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September 7, 2026

सैन्यधाम के निर्माण में देरी और बढ़ती लागत पर कर्नल रामरतन नेगी ने उठाए सवाल, मंत्री के बयान पर मांगा इस्तीफा

उत्तराखंड कांग्रेस के पूर्व सैनिक विभाग के अध्यक्ष कर्नल (सेनि) रामरतन नेगी ने सैन्यधाम के निर्माण में हो रही देरी, लगातार बढ़ती लागत और परियोजना से जुड़े वित्तीय एवं प्रशासनिक सवालों को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर प्रश्न उठाए। कर्नल नेगी ने कहा कि सैन्यधाम केवल एक भवन नहीं, बल्कि देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों की स्मृति और सम्मान से जुड़ा राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है। इसलिए इसके निर्माण में पारदर्शिता, समयबद्धता और सार्वजनिक जवाबदेही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

उन्होंने सैन्यधाम से जुड़ी पूरी टाइमलाइन सामने रखते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उत्तराखंड की सैनिक परंपरा और सैन्यधाम की परिकल्पना को सामने रखने के बाद चार नवंबर 2019 को तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने देहरादून में सैन्यधाम बनाए जाने की घोषणा की। इसके बाद 23 जनवरी 2021 को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पुरकुल गांव में सैन्यधाम का शिलान्यास किया। इसके कुछ समय बाद 15 दिसंबर 2021 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुनियालगांव में सैन्यधाम का दूसरा शिलान्यास किया। उस समय परियोजना की लागत लगभग 63 करोड़ रुपये बताई गई थी और इसे लगभग दो वर्ष में पूरा करने की बात कही गई थी। सैन्यधाम के लिए शहीद सम्मान यात्रा के माध्यम से 1,734 शहीद परिवारों के आंगन की पवित्र मिट्टी भी लाई गई। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कांग्रेस नेता कर्नल नेगी ने कहा कि इसके बाद परियोजना की लागत को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। वर्ष 2022 में RTI आधारित जानकारी में परियोजना की लागत लगभग 48 करोड़ रुपये बताई गई, जबकि 2024 में सामने आई RTI आधारित रिपोर्टों में यह लागत बढ़कर लगभग 99 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा परियोजना का दायरा बढ़ाए जाने का तर्क दिया गया है, लेकिन जनता को यह जानने का अधिकार है कि मूल DPR क्या थी, संशोधित DPR कब और किसके द्वारा स्वीकृत की गई तथा अतिरिक्त खर्च की पूरी स्वीकृति किस प्रक्रिया के तहत हुई। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कर्नल नेगी के प्रमुख सवाल
पहला सवाल: लगभग 48 करोड़ रुपये की परियोजना की लागत 91 से 99 करोड़ रुपये तक कैसे पहुंची? इसका पूरा वित्तीय हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है?
दूसरा सवाल: जब वर्ष 2021 में परियोजना को लगभग दो वर्ष में पूरा करने की बात कही गई थी, तो निर्धारित समय सीमा क्यों पूरी नहीं हुई? देरी के लिए जिम्मेदारी किसकी है?
तीसरा सवाल: सैन्यधाम के निर्माण में अतिरिक्त कार्यों और टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का सरकार स्पष्ट जवाब क्यों नहीं देती? किसे ठेका दिया गया, ठेकेदार की पात्रता क्या थी और अतिरिक्त कार्य किस प्रक्रिया के तहत स्वीकृत किए गए?
चौथा सवाल: सरकार मूल DPR, संशोधित DPR, वित्तीय स्वीकृतियां, टेंडर दस्तावेज, वर्क ऑर्डर, अतिरिक्त कार्यों की स्वीकृति, भुगतान का विवरण, गुणवत्ता जांच रिपोर्ट और पूर्णता प्रमाणपत्र सार्वजनिक क्यों नहीं करती? कर्नल नेगी ने कहा कि जनता के पैसे से बन रहे शहीदों के स्मारक का हर रुपया जनता के सामने जवाबदेह होना चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

