भारत में ग्रीन कवर 5.6% घटा, गर्मियों की तपिश का बढ़ने का खतरा

भारत में आने वाले दिनों में गर्मियों में तपीश बढ़ने का खतरा मंडराने लगा है। एक स्टडी के मुताबिक, 2001 से 2025 के बीच ग्रीन कवर वाले क्षेत्र का हिस्सा 36.95% से घटकर 31.35% रह गया। वनस्पति वाले और नॉन-ग्रीन इलाकों के गर्मियों के औसत तापमान में 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक का अंतर दर्ज किया गया। भारत में ग्रीन कवर में लंबे समय से आ रही गिरावट और कम वनस्पति वाली ज़मीन के बढ़ते दायरे का असर गर्मियों के तापमान पर भी दिखाई दे रहा है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की इस नई स्टडी के मुताबिक, 2001 से 2025 के बीच देश में ग्रीन कवर वाले क्षेत्र का हिस्सा 36.95% से घटकर 31.35% रह गया। इसी अवधि में नॉन-ग्रीन सतहों का हिस्सा 63.05% से बढ़कर 68.65% हो गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ये कहती है स्टडी
स्टडी का शीर्षक Assessment of Green Cover Dynamics and Their Influence on Summer Temperature across India Using MODIS Land Cover and ERA5 Reanalysis Data है। इसमें पाया गया कि अध्ययन की पूरी अवधि के दौरान नॉन-ग्रीन इलाकों में गर्मियों का तापमान वनस्पति वाले इलाकों से अधिक रहा। दोनों के औसत तापमान में करीब 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस का अंतर दर्ज किया गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन इलाकों में ग्रीन कवर घटा, वहाँ गर्मियों के औसत तापमान में 0.26 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह नतीजा बताता है कि ज़मीन के आवरण में बदलाव और स्थानीय गर्मी के बीच संबंध है। हालाँकि, स्टडी यह भी स्पष्ट करती है कि तापमान में बदलाव के पीछे क्षेत्रीय जलवायु का गर्म होना और भूमि आवरण में बदलाव, दोनों की भूमिका है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भारत के जलवायु अनुकूलन का अहम हिस्सा है वनस्पति
क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बलियान ने कहा कि निष्कर्ष साफ़ दिखाते हैं कि वनस्पति सिर्फ़ एक पारिस्थितिक संपदा नहीं है, यह भारत के जलवायु अनुकूलन के बुनियादी ढाँचे का एक अहम हिस्सा है। ग्रीन और नॉन-ग्रीन इलाकों के बीच गर्मियों के तापमान में 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस का जो फ़र्क लगातार बना रहा, वह दिखाता है कि वाष्पोत्सर्जन, छाया और नमी रोकने के ज़रिए वनस्पति स्थानीय तापीय हालात को काबू में रखती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा प्राकृतिक वनस्पति को बचाना अनुकूलन की प्राथमिकता होनी चाहिए, खासकर उन इलाकों में जहाँ ग्रीन कवर घट रहा है और गर्मियों का तापमान बढ़ रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं है ग्रीन कवर में बदलाव
स्टडी में भारत के अलग-अलग हिस्सों में भूमि आवरण और तापमान के बदलावों में अंतर पाया गया। पश्चिमी भारत, इंडो-गंगा के मैदानी इलाकों, मध्य भारत के कुछ हिस्सों और प्रायद्वीपीय भारत के कई इलाकों में ग्रीन कवर में गिरावट देखी गई। इसके उलट, पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों, हिमालय की तलहटी और दक्षिणी तथा पूर्वी भारत के कुछ इलाकों में स्थानीय स्तर पर ग्रीन कवर बढ़ा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
तापमान के रुझान भी क्षेत्र के हिसाब से अलग रहे। उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी भारत में गर्मी बढ़ने का रुझान दिखा, जबकि मध्य और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में स्थानीय स्तर पर ठंडक दर्ज की गई। कुल मिलाकर, वनस्पति वाले इलाके अध्ययन के दौरान आसपास की नॉन-ग्रीन सतहों की तुलना में ठंडे रहे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
वनस्पति सूरज की ऊर्जा के एक हिस्से का इस्तेमाल पानी को वाष्प के रूप में वातावरण में छोड़ने की प्रक्रिया में करती है। इसे वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। पेड़ों और दूसरी वनस्पतियों की छाया भी ज़मीन की सतह को सीधे गर्म होने से बचाती है। मिट्टी में नमी बनाए रखने की क्षमता के साथ ये प्रक्रियाएँ स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
डीयू के प्रोफेसर का कथन
दिल्ली विश्वविद्यालय में एटमॉस्फेरिक फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. एसके ढाका ने कहा कि वनस्पति की बहाली स्थानीय गर्मी के तनाव को कम कर सकती है, लेकिन इसे बड़े पैमाने की जलवायु कार्रवाई का विकल्प नहीं समझना चाहिए। जो इलाके लगातार हरे बने रहे, वहाँ भी गर्मी बढ़ना बताता है कि बड़े पैमाने पर जलवायु का दबाव क्षेत्रीय तापमान को प्रभावित करता रहता है। उन्होंने कहा कि भारत को दोहरी रणनीति की ज़रूरत है। मौजूदा वनस्पति को और घटने से रोकना होगा और गर्मी के प्रति संवेदनशील इलाकों में वैज्ञानिक तरीके से लक्षित बहाली करनी होगी। इसके साथ जल प्रबंधन, शहरी नियोजन और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के कदम भी मज़बूत करने होंगे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जलवायु परिवर्तन और स्थानीय बदलाव, दोनों अहम
क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक निदेशक आरती खोसला ने कहा कि इस स्टडी ने उस बात को आँकड़ा दे दिया है, जो हम लंबे समय से कहते आए हैं कि वनस्पति और जैव विविधता कोई बाद में सोचा गया मुद्दा नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूलन का बुनियादी ढाँचा है। जहाँ ग्रीन कवर गायब हुआ है, वहाँ तापमान भी उसके साथ बढ़ा है, और इसकी कीमत भारत के समुदाय अभी से चुका रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्रीन कवर को बचाना और बहाल करना जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय इलाकों को ठंडा रखने और समुदायों की जलवायु जोखिमों से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए भी ज़रूरी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
स्टडी में भूमि आवरण के बदलावों का आकलन करने के लिए 2001 से 2025 तक के MODIS लैंड कवर आँकड़ों और ERA5-Land तापमान डेटा का इस्तेमाल किया गया। अलग-अलग वर्षों के भूमि आवरण के आँकड़ों को मार्च से मई के मौसमी तापमान के साथ मिलाकर यह देखा गया कि ग्रीन कवर में बदलाव और गर्मियों के तापमान के बीच क्या संबंध रहा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि मौजूदा वनस्पति को बचाना, ग्रीन कवर के अनावश्यक नुकसान को रोकना और पारिस्थितिक तंत्रों की बहाली को बढ़ावा देना जलवायु अनुकूलन तथा टिकाऊ भूमि प्रबंधन की रणनीतियों का हिस्सा होना चाहिए। वनस्पति स्थानीय गर्मी को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन बढ़ती वैश्विक और क्षेत्रीय गर्मी से निपटने के लिए उत्सर्जन में कटौती और व्यापक जलवायु कार्रवाई भी ज़रूरी है।
नोटः सच का साथ देने में हमारा साथी बनिए। यदि आप लोकसाक्ष्य की खबरों को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए गए आप्शन से हमारे फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ सकते हैं, बस आपको एक क्लिक करना है। यदि खबर अच्छी लगे तो आप फेसबुक या व्हाट्सएप में शेयर भी कर सकते हो। यदि आप अपनी पसंद की खबर शेयर करोगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। बस इतना ख्याल रखिए।

Bhanu Bangwal
लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।






