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July 17, 2026

उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में मंगसीर बग्वाल की धूम, 24 नवंबर तक आयोजन, त्योहार के बारे में बता रहे हैं रामचंद्र नौटियाल

राष्ट्रीय दीपावली के ठीक एक माह बाद उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों के कई गावों में मंगसीर बग्वाल यानी की दीपावली पर्व मनाया जाता है। इसमें खासकर गढवाल क्षेत्र में सम्पूर्ण जनपद उत्तरकाशी, रवाईं जौनपुर, देहरादून जौनसार क्षेत्र, टिहरी के थाती कठूड बुढा केदार आदि क्षेत्रों मे मनाया जाता है। इस पर्व की शुरुआत 22 नवंबर से हो गई है और यह पर्व 24 नवंबर तक चलेगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

वहीं, हिमाचल के पहाडी क्षेत्रों मे भी मंगसीर बगवाल को मनाया जाता है। रवाईं क्षेत्र के बनाल व अन्य हिस्सों में, जिसमें उत्तरकाशी जिले के धनारी फट्टी भण्डारस्यूं के गेंवला गांव इस बग्वाल को द्यूलांग के रूप में को मनाया जाता है। मंगसीर बग्वाल* तीन दिन का कार्यक्रम होता है। पहले दिन छोटी बग्वाल, दूसरे दिन बडी बग्वाल और तीसरे दिन बदराज का त्यौहार होता है। जिसे व्रततोड भी कहा जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इस त्योहार को खास अंदाज में मनाया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों मे एक विशेष प्रकार की घास होती है। इसे उत्तरकाशी क्षेत्र में बाबैं कहा जाता है। यह बहुत मजबूत घास होती है। इसका लगभग गांव की लंबाई के हिसाब से मोटा व मजबूत रस्सा बनाया जाता है। इसे ग्रामीण दो हिस्सों मे बंटकर इसे खींचते हैं। ग्रामीणो का उत्साह इसे खींचते ही बनता है। इस रस्सी को स्थानीय भाषा में व्रत कहते हैं। इस रस्सी को तोड़ने की प्रक्रिया को व्रततोड कहते हैं। इस व्रत की बाकायदा पंडित द्वारा पहले पूजा की जाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कई लोग इस मान्यता को समुद्रमन्थन की पौराणिक गाथा से भी जोडते हैं। गांव घरों मे लोग सफाई करते हैं और स्वांला (पुरी), पकोडी और पापडी बनाते हैं। साथ ही चीड के पेड़ से निकाले गये छिलकों को गोलाई मे एकत्र करके विशेष प्रकार की बेल (लगला) मालू या भीमल की पतली छड़ी के साथ बांधा जाता है। इसे स्थानीय भाषा में बग्वाल्ठा कहते हैं। इसमें आग लगाने के बाद ढोल दमाऊ की थाप पर बेल की रस्सी से इसे सिर के ऊपर घुमाते हैं। साथ ही कहते हैं- भैलो रे बग्वालि भैलो कति पक्वाडा खैलो।(खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

मान्यता है कि जो व्यक्ति अपने सिर के बग्वाल्ठे को घुमाता है, उसके सारे कष्ट दूर होते हैं। राष्ट्रीय दीपावली के ठीक एक माह बाद मंगसीर बग्वाल मनाने के पीछे कई मान्यता हैं। कहा जाता है कि माधो सिंह के तिब्बत विजय के उपलक्ष में मंगसीर बग्वाल मनायी जाती है। दूसरी मान्यता है कि प्रभु श्रीराम के रावण पर विजय प्राप्त करने और अपने स्वदेश अयोध्या लौटने की सूचना पर्वतीय क्षेत्र में ठीक एक माह बाद मिली। ऐसे में यहां एक माह बाद दीपावली मनाई जाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

तीसरी मान्यता यह है कि काश्तकारों का खेतीबाड़ी का काम पूरी तरह निपट जाता है। सर्दी का सीजन आ जाता है। इसे ह्यूंद कहा जाता है। इसलिए इस बग्वाल के उत्सव को मनाया जाता है। कारण चाहे जो भी हो हमे अपनी इस पौराणिक व सांस्कृतिक विरासत को संभाले रखना है। इसके लिए अनघा माऊंटेन संस्था व उत्तरकासी के युवा व जागरुक जन इस पौराणिक व सांस्कृतिक विरासत को कायम रखने के कुछ वर्षों से प्रतिवर्ष जनपद मुख्यालय उत्तरकाशी में मंगसीर बग्वाल का आयोजन करते आ रहे हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

 

लेखक का परिचय
रामचन्द्र नौटियाल राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय गड़थ विकासखंड चिन्यालीसौड, उत्तरकाशी में भाषा के अध्यापक हैं। वह गांव जिब्या पट्टी दशगी जिला उत्तरकाशी उत्तराखंड के निवासी हैं। रामचन्द्र नौटियाल जब हाईस्कूल में ही पढ़ते थे, तब से ही लेखन व सृजन कार्य शुरू कर दिया था। जनपद उत्तरकाशी मे कई साहित्यिक मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं।