महाशिवरात्रि पर्व पर युवा कवि सूरज रावत की कविता- तन में जिसके भस्म समाये

तन में जिसके भस्म समाये,
और बदन में बघाम्बर छाला,
वही है अपना महादेव डमरू वाला,
कभी तांडव , कभी भोला है मेरा मतवाला,
कभी पिया भाँग धतूरा, कभी विष का प्याला,
अंग विभूति रमाये, गले सर्पों की माला ,
वही है अपना महादेव डमरू वाला,
उसकी भक्ति में रमी है ये दुनिया सारी,
वो है मतवाला जो करता नंदी की सवारी,
वही है देवों के देव , और वो है कैलाश वाला,
वही है अपना महादेव डमरू वाला, (कविता जारी अगले पैरे में देखिए)
जटाओं में जिसके गंगा विराजे,
संग माँ पार्वती जी साजे,
वही है तीसरी आँख वाला, मतवाला,
वही है अपना महादेव डमरू वाला,
कार्तिकेय – गणेश ताके सुत दोऊ ,
ते नर फल पावत , जाके मन शिव सदा होऊ,
शिव की आरधना जिसके मन भाये,
ते नर सदा मनवांछित फल पाये,
वही है अपना शंकर भोला भाला,
वही है अपना महादेव डमरू वाला, (कविता जारी अगले पैरे में देखिए)
वही है कैलाश, पर्वतों का वासी,
वही है सर्वत्र विद्यमान, लोगों का विश्वासी,
साथ त्रिशूल और है उसके रुद्राक्ष माला,
वही है अपना महादेव डमरू वाला,
ऊँची ऊँची चोटियों में जिसका वास हो,
हिमालय में जिसका निवास हो,
कण कण में जिसके विस्वास हो,
वो है त्रिलोकी नाथ मतवाला,
वही है अपना महादेव डमरू वाला,

सूरज रावत, मूल निवासी लोहाघाट, चंपावत, उत्तराखंड। वर्तमान में देहरादून में निजी कंपनी में कार्यरत।
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।