरे अंदाज़ भी अपना।
अब नहीं किसी और के गुनाह की,
बनूंगी कभी भी मैं हकदार हूं॥
मैं ख़ुश हूँ कि अपनी ख़ुशी की ,
अब मैं स्वयं ही तलबगार हूं॥
कवयित्री की परिचय
डॉ. पुष्पा खंडूरी
प्रोफेसर, डीएवी (पीजी ) कॉलेज
देहरादून, उत्तराखंड।

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