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June 28, 2026

शिक्षिका उषा सागर की कविता-समर्पण

समर्पण
जन्मी है जिस घर में बेटी
किलकारियों ने रौनक उसकी बढ़ाई
कोई कहता पैदा हुई है बेटी
कोई कहे घर लक्ष्मी है आई
लेकिन न जाने कब मैं
घर की दुलारी बन गई
पाकर लाड़ प्यार सबका
सबकी लाडली बन गई
जब हुई कुछ बड़ी तो
सबका ख्याल रखना शुरू किया
मां बाबा और भाई बहिनों
पर जीवन अपना लुटा दिया
घर का सम्मान बचाने में
सदा पिसती रही हैं बेटी
बन्धनों के बीच सदा
जीती रही हैं बेटी
मां बाप की इज्जत न धूमिल हो
हर कदम संभल कर चलती रही हैं बेटी
हां कुछ अपवादों को छोड़कर
सदा घर का सम्मान बढ़ाती रही हैं बेटी
कोई बिरली ही हुई हैं ऐसी जो
बाबुल का सिर झुका गई बेटी
वरना बाबुल की आन बान के लिए
जीवन तक लुटा गयीं हैं बेटी
फिर वक्त बदला और बेटी
कही गई धन पराया
अचानक फिर अजनबी कोई
घर उसके ही आया
दिल न चाहे जिसे खुद से दूर करना
मांग लिया उसी को,जैसे कोई सामान हो
कर दिया विदा दस्तूर ए दुनिया के लिए
जिससे न घर का कोई अपमान हो
पाला था जिसे नाजों से
जिसने घर की रौनक बढ़ाई थी
आज उसी की बिदाई की
शुभ  घड़ी आई थी
बाबुल के घर में जो थी
बड़े नाजों से पली
बंधकर बंधनों में वो संग
किसी अजनबी के चली
बिछड़ कर अपनों से
जिस घर थी वो चली
बाग की डाली से टूटकर
मुरझा गयी वो नाजुक सी कली
अजनबी शहर, घर अजनबी
लोग भी थे अजनबी सभी
ढलने लगी सब में ए सोचकर
हैं यही अब अपने सभी
वो अजनबी भी अजनबी न रहा
दिल की धड़कनों ने मुझसे  कहा
अपना लिया उसे जो अजनबी था
वो घर,शहर भी अजनबी न रहा
कर दिया सब कुछ न्यौछावर
अब इस घर के लिए
जीवन से कुछ पल भी
न चुरा सकी उस घर के लिए
देखती हूं अपना अक्ष उसमें
सामने हो जैसे कोई दर्पण
मैं अब, मैं न रही, खो गयी
कर लिया खुद, खुद का समर्पण
कवयित्री का परिचय
उषा सागर
सहायक अध्यापक
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय गुनियाल
विकासखंड जयहरीखाल
पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड।