स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत अभियान की जरूरत, वैज्ञानिक तरीके से विकसित हो दुग्ध सुरक्षा व्यवस्था, जनता बने दुग्ध प्रहरीः डॉ. बृज मोहन शर्मा
सबसे पहले उत्तराखंड सरकार, खाद्य सुरक्षा विभाग के साथ ही स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत अभियान को धरातल पर लागू करने वाले सभी संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को साधुवाद देना आवश्यक है। उन्होंने नकली, मिलावटी, कृत्रिम और असुरक्षित दुग्ध उत्पादों के विरुद्ध सख्ती की पहल की है। दूध और उससे बने उत्पादों की गुणवत्ता सीधे जनस्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी है। इसलिए सरकार की ओर से इस दिशा में की जा रही कार्रवाई निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। आवश्यकता अब इस पहल को केवल जांच, छापेमारी और कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय एक व्यापक जनस्वास्थ्य अभियान का रूप देने की है। इसी क्रम में उत्तराखंड में ‘स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत’ अभियान शुरू किया जाना चाहिए, जिसकी शुरुआत सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण दूध से हो। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
दूध भोजन का अभिन्न हिस्सा
दूध भारतीय परिवारों के भोजन का अभिन्न हिस्सा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक दूध, दही, पनीर, खोया, घी और मक्खन जैसे उत्पाद प्रतिदिन बड़ी मात्रा में उपयोग करते हैं। विशेष रूप से बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में सुरक्षित एवं संतुलित पोषण की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में दूध की शुद्धता केवल उपभोक्ता की पसंद नहीं, बल्कि बाल स्वास्थ्य, पोषण सुरक्षा और आने वाली पीढ़ी के भविष्य से जुड़ा विषय है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
1990 से स्पेक्स का मिलावट परीक्षण और रिपोर्टिंग अभियान
सोसाइटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एनवायरनमेंटल कंजर्वेशन साइंटिस्ट्स (स्पेक्स), देहरादून का औपचारिक गठन एवं पंजीकरण वर्ष 1994 में हुआ, लेकिन खाद्य गुणवत्ता, मिलावट और सामुदायिक स्तर पर वैज्ञानिक परीक्षण से जुड़े प्रयास संस्था के गठन की प्रक्रिया के साथ ही 1990 के दशक में शुरू हो गए थे। पिछले तीन दशकों से स्पेक्स ने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मिलावट को लेकर विभिन्न स्तरों पर नमूने एकत्र करने, उनका परीक्षण कराने, परिणामों का विश्लेषण करने तथा इन निष्कर्षों को जनसामान्य और संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाने का प्रयास किया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
अभियानों का उद्देश्य
इन अभियानों का उद्देश्य केवल मिलावट पकड़ना नहीं रहा, बल्कि परीक्षण के आधार पर एक ऐसी वैज्ञानिक रिपोर्टिंग व्यवस्था विकसित करना भी रहा है, जिसके माध्यम से प्रशासन, संबंधित विभाग और आम जनता वास्तविक स्थिति से परिचित हो सकें। स्पेक्स ने समय-समय पर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता से जुड़े परीक्षण परिणामों को मीडिया और संबंधित विभागों तक पहुंचाने का प्रयास किया है, ताकि इनके आधार पर आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई हो सके। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
किए गए मिलावट की जांच के तरीके सिखाने के प्रयास
स्पेक्स का अनुभव बताता है कि केवल यह कहना कि ‘मिलावट खतरनाक है’, पर्याप्त नहीं है। जब नागरिकों को सरल वैज्ञानिक परीक्षणों के माध्यम से स्वयं खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता समझने का अवसर मिलता है, तो उनमें जागरूकता के साथ जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होती है। इसी सोच के तहत संस्था ने ‘रसोई कसौटी’ जैसे प्रयासों के माध्यम से आम लोगों को खाद्य मिलावट के प्रति जागरूक किया। ‘जन प्रहरी’ जैसे अभियानों के माध्यम से भी पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़े विषयों में नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
गंभीर है दूध में मिलावट की समस्या
दूध में पानी मिलाना सबसे सामान्य मिलावट मानी जाती है, लेकिन समस्या इससे कहीं व्यापक है। विभिन्न परिस्थितियों में स्टार्च, यूरिया, डिटर्जेंट तथा अन्य अनधिकृत पदार्थों के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आती रही हैं। त्योहारों और अधिक मांग वाले अवसरों पर नकली खोया, पनीर, घी और अन्य दुग्ध उत्पादों की समस्या भी गंभीर रूप ले सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हालांकि दूध की सुरक्षा को केवल मिलावट के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। इसकी गुणवत्ता पशु स्वास्थ्य, दुग्ध दोहन, संग्रह, परिवहन, तापमान नियंत्रण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और भंडारण सहित पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर करती है। इसलिए निगरानी भी उत्पादन स्थल से लेकर उपभोक्ता तक पूरी श्रृंखला में होनी चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
अलग-अलग हैं खुला दूध और असुरक्षित दूध
दुग्ध सुरक्षा पर चर्चा करते समय यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि खुला दूध अपने आप में असुरक्षित नहीं होता। उत्तराखंड के अनेक गांवों में छोटे पशुपालक अपने पशुओं का ताजा दूध स्थानीय स्तर पर बेचते हैं और यही उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है। यदि दूध स्वच्छ परिस्थितियों में निकाला गया है। साफ पात्रों का इस्तेमाल किया गया है, उचित तापमान पर रखा गया है और खाद्य-सुरक्षा मानकों का पालन किया गया है, तो केवल खुले में बिकने के कारण उसे असुरक्षित नहीं कहा जा सकता। इसके विपरीत, पैकेट में बंद दूध भी केवल पैकेजिंग के कारण सुरक्षित नहीं हो जाता। वास्तविक सुरक्षा उत्पादन, स्वच्छता, तापमान नियंत्रण, परिवहन, भंडारण और नियमित गुणवत्ता परीक्षण से सुनिश्चित होती है। इसलिए नीति का आधार ‘खुला बनाम पैक’ नहीं, बल्कि ‘सुरक्षित बनाम असुरक्षित’ होना चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
छापेमारी के साथ स्रोत तक पहुंचना जरूरी
सरकार की ओर से नमूने लेना, निरीक्षण करना, मिलावटी उत्पाद जब्त करना और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना आवश्यक है। यदि किसी बाजार में मिलावटी नमूना मिलता है तो केवल संबंधित दुकानदार पर कार्रवाई कर देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यह पता लगाना भी जरूरी है कि मिलावट किस स्तर पर हुई, उत्पाद कहां तैयार हुआ, कच्ची सामग्री कहां से आई और परिवहन या भंडारण के दौरान गुणवत्ता में कोई कमी आई या नहीं। इसलिए जांच व्यवस्था को बिक्री स्थल के साथ-साथ उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला तक ले जाना होगा। इससे वास्तविक स्रोत की पहचान होगी और कार्रवाई अधिक प्रभावी बनेगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हर जिले और विकासखंड में दूध परीक्षण की हो व्यवस्था
स्पेक्स का सुझाव है कि उत्तराखंड सरकार प्रत्येक जिले और चरणबद्ध रूप से विकासखंड स्तर पर दूध परीक्षण एवं जागरूकता केंद्र स्थापित करे। इन केंद्रों पर प्राथमिक स्तर पर दूध में पानी की मिलावट, वसा, ठोस-अवयव, स्टार्च, यूरिया, डिटर्जेंट और अम्लता जैसी गुणवत्ता संबंधी जांच की जा सकती है। संदिग्ध नमूनों को मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में विस्तृत परीक्षण के लिए भेजा जाए। ऐसी व्यवस्था से उपभोक्ताओं को शिकायत और जांच का सुलभ माध्यम मिलेगा तथा ईमानदार दूध विक्रेताओं और छोटे पशुपालकों को अपनी गुणवत्ता प्रमाणित करने का अवसर भी प्राप्त होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
दूध से हो ‘स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत’ अभियान की शुरुआत
दूध सुरक्षा को बाल स्वास्थ्य और पोषण से जोड़ते हुए उत्तराखंड में ‘स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत’ नाम से व्यापक जनजागरूकता अभियान शुरू किया जाना चाहिए। विद्यालय इस अभियान का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। विद्यार्थियों को दूध की गुणवत्ता, सुरक्षित खाद्य पदार्थों, स्वच्छता और सरल वैज्ञानिक परीक्षणों के बारे में जानकारी दी जाए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
बच्चे इस जानकारी को अपने परिवारों तक ले जा सकते हैं। इससे विद्यालय से घर और घर से समुदाय तक जागरूकता का एक प्रभावी नेटवर्क तैयार होगा। महिला स्वयं सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों, आंगनबाड़ी केंद्रों, दुग्ध समितियों और स्थानीय संस्थाओं को भी इस अभियान से जोड़ा जा सकता है। इस अभियान का उद्देश्य केवल मिलावट की पहचान करना नहीं, बल्कि बच्चों के सुरक्षित पोषण, परिवारों की खाद्य सुरक्षा और समाज में वैज्ञानिक सोच को मजबूत करना होना चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
छोटे पशुपालकों को बनाया जाए व्यवस्था का हिस्सा
उत्तराखंड की पर्वतीय परिस्थितियों में बड़ी संख्या में परिवार छोटे स्तर पर पशुपालन करते हैं। दो-चार पशुओं से दूध उत्पादन करने वाले किसान से किसी बड़े दुग्ध उद्योग जैसी व्यवस्था की अपेक्षा व्यावहारिक नहीं है। इसलिए नियम लागू करते समय छोटे उत्पादकों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। ग्राम स्तर पर दुग्ध संग्रह केंद्र विकसित किए जा सकते हैं, जहां दूध का प्राथमिक परीक्षण और शीत भंडारण हो। इसके बाद दूध को प्रमाणित व्यवस्था के माध्यम से बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इससे किसानों को उचित मूल्य, उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता और स्थानीय दुग्ध अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
नकली दुग्ध उत्पादों पर शून्य सहनशीलता
नकली या कृत्रिम दुग्ध उत्पादों के मामले में कठोर कार्रवाई आवश्यक है। वास्तविक दूध या दुग्ध उत्पाद के नाम पर नकली अथवा खाद्य उपयोग के लिए अनधिकृत सामग्री बेचकर उपभोक्ता को धोखा देना गंभीर मामला है। ऐसे मामलों में शून्य सहनशीलता की नीति होनी चाहिए। साथ ही नमूना लेने, परीक्षण करने और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया वैज्ञानिक, पारदर्शी और प्रमाण आधारित होनी चाहिए, ताकि कार्रवाई की विश्वसनीयता बनी रहे और ईमानदार कारोबारियों के हित भी सुरक्षित रहें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जनता बने ‘दुग्ध प्रहरी’
दुग्ध सुरक्षा केवल सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। उपभोक्ताओं को भी इस व्यवस्था का सक्रिय भागीदार बनाया जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को दूध या दुग्ध उत्पाद की गुणवत्ता पर संदेह है तो उसके लिए शिकायत दर्ज कराने और नमूने की जांच कराने की सरल व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए। जागरूक नागरिकों को ‘दुग्ध प्रहरी’ की भूमिका देकर उन्हें अपने अधिकारों, खाद्य सुरक्षा मानकों और उपलब्ध जांच सुविधाओं की जानकारी दी जा सकती है। इससे प्रशासन और जनता के बीच सहयोग मजबूत होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पारदर्शिता से बढ़ेगा जनता का विश्वास
दुग्ध सुरक्षा अभियान में पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है। जिला स्तर पर यह जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए कि कितने नमूने लिए गए, कितने मानकों के अनुरूप पाए गए, कितने असफल रहे, किस प्रकार की अनियमितताएं सामने आईं और कितने मामलों में कार्रवाई हुई। स्पेक्स के वर्षों के परीक्षण अभियानों से भी यही सीख मिलती है कि वैज्ञानिक आंकड़े तभी प्रभावी होते हैं जब उन्हें जनता और संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाया जाए और उनके आधार पर सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़े। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उत्तराखंड बन सकता है देश के लिए उदाहरण
उत्तराखंड के सामने आज एक अवसर है कि वह केवल मिलावटी दूध के खिलाफ कार्रवाई करने वाला राज्य न बने, बल्कि सामुदायिक और वैज्ञानिक दुग्ध सुरक्षा का एक प्रभावी मॉडल विकसित करे। इसके लिए स्रोत की पहचान, नियमित परीक्षण, स्वच्छ उत्पादन, छोटे पशुपालकों का सहयोग, उपभोक्ता जागरूकता और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
