युवा कवयित्री अंजली चंद की कविता- क्या 80’s का दशक इसीलिए था, चित्र बदल रहे हैं, पर विचार नहीं
धरोहर को
ट्रेंड समझ बैठे हैं
क्या 80’s का दशक इसीलिए था ?
जो हम उसे AI से दोबारा बना रहे हैं,
क्या वे चेहरे सच में ऐसे थे?
जो एल्गोरिथ्म नए चेहरों में बदलकर
उन्हें फिर से रंग रहा है,
पल भर में नए चित्र बना लेने वाले,
क्या समझ सकेंगे वह इंतज़ार?
जब एक तस्वीर के बनने में
हफ्ता भी कम पड़ जाता था।
क्या समझ सकेंगे वे,
वह प्रतीक्षा जो आँगन और दहलीज़ पर
वर्षों निकाल दिया करती थी?
क्या समझ सकेंगे वह बेचैनी भरे रिश्तें,
जो मात्र एक पत्र पर निहित थी,
जहाँ कुछ शब्द ही
पूरा संसार हुआ करते थे। (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
जन-जन में
ये कैसी आधुनिकता समा गई है?
किसके नेतृत्व में रचना का अपमान हो रहा है
जहाँ खोज का नामों निशाँ ही नहीं,
केवल मात्र पुनर्निर्माण बचा है।
जो कभी धरोहर थी,
वह आज एक ट्रेंड बन गई है।
ये जो युवा
हर दिन अपने ही चित्र को
खुशी-खुशी अस्सी के दशक में बदलकर दिखा रहा है,
क्या वह खोजकर समझ पाएंगे।
उस दौर की आत्मा?
या वो केवल उसके रंगों तक ही
सीमित रह जाएंगे?
सही दिशा, सही उद्देश्य और सही मार्गदर्शन के बिना,
यह भीड़ समझ ही नहीं पा रही
कि वास्तव में करना क्या है?
हाथ में एक ऐसा यंत्र है,
जो पल भर में
चेहरे, दृश्य और समय बदल देता है,
पर क्या वह बता सकता है
कि जीवन किस दिशा में बदलना है?
चित्र बदल रहे हैं, पर विचार नहीं।
चेहरे पुराने हो रहे हैं, पर धैर्य कैसे लौटेगा?
स्मृतियाँ बन रही हैं, पर अनुभव कैसे आयेगा?
वो युग इतिहास है समझने का
उसे नकल मात्र करने में व्यस्त हो गए हैं…
हम सच में इतने आजाद हो गए हैं कि
मात्र ट्रेंड एल्गोरिथम के लिए ख़ुद में कैद हो गए हैं ,
और धरोहर को
ट्रेंड समझ बैठे हैं।
कवयित्री की परिचय
नाम – अंजली चंद
बिरिया मझोला, खटीमा, उधमसिंह नगर, उत्तराखंड।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।



