नहीं रहे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् विमल भाई, आज दिल्ली एम्स में ली अंतिम सांस
राष्ट्रीय जनआंदोलनों के संगठन नेशनल एलाइंस फार मूवमेंट (एनएपीएम) के राष्ट्रीय समन्वयक विमल भाई का आज निधन हो गया। वह करीब पांच दिन से एम्स दिल्ली में भर्ती थे। उन्हें लीवर की समस्या के साथ ही टीवी की गंभीर समस्या थी। उनकी टीवी की बीमारी समय से डिक्टेट नहीं हो पाई। इससे उनकी हालत बिगड़ती चली गई। बेहद जिंदादिल जुझारु रहे विमल भाई निरंतर मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए सक्रिय रहे। वह दिल्ली में रह रहे थे। साथ ही दिल्ली में होने वाले हर जनआंदोलनों में बढ़चढ़कर भूमिका निभाते रहे हैं। उत्तराखंड के पर्यावरण के संबंध में भी वह सदैव चिंतित रहे। साथ ही समय समय पर वह आवाज उठाते रहे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)विमल भाई के बारे में
उत्तराखंड में लेखक रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रेरक, सामाजिक कार्यकर्ता व पर्यावरणविद सुरेश भाई नदी बचाओ आंदोलन से भी जुड़े हैं। सुरेश भाई उत्तराखंड सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष भी हैं। वर्तमान में वह उत्तरकाशी के हिमालय भागीरथी आश्रम में रहते हैं। उन्हीं ने विमल भाई के निधन की सूचना दी। सुरेश भाई के मुताबिक, विमल भाई के निधन से हिमालय की एक आवाज गुम हो गई है। सुरेश भाई ने जैसा लोकसाक्ष्य को लिखकर भेजा यहां वैसा ही दिया जा रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
प्रसिद्ध समाजसेवी, पर्यावरण विद, नदियों को बचाने के लिए जीवन भर संघर्ष करने वाले जुझारू नेता विमल भाई की मृत्यु का समाचार हम सबके लिए बहुत ही दुखद है। वे हिमालय की नदियों को बचाने के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे थे। विमल भाई ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने उत्तराखंड समेत हिमालय क्षेत्र के राज्यों में नदियों पर बनने वाले बड़े-बड़े बांधों के निर्माण से पहले जनसुनवाई करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार पर दबाव बनाया था। उन्होंने बांधों के संबंधित पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्टें आम जनता के बीच में हिंदी में उपलब्ध करवाई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उत्तराखंड में तो भागीरथी, अलकनंदा, यमुना, टौंस आदि नदियों पर प्रस्तावित 600 से अधिक बांधों की सूची उन्होंने जनता के सामने प्रस्तुत की। टिहरी बांध विरोध में सुंदरलाल बहुगुणा के साथ रहकर उन्होंने घर-घर में विस्थापितों को जागरूक करने का काम किया था। वह ऐसे प्यारे और हंसमुख नौजवान थे, जिन्होंने गरीब से गरीब व्यक्ति को नदियों पर बनने वाली बड़ी- बड़ी परियोजनाओं से क्या नुकसान हो सकते हैं। उसके बारे में आगाह किया है। इस संबंध में आज भी हमारे पास उनके द्वारा लिखे गए साहित्य उपलब्ध है। आज भी हजारों लोग उनकी उपस्थिति को अपने बीच दर्ज मानते हैं, क्योंकि बांध प्रभावित कोई भी गांव उत्तराखंड का ऐसा नहीं होगा जहां पर वह नहीं गए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हिमालय की इस वेदना को वे दिल्ली जाकर प्रभावितों की आवाज को केंद्र और राज्य सरकार तक पहुंचाते रहे हैं। मातृ सदन में रहने वाले महान ऋषि व संतो के साथ मिलकर भी उन्होंने उत्तराखंड के जल, जंगल, जमीन बचाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मेधा पाटेकर के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन में लगातार सक्रिय थे। राष्ट्रीय आंदोलनों के समन्वयक के रूप में काम करते रहे हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
अभी वह आवाज गुम हो गई, लेकिन उनका कार्य और संघर्ष हमेशा याद किया जाएगा। हमें विश्वास नहीं था कि विमल भाई इतनी जल्दी हमारे बीच से चले जाएंगे। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के अनेकों काम करते हुए कभी अपने स्वास्थ्य की कोई परवाह नहीं की है। जिसके कारण बीमारी अकस्मात उन्हें ले गई। हम उत्तराखंड के लोग उनके हमेशा ऋणी इसलिए रहेंगे कि उन्होंने अपने लिए कभी किसी सम्मान और पुरस्कार की मांग न करते हुए वास्तव में पर्यावरण संरक्षण की आवाज को बुलंदी दी है। हमें दुख है कि उनके जैसेऔर साथी कहां मिलेंगे?



