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October 31, 2026

कुलपति पर तकनीकी शिक्षा मंत्री के अधिकारों के अतिक्रमण का आरोप, निदेशक प्रभार को लेकर विश्वविद्यालय में नया विवाद

देहरादून। वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय में परिसर संस्थानों के निदेशक पदों के अतिरिक्त प्रभार को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक विवाद गहरा गया है। आरोप है कि विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा माननीय तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के अधिकार क्षेत्र से संबंधित विषयों में आवश्यक अनुमोदन के बिना ही निदेशकों का प्रभार पुनः सौंपा जा रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

प्राप्त जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय द्वारा आदेश संख्या 2727/वीएमएसबी-यूटीयू/2026, दिनांक 29 अक्टूबर 2026 के माध्यम से प्रौद्योगिकी संस्थान गोपेश्वर, चमोली के निदेशक का अतिरिक्त कार्यभार पुनः एक ऐसे अधिकारी को सौंपा गया है, जो पहले से ही अतिरिक्त प्रभार पर है। इस संबंध में 30 अक्टूबर 2026 को कार्यभार ग्रहण किए जाने की सूचना भी विश्वविद्यालय के कुलसचिव को भेजी गई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गोपेश्वर एवं टनकपुर जैसे परिसर संस्थानों में निदेशक का अतिरिक्त प्रभार जिन प्राध्यापकों को सौंपा जा रहा है, वे मूल रूप से क्रमशः पौड़ी एवं द्वाराहाट के संस्थानों से संबंधित बताए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या एक राजकीय संस्थान से विश्वविद्यालय के परिसर संस्थान में निदेशक का अतिरिक्त प्रभार सौंपने के लिए सक्षम प्राधिकारी, विशेषकर तकनीकी शिक्षा मंत्री की पूर्व स्वीकृति प्राप्त की गई है? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

उल्लेखनीय है कि तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत तकनीकी शिक्षा विभाग के मंत्री होने के साथ-साथ संबंधित राजकीय संस्थानों द्वाराहाट और पौड़ी स्थित इंजीनियरिंग कॉलेजों के अध्यक्ष भी हैं। ये दोनों संस्थान पूर्णतया सरकारी संस्थान हैं और उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के अधीन नहीं हैं। इन संस्थानों का नियुक्ति प्राधिकारी भी उत्तराखंड शासन है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर उत्तराखंड शासन के अधिकार क्षेत्र वाले संस्थानों के अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार सौंपने के प्रशासनिक निर्णय स्वतंत्र रूप से लिए जाने की वैधानिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

तीन वर्ष से अधिक की प्रतिनियुक्ति के बावजूद कार्रवाई नहीं
इस पूरे प्रकरण का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संबंधित दोनों प्राध्यापकों द्वारा निदेशक के रूप में प्रतिनियुक्ति पर तीन वर्ष से अधिक समय पूरा किए जाने के बावजूद विश्वविद्यालय द्वारा या तो उनको कार्यमुक्त किया जाना चाहिए था या फिर उनको शासन से एक्सटेंशन की अनुमति प्राप्त करनी चाहिए थी। लेकिन प्रतिनियुक्ति अवधि समाप्त होने पर विश्वविद्यालय कुलपति किस अधिकार से सरकारी कॉलेजों के अधिकारियों को अपने यहां रोके हुए है। इस पर अब तक क्या कार्रवाई की गई है, यह स्पष्ट नहीं है। प्रतिनियुक्ति की निर्धारित अवधि, उसके विस्तार के लिए सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति तथा वित्त विभाग की आवश्यक अनुमति जैसे विषयों पर भी पारदर्शिता की मांग उठ रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

प्रश्न यह भी है कि यदि प्रतिनियुक्ति की अवधि पूरी हो चुकी है, तो किन नियमों एवं सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के आधार पर संबंधित प्राध्यापक अभी तक निदेशक का कार्यभार संभाल रहे हैं? क्या उनके कार्यकाल का विधिवत विस्तार किया गया है? यदि हां, तो उस विस्तार का अनुमोदन किस स्तर पर हुआ है? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

विश्वविद्यालय प्रशासन से उठे कई महत्वपूर्ण सवाल
1. क्या कुलपति को विश्वविद्यालय परिसर संस्थानों में दूसरे सरकारी संस्थानों के प्राध्यापकों को निदेशक का अतिरिक्त प्रभार सौंपने का स्वतंत्र अधिकार प्राप्त है?
2. क्या इस संबंध में तकनीकी शिक्षा मंत्री एवं सक्षम शासन स्तर से पूर्व अनुमोदन लिया गया है?
3. तीन वर्ष से अधिक की प्रतिनियुक्ति के बाद संबंधित प्राध्यापकों के कार्यकाल का विस्तार किन नियमों के अंतर्गत किया गया?
4. क्या प्रतिनियुक्ति अवधि बढ़ाने के लिए वित्त विभाग एवं अन्य सक्षम प्राधिकारियों की स्वीकृति प्राप्त की गई?
5. जब निदेशक पदों पर नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया एवं नियमों का प्रश्न पहले से विचाराधीन है, तो बार-बार अतिरिक्त प्रभार सौंपने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

शासन से निष्पक्ष जांच एवं अभिलेख सार्वजनिक करने की मांग
शिक्षा जगत में इस पूरे मामले को विश्वविद्यालय की प्रशासनिक पारदर्शिता, शासन के अधिकारों एवं परिसर संस्थानों की स्वायत्त प्रशासनिक व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है। मांग की जा रही है कि शासन इस मामले में हस्तक्षेप कर संबंधित आदेशों, प्रतिनियुक्ति की अवधि, कार्यकाल विस्तार तथा मंत्री एवं सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृतियों की जांच कराए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लिए जा रहे ऐसे निर्णय शासनादेशों, विश्वविद्यालय अधिनियम एवं लागू सेवा नियमों के अनुरूप हैं अथवा नहीं। अब देखना यह होगा कि तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत तथा शासन इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन इन गंभीर प्रशासनिक एवं प्रक्रियात्मक सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।