पत्रकार दिनेश कुकरेती की उत्तराखंड के हालात बयां करती ग़ज़ल- हाकम की हाकिमी में जाहिल भी तर गए
हाकम की हाकिमी में जाहिल भी तर गए,सपने हमारे आंखों ही आंखों में मर गए।
हम सोचते रहे कि न्याय हमको मिलेगा,
वो चुपके-चुपके अपनों पे उपकार कर गए।
जब बोलना था, होंठ अपने सी दिए हमने,
मुश्किल से खुले होंठ तो अब वो मुकर गए।
तब लाठियों और गोलियों से हम नहीं डरे
अब क्यों सफेदपोश मशखरों से डर गए।
जिस खुशनुमा सुबह के लिए हम लडे़-मरे,
क्यों उस सुबह पहले ही ऐसे बिखर गए।
हमने ही थमाए थे उनके हाथों में खंजर
सीने में हमारे ही वो खंजर उतर गए।
कवि का परिचय
दिनेश कुकरेती उत्तराखंड में वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह प्रिंट मीडिया दैनिक जागरण से जुड़े हैं। वर्तमान में देहरादून में निवासरत हैं। साथ ही उत्तरांचल प्रेस क्लब में पदाधिकारी भी हैं।



