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March 12, 2026

पत्रकार दिनेश कुकरेती की उत्तराखंड के हालात बयां करती ग़ज़ल-न जाने क्यों मुझको वो ख़्वाब समझता है

न जाने क्यों मुझको वो ख़्वाब समझता है,
झूठा है वो झूठ को रुआब समझता है।
मिलता है सुकून, मैं उसको चांद कहता हूं,
फिर भी वो खुद को आफ़ताब समझता है।
चलो मान लिया, मेरा उससे कोई मेल नहीं,
क्यों मेरे मिलने की चाह को ताब समझता है।
मैं तो मोम हूं, हाथ लगाते ही पिघल जाऊंगा,
हैरान हूं कि वो बहता हुआ आब समझता है।
तलाश रहा जो एक मुद्दत से उस मयकदे को,
वो पानी के घूंट भी मय-ए-नाब समझता है।
नीम के कडु़वे घूंट पीना लिखा है मुकद्दर में,
मेरा महबूब हर घूंट में मिला राब समझता है।
मुफलिसी में मेरा चेहरा बेनूर नजर आता है,
और बेपरवाह जमाना मुझे शाब समझता है।
शब्दार्थ (मय-ए-नाब : निर्मल और शुद्ध मदिरा, आब : पानी, ताब : ताप, राब : सीरा, खांड, शाब : युवा तरुण, जवान।)
कवि का परिचय
दिनेश कुकरेती उत्तराखंड में वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह प्रिंट मीडिया दैनिक जागरण से जुड़े हैं। वर्तमान में देहरादून में निवासरत हैं। साथ ही उत्तरांचल प्रेस क्लब में पदाधिकारी भी हैं।

Bhanu Prakash

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भानु बंगवाल
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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