कविताः कहने को है नया, लेकिन नया कुछ भी नही- ब्राह्मण आशीष उपाध्याय (विद्रोही)

कहने को है नया, लेकिन नया कुछ भी नही।
तारीख़ बदली,साल बदला और बदला कुछ भी नही।।
बदलने को सब कुछ बदल गया कागज़ों पर लेकिन।
न पेड़ों पर पत्ते बदले, बदला मौसमों का रुख़ नही है।।
कहने को है नया, लेकिन नया कुछ भी नही।
बीत गया है, बदल गया है एक और दशक ।
न दिल के जज़्बात बदले, न दिल के कसक।।
ये कैसा नयासाल है?
ग़र कुछ बेवड़ों को छोड़ दें तो सच कहूँ।
इस प्रचण्ड ठंड में किसी को मिला सुख नही।।
कहने को है नया, लेकिन नया कुछ भी नही।
हाड़ गला रही है सर्दी,प्रकृति ने किया कोई श्रृंगार नही है।
नयी शाखाएं निकली नही,निकले का कोई आसार नही।।
हो मंगलमय ये वैश्विक आंग्ल नूतन वर्ष।
जिसके आगमन पर मदिरा की थी नदियां बही।।
कहने को है नया, लेकिन नया कुछ भी नही।
लेखक का परिचय
नाम-ब्राह्मण आशीष उपाध्याय (विद्रोही)
पता-प्रतापगढ़ उत्तरप्रदेश
पेशे से छात्र और व्यवसायी युवा हिन्दी लेखक ब्राह्मण आशीष उपाध्याय #vद्रोही उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद के एक छोटे से गाँव टांडा से ताल्लुक़ रखते हैं। उन्होंने पॉलिटेक्निक (नैनी प्रयागराज) और बीटेक ( बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय से मेकैनिकल ) तक की शिक्षा प्राप्त की है। वह लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि के छात्र हैं। आशीष को कॉलेज के दिनों से ही लिखने में रुचि है। मोबाइल नंबर-7525888880




