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July 17, 2026

अशोक आनन की कविता-कोई दीया जलाया जाए

कोई दीया जलाया जाए
बहुत अंधेरा है बंधु! कोई दीया जलाया जाए।
रोशनी का पर्व है, रोशनी को घर बुलाया जाए।
अंधियारे को यहां कब, किसने मुंह लगाया है
घुसपैठिए-सा यह, अब घरों में घुस आया है।
अंधेरों के साथ जो, रोज़ साजिशें रच रहे हैं
सूरज को उन्हीं ने ; अपने घरों में छुपाया है।
सबक सूरज को अब, यह सिखाया जाए
दीया उसे नहीं, सूरज दीयों को दिखाया जाए। (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)

पांव पसार चुका है अंधेरा, अब घर – घर में।
महत्व दीयों का रहा नहीं, हमारी नज़र में।
झालरें लटक रही आज, जिनके द्वारों पर
नहाए हैं उनके महल, रोशनी के सरोवर में।
धर्म मानवता का अब, यों निभाया जाए
रोशनी से हर झोपड़ी को, अब नहलाया जाए।
घरों से अंधेरा मिटाने का, जो दावा कर रहे हैं
वे ही रोशनी से अब, अपना घर रोज़ भर रहे हैं।
देखे जब भी उनके घर, आंखें चौंधिया गईं
जो रोशनी के बहुचर्चित, यहां सौदागर रहे हैं।
उजालों की संसद में, प्रश्न अंधेरे का उठाया जाए
अहसास अंधेरे का भी, सूरज को कराया जाए।
कवि का परिचय
अशोक आनन
जूना बाज़ार, मक्सी जिला शाजापुर मध्य प्रदेश।
Email : ashokananmaksi@gmail.com

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