उत्तराखंड कौथिग में पांडव नृत्य और रामलीला के मंचन ने बांधा समा

उत्तराखडं की राजधानी देहरादून स्थित रेंजर्स मैदान में अखिल गढ़वाल सभा की ओर से आयोजित उत्तराखंड कौथिग में पांडव नृत्य और रामलीला के मंचन ने समा बांध दिया। शुक्रवार दोपहर 2.00 बजे पहले सत्र में बच्छणस्यू मंडाण ग्रुप रुद्रप्रयाग ने पाण्डव नृत्य एवं गैंडा वध की प्रस्तुति दी। वहीं, शाम को कुलानंद घनशाला द्वारा गढ़वाली रामलीला का भव्य मंचन किया गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सुबह कार्यक्रम के शुभरम्भ दीप जलाकर हीरो होंडा ग्रुप के अधिकारी पंकज भट्ट व निखिल जी ने कराया।
देवभूमि उत्तराखंड का पौराणिक, ऐतिहासिक, अनुष्ठानिक, लोकनाट्य,पांडव नृत्य एवं गैंडा वध का मंचन अत्यंत शानदार रहा। इसमें पांडवों के पिता महाराज पांडु के श्राद्ध एवं तर्पण की गाथा का दिव्य मंचन किया गया। इस लोकनाट्य में अर्जुन के द्वारा पूर्व दिशा की ओर गैंडे की खोज में प्रस्थान किया जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
मान्यता थी द्वापर युग में सबसे पवित्र गैडे की खगोटी व उसके सींग से पित्रो का तर्पण करना सर्वाधिक सिद्ध उपयोगी माना गया है। इसलिए अर्जुन पिता की तर्पण के लिए पूर्व दिशा की ओर जाता है जहां नागार्जुन का क्षेत्र होता है। अर्जुन को गैडी मिल जाती है जिसका मालिक नागार्जुन था। अर्जुन द्वारा गैडे का वध किया जाता है। इस घटना को जानकर नागार्जुन को अत्यंत क्रोध आता है। नागार्जुन और अर्जुन के मध्य भयंकर युद्ध होता है। इसमें अर्जुन घायल हो जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इसी दौरान नागकन्या का प्रवेश होता है जो अर्जुन की वीरता एवं उसके प्रति अपने प्रेम का संवाद के माध्यम से नागार्जुन को बताती है। यह जानकर नागार्जुन पुनः अर्जुन को सचेत करता है और अंत में नागकन्या एवं अर्जुन का विवाह होता है। इसके उपरांत जब वासुदंता को लेकर अर्जुन हस्तिनापुर आता है । वहा पांडवों के द्वारा अपने पिता महाराज पांडु का श्राद्ध एवं तर्पण किया जाता है। एवं अंत में पांडव आशीर्वाद देकर अपने लोग को चले जाते हैं ।निर्देशन अंकित रावत द्वारा किया गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
60 लोकधुनों, 125 से अधिक पात्रों और 165 दृश्यों से सजी रामलीला
गढ़वाल की लोकसंस्कृति, भाषा और साहित्य के संरक्षण एवं संवर्द्धन के उद्देश्य से शुक्रवार की शाम छह बजे से पंडाल में कुलानंद घनशाला की ओर से गढ़वाली रामलीला का भव्य मंचन किया गया। रेंजर्स ग्राउंड में दर्शकों ने गढ़वाली संवादों, लोकगीतों और चौपाइयों से सजी इस अनूठी प्रस्तुति का भरपूर आनंद लिया। कलाकारों के सशक्त अभिनय और लोकधुनों की मधुरता ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कई दृश्यों पर सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा, तो कुछ प्रसंगों ने दर्शकों को भावुक भी किया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस मंचन की खासियत ये रही कि दस दिनों की रामलीला की कथा को लगभग ढाई घंटे में प्रस्तुत किया गया। इसकी सघन और प्रभावशाली प्रस्तुति का श्रेय लेखक एवं निर्देशक कुलानंद घनशाला के रंगमंचीय अनुभव और निर्देशन कौशल को दिया गया। कार्यक्रम में गढ़वाल सभा अध्यक्ष रोशन धस्माना ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा के साथ सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों को जोड़ना आवश्यक है। मातृभाषा हमारी पहचान है और लोकभाषा का संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सभी का स्वागत करते हुए महासचिव गजेंद्र भंडारी ने कहा कि विद्यार्थियों को सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना भी है। बच्चों को अपनी मातृभाषा का ज्ञान होना बेहद आवश्यक है। गढ़वाली जैसी लोकभाषाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन प्रभावी माध्यम हैं। सांस्कृतिक सचिव उदय शंकर भट्ट ने अपने संबोधन में कहा कि गढ़वाली जैसी लोकभाषाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन प्रभावी माध्यम हैं। उपाध्यक्ष निर्मला बिष्ट ने गढ़वाली रामलीला की प्रशंसा करते हुए इसे लोकसंस्कृति का भव्य सांस्कृतिक अनुष्ठान बताया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस गढ़वाली रामलीला के रचनाकार एवं निर्देशक कुलानंद घनशाला ने कहा कि यह प्रस्तुति उनके पिछले 40 वर्षों के रंगमंचीय और साहित्यिक अनुभवों का परिणाम है। उन्होंने बताया कि इस गढ़वाली रामलीला में गढ़वाल की प्रचलित लोकधुनों का व्यापक प्रयोग किया गया है। इसमें 60 लोकधुनों पर आधारित गीत, दोहे और चौपाइयां शामिल हैं। रामलीला में 450 से अधिक गेय रचनाओं, 125 से अधिक पात्रों और 165 दृश्यों को समाहित किया गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उन्होंने कहा कि यह रामलीला विशिष्ट लोकनाट्य शैली में रची गई है, जिसमें गढ़वाली भाषा और लोकसंगीत के माध्यम से रामकथा को प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुति का संगीत निर्देशन लोकगायक ओम बधानी ने किया। इसके गीत उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायकों ने स्वरबद्ध किए हैं। इनमें नीता कुकरेती, रेखा धस्माना, आशा भट्ट, ओम बधानी, विवेक नौटियाल, चंद्रदत्त सुयाल, अभिनव रावत, राकेश भट्ट, ओमप्रकाश सेमवाल और गिरीश सुंदरियाल प्रमुख हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उल्लेखनीय है कि सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल पिछले कई वर्षों से लोकविरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए विभिन्न सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन करता रहा है। गढ़वाली रामलीला का यह मंचन भी इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा। कार्यक्रम में गढ़वाल सभा की उपाध्यक्ष निर्मला बिष्ट, उदय शंकर भट्ट, अजय जोशी, संतोष गैरोला, वीरेंद्र असवाल, सूर्य प्रकाश भट्ट, के अतिरिक्त देहरादून के अनेक प्रसिद्ध रंगकर्मी, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी मौजूद थे।
नोटः सच का साथ देने में हमारा साथी बनिए। यदि आप लोकसाक्ष्य की खबरों को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए गए आप्शन से हमारे फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ सकते हैं, बस आपको एक क्लिक करना है। यदि खबर अच्छी लगे तो आप फेसबुक या व्हाट्सएप में शेयर भी कर सकते हो। यदि आप अपनी पसंद की खबर शेयर करोगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। बस इतना ख्याल रखिए।

Bhanu Bangwal
लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।






