Loksaakshya Social

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

July 10, 2026

पढ़िए दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली कविता-इष्ट द्यवतौं बंदना

“इष्ट द्यवतौं बंदना”

” दोहे “

जख भी रौंला हम सदनि, लिंदवां तुमरू नाम.
तुम इष्ट देवता हमरा , बड़ैं – बिगड़दा काम..

छाया- माया तुमरि प्रभु, रैंद हम फरि सदान.
हमन रात-दिन हरबगत, कार तुमरु गुणगान..

हमर पुरखौंन मान दे , कार तुमरू सम्मान.
बरकत दियां द्यवतौ तुम, हम भी रखला ध्यान..

एक चुंगटि बभूता की , करि दींद बेड़ा पार.
किलै नि लिवां नौं तेरू , मिली के बारंबार..

शक्ति -भक्ति कू खेल यो, जॉड़ हमन पैचॉड़.
तिन भी त हम सब्यूं तैं , दीसा- धयड़ीं मान..

तृण डाऴि मुक-गौबंध ह्वे, भगत चरणौंम आय.
चौंऴ छड़कि बभूत लगै, सबकू भलु तिन काय..

लौंग- लाख म मानि जांदि, तुमरू हमसे प्यार.
हमभी सौग – भगत छवां , हे कुल इष्ट तुमार..

सामर्थ हमतैं दे हे इष्ट , शरण पड़ी हम आज.
‘दीन’ एकमन-एकचित्त ह्वे, करवां पूजन काज..

कवि का परिचय
नाम .. दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
गाँव.. माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य
सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।