1990 के दशक से स्पेक्स द्वारा किए गए खाद्य मिलावट परीक्षण अभियानों और उनकी रिपोर्टिंग से प्राप्त अनुभव इस दिशा में उपयोगी आधार प्रदान कर सकता है। संस्था का मानना है कि सरकार की संस्थागत क्षमता और वैज्ञानिक संस्थाओं के सामुदायिक अनुभव को जोड़कर उत्तराखंड में ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जो केवल मिलावट पकड़ने तक सीमित न हो, बल्कि मिलावट की रोकथाम और सुरक्षित खाद्य संस्कृति के निर्माण पर भी काम करे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उत्तराखंड सरकार और संबंधित विभागों द्वारा नकली, मिलावटी और असुरक्षित दुग्ध उत्पादों के विरुद्ध की जा रही कार्रवाई जनहित में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके लिए सरकार, खाद्य सुरक्षा विभाग और संबंधित अधिकारियों को साधुवाद दिया जाना चाहिए। अब आवश्यकता इस पहल को एक व्यापक और दीर्घकालिक जनस्वास्थ्य अभियान में बदलने की है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
‘स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत’ अभियान इसी दिशा में एक सार्थक कदम हो सकता है, जिसकी शुरुआत सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण दूध से की जाए। इसमें सरकार के साथ वैज्ञानिक संस्थान, दुग्ध सहकारी समितियां, विद्यालय, आंगनबाड़ी केंद्र, महिला स्वयं सहायता समूह, छोटे पशुपालक, दूध विक्रेता और उपभोक्ता सभी भागीदार बनें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
खुले दूध को केवल खुले होने के कारण असुरक्षित और पैकेट में बंद दूध को केवल पैकेजिंग के कारण सुरक्षित मानना वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है। वास्तविक सुरक्षा पूरी दुग्ध श्रृंखला की गुणवत्ता, स्वच्छता, परीक्षण और निगरानी से सुनिश्चित होती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
स्पेक्स के 1990 से आज तक के परीक्षण, रिपोर्टिंग और जनजागरूकता अनुभव की सीख स्पष्ट है—खाद्य सुरक्षा केवल कानून से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए विज्ञान, परीक्षण, जागरूकता, पारदर्शिता और सामुदायिक भागीदारी का समन्वय आवश्यक है। यदि उत्तराखंड इस दिशा में आगे बढ़ता है तो वर्तमान कार्रवाई केवल एक प्रतिबंधात्मक कदम न रहकर ऐसी वैज्ञानिक और जनभागीदारी आधारित व्यवस्था की शुरुआत बन सकती है, जिसका उदाहरण देश के अन्य राज्य भी अपना सकें। सुरक्षित दूध, स्वस्थ बचपन, स्वस्थ भारत, वैज्ञानिक उत्तराखंड। सहयोग के लिए सुशील त्यागी, हरि राज सिंह, बालेंदु जोशी, अनिल जग्गी एवं सस्टेनेबल एलायंस का आभार।
लेखक का परिचय
डॉ. बृजमोहन शर्मा उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के निवासी हैं। वह वैज्ञानिकों की संस्था स्पैक्स (SPECS) के अध्यक्ष हैं। वह समय समय पर राज्य की के लोगों के साथ ही छात्र और शिक्षकों को पानी की गुणवत्ता, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता के लिए जागरूक करते रहते हैं। साथ ही मिलावटी सामान की जांच करने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन भी करते हैं। ये काम वह पिछले कई दशकों से कर रहे हैं। इसके साथ ही वह होली के प्राकृतिक रंगों को तैयार करने, एलईडी बल्ब बनाने के साथ ही कई विषयों का छात्रों और महिलाओं को प्रशिक्षण भी देते रहते हैं। उनके ऐसे प्रयासों से कई लोग स्वरोजगार से जुड़े हुए हैं। उनके नाम पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र प्रेरणा एंव प्रोत्साहन के लिए कई राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय पुरस्कार दर्ज हैं।
नोटः सच का साथ देने में हमारा साथी बनिए। यदि आप लोकसाक्ष्य की खबरों को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए गए आप्शन से हमारे फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ सकते हैं, बस आपको एक क्लिक करना है। यदि खबर अच्छी लगे तो आप फेसबुक या व्हाट्सएप में शेयर भी कर सकते हो। यदि आप अपनी पसंद की खबर शेयर करोगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। बस इतना ख्याल रखिए।

Bhanu Bangwal
लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।



