पत्थर की अभिलाषा चाह नहीं नव निर्माण के.. शिलान्यास में रखा जाऊं! चाह नहीं देवालय में रख कर.. हरि संग...
Literature
गूँज उठी रणभेरी काशी कब से खड़ी पुकार रही पत्रकार निज कर में कलम पकड़ो गंगा की आवाज़ हुई स्वच्छ...
इंसान क्यों डरा डरा सा क्यों वीरान सी लगती ये धरती, लगता शहर भी सुनसान सा। यही लगता खुदा नाराज...
हे प्रभु तू ही तू मन्खी ज्यूम - कन रिटदी, कतगै बानी - गाणि. बिधातन भागम क्या लिख, कैना कुछ...
हां हूं मैं मॉडर्न खयालो की पर जानती हूं मैं संस्कार भी, हां हूं मैं खुले विचारों वाली पर जानती...
माँ को मूर्खता का पाठ पढ़ता बचपन जन मूर्ख-दिवस पर रो रहा है मेरा मन माँ को मूर्खता का पाठ...
आस मेरा ज्यू बतौ, दुखेरु- क्यांकु हूंणी छै. किलै खमोसि भितनै, क्यांकु रूंणी छै.. यो- अजोक- बिजोक, त्वेकु हि नि...
हुणत्यळि मवसि हे शिब्बू की ब्वै ! हे वीं बुढड़ी....... पर कख? क्वी जवाब ना, तब सुबदार साब। जगतराम जी...
छाले बेरोजगारी के हे पथिक! मत कर छालों की परवाह, आगे सफलता की मंजिल खड़ी है। दौड़ता जा कांटों भरी...
मैं आज भी जीवित हूं तो प्रभु तेरा ही रचा ये खेल है वरना कहां मैंने भरी आज तक इतनी...
