नासा कर चुका अनोखा प्रयोग, अंतरिक्ष में भेजा 3301 मधुमक्खियों का दल, सात दिन के इस मिशन ने वैज्ञानिकों को चौंकाया
दुनिया भर में विभिन्न वैज्ञानिक एजेंसियां समय समय पर अंतरिक्ष में भी प्रयोग करती हैं। मनुष्य को अंतरिक्ष तक पहुंचाने से लेकर सब्जी उत्पादन तक के प्रयोग अंतरिक्ष में हो चुके हैं। यहां हम एक अनोखी रोचक जानकारी आपको दे रहे हैं। ये जानकारी है कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने वर्ष 1984 में करीब 3301 मधुमक्खियों को स्पेस शटल डिस्कवरी के साथ अंतरिक्ष में भेजा था। यह कोई सामान्य अंतरिक्ष यात्रा नहीं थी, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रयोग था। नासा यह समझना चाहता था कि धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बिना मधुमक्खियां कैसे व्यवहार करती हैं और क्या वे अंतरिक्ष में अपना छत्ता बना सकती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
मिशन का उद्देश्य
यह प्रयोग STS-41C मिशन का हिस्सा था और इसके दो मुख्य लक्ष्य थे। स्पेस एजेंसी ने 3,301 मधुमक्खियों को माइक्रोग्रेविटी में इसलिए भेजा, ताकि यह देखा जा सके कि माइक्रोग्रेविटी में मधुमक्खियां कैसा व्यवहार करती हैं। क्या वे जीवित रह सकती हैं। इससे भी जरूरी बात ये है कि क्या वे ग्रेविटी के खिंचाव के बिना अपना छत्ता बना सकती हैं। वे अंतरिक्ष में बने छत्ते की तुलना पृथ्वी पर मधुमक्खियों द्वारा बनाए गए छत्तों से भी करना चाहते थे। धरती पर मधुमक्खियां छत्ता बनाते समय गुरुत्वाकर्षण और एक-दूसरे के संपर्क से दिशा का अंदाजा लगाती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
मुश्किल भरी रही शुरुआत
सात दिन के इस मिशन की शुरुआत मुश्किल रही। नासा ने मधुमक्खियों को खास बाड़े में रखा, ताकि वैज्ञानिक उनके चलने, उड़ने, छत्ता बनाने और कॉलोनी के दूसरे कामों को करीब से देख सकें। उड़ने की कोशिश करते समय कुछ मधुमक्खियां दीवारों से टकरा गईं। मधुमक्खियां लॉन्च के दौरान तो जीवित रहीं, लेकिन अंतरिक्ष में उड़ना उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था। शुरुआती ऑब्जर्वेशन के दौरान, कुछ मधुमक्खियों ने उड़ने की कोशिश की, लेकिन वे अपने बाड़े की दीवारों से टकरा गईं। इससे कई की मौत हो गई। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हालांकि, जैसे-जैसे मिशन आगे बढ़ा, उनके व्यवहार में बदलाव आया। सातवें दिन तक क्रू ने बताया कि मधुमक्खियां जीरो ग्रेविटी में ढल गई थीं और आत्मविश्वास के साथ उड़ रही थीं। वे अब बॉक्स की छत से टकराकर उड़ने की कोशिश नहीं कर रही थीं। कई मधुमक्खियां असल में एक जगह से दूसरी जगह उड़ रही थीं। इसके बाद कुछ ही दिनों में वे अपने माहौल में ढल गईं। मिशन के आखिर तक, मधुमक्खियां सामान्य रूप से उड़ रही थीं। इससे वैज्ञानिकों को पता चला कि गुरुत्वाकर्षण की कमी के बावजूद मधुमक्खियां मिलकर अपना जरूरी काम कर सकती हैं और एक उपयोगी ढांचा तैयार कर सकती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
माइक्रोग्रैविटी में मधुमक्खियों ने बनाया छत्ता
अंतरिक्ष में मधुमक्खियों ने छत्ता बनाना शुरू किया, लेकिन शुरुआत में उनकी संरचना धरती के छत्ते जैसी सीधी नहीं थी। उन्होंने अंतरिक्ष में लगभग 200 सेंटीमीटर का छत्ता बना लिया था। इस प्रयोग के जरिए वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि मधुमक्खियों की प्राकृतिक क्षमता अंतरिक्ष के अलग माहौल में कितनी बदलती है। NASA ने मधुमक्खियों के भोजन के तौर पर चीनी, पानी और अगर (agar) के मिश्रण का इस्तेमाल किया। क्योंकि माइक्रोग्रैविटी में सामान्य तरल पदार्थ हवा में तैरती हुई बूंदें बना सकते हैं। वे अलग-अलग कोणों पर मोम की संरचना बनाने लगीं। धीरे-धीरे मधुमक्खियों ने नए माहौल के साथ खुद को ढाल लिया और आखिरकार करीब 31 वर्ग इंच का छत्ता तैयार किया। इससे पता चला कि मधुमक्खियां अंतरिक्ष में सिर्फ जीवित ही नहीं रहीं। उन्होंने काम भी किया। रिसर्चर ने पाया कि माइक्रोग्रैविटी में बने छत्ते में कुछ अंतर थे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रानी मधुमक्खी ने दिए 35 अंडे
इस प्रयोग में मधुमक्खियों ने छत्ता बनाने के अलावा कॉलोनी के कई सामान्य काम भी जारी रखे। उन्होंने मरी हुई मधुमक्खियों को बाहर हटाया और आपस में मिलकर काम किया। मिशन के दौरान रानी मधुमक्खी ने 35 अंडे भी दिए। हालांकि, धरती पर लौटने के बाद इनमें से कोई अंडा नहीं फूटा। इसका कारण स्पष्ट नहीं हो सका। इसलिए वैज्ञानिक यह साबित नहीं कर सके कि मधुमक्खियां अंतरिक्ष में पूरी तरह सफलतापूर्वक प्रजनन कर सकती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भविष्य की अंतरिक्ष खेती में आ सकती हैं काम
मधुमक्खियां सिर्फ शहद बनाने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। वे कई फसलों के परागण में बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसलिए भविष्य में अगर इंसान चांद या अंतरिक्ष में लंबे समय तक खेती करते हैं, तो मधुमक्खियां उपयोगी साबित हो सकती हैं। इस प्रयोग ने यह भी दिखाया कि उनकी कॉलोनी टीमवर्क पर काफी निर्भर रहती है। हालांकि, अंतरिक्ष में मधुमक्खियों ने खुद को काफी हद तक ढाला, लेकिन उनका छत्ता धरती जैसा पूरी तरह व्यवस्थित नहीं बन पाया।
प्रयोग की खास बातें
• शुरुआती कठिनाई: शुरुआत में मधुमक्खियां भारहीनता के कारण दिशा भटक गईं और अक्सर बॉक्स की दीवारों से टकराती रहीं।
• अनुकूलन: कुछ ही दिनों में उन्होंने खुद को ढाल लिया और सामान्य रूप से उड़ने लगीं।
• छत्ता और अंडे: 7 दिन के इस मिशन में मधुमक्खियों ने लगभग 200 वर्ग सेंटीमीटर का छत्ता बनाया। रानी मधुमक्खी ने अंडे भी दिए।
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