मंत्री के बयान पर कर्नल नेगी का सवाल
कर्नल रामरतन नेगी ने सैन्यधाम के प्रभारी मंत्री गणेश जोशी के उस सार्वजनिक बयान पर भी गंभीर सवाल उठाए, जिसमें मंत्री ने कहा है कि सैन्यधाम का “चुनावी लाभ” लिया जाएगा और राजनीति में आए हैं तो राजनीति की चीजें देखनी पड़ती हैं। कर्नल नेगी ने कहा कि सैन्यधाम किसी राजनीतिक दल की चुनावी उपलब्धि नहीं है। यह उन सैनिकों और शहीद परिवारों के सम्मान का स्मारक है जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मंत्री स्वयं सैन्यधाम के निर्माण को चुनावी लाभ से जोड़ रहे हैं, तो क्या उन्हें इस विभाग की जिम्मेदारी पर बने रहना चाहिए? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कांग्रेस की मांग
कर्नल रामरतन नेगी ने सैन्यधाम के प्रभारी मंत्री गणेश जोशी के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और उनकी परिकल्पना से जुड़ी इस परियोजना पर अब प्रधानमंत्री को भी स्पष्ट जवाब देना चाहिए। पिछले वर्षों में कई बार ऐसी खबरें सामने आईं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सैन्यधाम का लोकार्पण करने उत्तराखंड आएंगे, लेकिन अब तक लोकार्पण नहीं हुआ। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कर्नल नेगी ने प्रधानमंत्री से किया सवाल
उन्होंने पीएम मोदी से पूछा कि जब आपके ही मंत्री सैन्यधाम के चुनावी लाभ की बात कर रहे हैं, तो क्या प्रधानमंत्री इस बयान से सहमत हैं? यदि नहीं, तो मंत्री का इस्तीफा क्यों नहीं लिया जा रहा है? प्रधानमंत्री यह भी स्पष्ट करें कि शहीदों के सम्मान के लिए बनाए जा रहे सैन्यधाम को राजनीतिक लाभ का माध्यम बनाए जाने पर उनकी सरकार की नीति क्या है? कर्नल रामरतन नेगी ने कहा कि पूर्व सैनिक विभाग उत्तराखंड कांग्रेस शहीदों के सम्मान, सैन्य परिवारों के अधिकार और सैन्यधाम की पारदर्शिता के सवाल पर अपनी आवाज लगातार उठाता रहेगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

शहीदों की मिट्टी पर राजनीति स्वीकार नहीं
इस अवसर पर कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सुजाता पॉल ने भी सैनिकों और शहीद परिवारों के सम्मान से जुड़े इस सवाल को उठाते हुए कहा कि सैन्यधाम में लाई गई 1,734 शहीद परिवारों के आंगन की मिट्टी किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि देश की हर वह मां, जिसने अपने बेटे को भारत माता की सेवा के लिए सीमा पर भेजा है, अपने बेटे को किसी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि देश के लिए भेजती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

उन्होंने कहा कि चाहे कोई सैनिक आज कांग्रेस के साथ खड़ा हो या भाजपा के साथ, उसकी वर्दी की शपथ किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं होती। उसकी निष्ठा भारत माता और देश की रक्षा के प्रति होती है। सुजाता पॉल ने सवाल उठाया कि जिस शहीद की शहादत पूरे देश की है, उसकी स्मृति को किसी दल के चुनावी लाभ से जोड़ना क्या उस सैनिक और उसके परिवार के सम्मान के साथ न्याय है? उन्होंने कहा कि शहीद की शहादत भारत की है, शहीद की मिट्टी भारत की है और उसका सम्मान भी पूरे देश का है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

उन्होंने किया ये सवाल: शहीदों की मिट्टी का राजनीतिक लाभ किसे चाहिए? क्या सैन्यधाम शहीदों के सम्मान का धाम है या चुनावी लाभ का मंच?
सुजाता पॉल ने देश के प्रत्येक सैनिक, शहीद परिवार और उस हर मां से भावुक होकर क्षमा याचना की, जिसने अपने बेटे को भारत माता की सेवा के लिए समर्पित किया है, और कहा कि यदि सत्ता की राजनीति में उनकी शहादत और सम्मान को चुनावी लाभ की भाषा में तौला गया है, तो यह पूरे देश के सैनिक परिवारों की भावनाओं का अपमान है। प्रेस वार्ता में पूर्व सैनिक विभाग के उपाध्यक्ष कर्नल (सेनि) मोहन सिंह रावत, कैप्टन (सेनि) बचन सिंह, कैप्टन (सेनि) कुशल राणा, लेफ्टिनेंट (सेनि) साहदेव शर्मा, हवलदार (सेनि) बलबीर सिंह, सूबेदार (सेनि) सिरजीत कृशाली, हवलदार (सेनि) हरेंद्र सिंह बिष्ट, युवा इंटक अध्यक्ष पंकज सिंह क्षेत्री उपस्थित रहे।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।