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July 7, 2026

अशोक आनन का गीत- बादल

बादल
बादल मनमानी पर उतरे।
वर्षों हो गए , ये न सुधरे।
दिन सुहावने सावन के वे
हो गए अब तो भूले- बिसरे।
जल – मग्न हुई सारी धरती
कैसे रूप धरा का निखरे।
आंधी – तूफ़ां के ज़ुल्मों से
चराग़ कैसे अब ये उबरे।
पानी में डूबी टपरी के
भूख़े – प्यासे दिन ये गुज़रे।
बाढ़ साथ बहाकर ले गई
ग़रीब – ग़ुरबा के सब टपरे।
गिराके बिजली नीड़ जलाए
बादल वादों से फ़िर मुकरे।
बारिश को ये काले बादल
आंखों ही आंखों में अख़रे।
सहे न जाएं पावस के अब
नख़राली बइरा – से नख़रे।
कवि का परिचय
अशोक ‘आनन’, जूना बाज़ार, मक्सी जिला शाजापुर मध्य प्रदेश।
Email : ashokananmaksi@gmail.com