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May 20, 2026

हर नए घर के साथ बढ़ रहा कार्बन संकट, इमारतों में बदलाव नहीं किया तो असुरक्षित हो जाएंगे शहर

दुनिया इस समय दोहरी मार झेल रही है। एक तरफ घरों की भारी कमी। दूसरी तरफ महंगी होती बिजली और ईंधन। ऐसे समय में एक नई वैश्विक रिपोर्ट ने साफ कहा है कि अगर इमारतों और घरों को जलवायु के हिसाब से नहीं बदला गया, तो आने वाले सालों में रहने की लागत और बढ़ेगी, ऊर्जा संकट गहराएगा और शहर ज्यादा असुरक्षित हो जाएंगे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी United Nations Environment Programme और Global Alliance for Buildings and Construction की नई रिपोर्ट Global Status Report for Buildings and Construction 2025-2026 के मुताबिक दुनिया की इमारतें अभी भी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 37 प्रतिशत हिस्सा पैदा कर रही हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट में एक दिलचस्प बदलाव भी दिखा। निर्माण गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। वहीं, उनके मुकाबले कार्बन उत्सर्जन की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है। इसे रिपोर्ट ने “partial decoupling” कहा है। यानी दुनिया पहले जितना प्रदूषण फैलाए बिना ज्यादा निर्माण करने लगी हैं। हालांकि यह बदलाव अभी बहुत सीमित है। रिपोर्ट 19 मई को World Urban Forum में जारी की गई। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

हर दिन दुनिया में लगभग 1.27 करोड़ वर्ग मीटर नई इमारतें बन रही हैं। यह लगभग ऐसा है जैसे हर हफ्ते एक नया पेरिस खड़ा किया जा रहा हो। सिर्फ 2024 में दुनिया में जितनी नई फ्लोर एरिया जुड़ी, वह नैरोबी शहर के पांच गुना, दिल्ली के दोगुने और बर्लिन के चार गुना के बराबर थी। इसमें तीन चौथाई हिस्सा सिर्फ आवासीय जरूरतों के लिए था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट के अनुसार 2024 में वैश्विक भवन क्षेत्र का कुल फ्लोर एरिया 273 अरब वर्ग मीटर तक पहुंच गया। इसका बड़ा हिस्सा भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे उभरते देशों में निर्माण की वजह से बढ़ा। आज भवन और निर्माण क्षेत्र दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत सामग्री खपत, 28 प्रतिशत ऊर्जा खपत और 37 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

Inger Andersen ने कहा कि घर, स्कूल, अस्पताल और दफ्तर सिर्फ इमारतें नहीं हैं। वे यह तय करते हैं कि लोग जलवायु संकट में कितने सुरक्षित रहेंगे। उनके मुताबिक 2050 तक दुनिया की आधी इमारतें या तो नई बनेंगी या फिर उनका नवीनीकरण होगा। इसलिए सरकारों के पास अभी भी मौका है कि वे बेहतर नीतियों और निवेश के जरिए कम उत्सर्जन वाले और जलवायु के अनुकूल शहर बना सकें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट में बताया गया कि 2015 के बाद से दुनिया में भवनों की ऊर्जा दक्षता में सुधार हुआ है। पिछले दशक में वैश्विक फ्लोर स्पेस 20 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन ऊर्जा मांग सिर्फ 11 प्रतिशत बढ़ी। इसका मतलब है कि बेहतर बिल्डिंग कोड्स और ऊर्जा दक्ष तकनीकों ने कुछ हद तक ऊर्जा खपत को नियंत्रित किया। इसके बावजूद प्रगति काफी धीमी पड़ गई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

2020 के बाद निर्माण की रफ्तार इतनी तेज हुई कि हरित बदलाव पीछे छूटने लगा। 2024 में भवनों की परिचालन उत्सर्जन यानी operational emissions बढ़कर 9.9 गीगाटन CO₂ तक पहुंच गईं, जो पिछले साल से 1 प्रतिशत ज्यादा हैं। रिपोर्ट कहती है कि दुनिया अभी भी जीवाश्म ईंधन आधारित निर्माण और ऊर्जा प्रणालियों पर बहुत ज्यादा निर्भर है। भवनों की कुल ऊर्जा जरूरतों में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी सिर्फ 17.3 प्रतिशत है, जबकि नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने के लिए इससे कहीं ज्यादा जरूरत होगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर अभी बने घर और इमारतें पारंपरिक सीमेंट, खराब डिजाइन और ऊर्जा-अक्षम तकनीकों पर आधारित रहीं, तो वे दशकों तक कार्बन उत्सर्जन “लॉक-इन” कर देंगी। यानी आने वाली पीढ़ियां उन इमारतों की वजह से लगातार ज्यादा ऊर्जा खर्च और ज्यादा उत्सर्जन झेलेंगी। इसीलिए रिपोर्ट “whole-life carbon” नीति की बात करती है। यानी सिर्फ इमारत चलाने के दौरान नहीं, बल्कि निर्माण सामग्री, निर्माण प्रक्रिया और पूरी जीवन अवधि में होने वाले उत्सर्जन को भी गिना जाए। रिपोर्ट में लकड़ी, recycled industrial byproducts और कम-कार्बन निर्माण सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट का एक बड़ा संदेश यह भी है कि तकनीक अब समस्या नहीं रही। हाई एफिशिएंसी heat pumps, rooftop solar और smart building design जैसी तकनीकें पहले से उपलब्ध और परखी हुई हैं। असली रुकावट नीति और निवेश की है। 2024 तक दुनिया ने ऊर्जा दक्षता में लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर निवेश किया है। 2030 तक नेट-जीरो रास्ते पर आने के लिए अभी भी 3.6 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त निवेश चाहिए। कुल मिलाकर भवन ऊर्जा दक्षता में 5.9 ट्रिलियन डॉलर निवेश की जरूरत बताई गई है। भारत के लिए भी रिपोर्ट में खास संकेत हैं।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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