सिर्फ गर्मी नहीं, जलवायु परिवर्तन ने भड़काई फ्रांस और स्पेन के जंगल में विनाशकारी आग
फ्रांस और स्पेन में इस साल लगी भीषण जंगल की आग कोई सामान्य प्राकृतिक घटना नहीं थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने इन आगों के लिए अनुकूल मौसम बनने की संभावना फ्रांस में कम से कम दोगुनी और स्पेन में 20 गुना से अधिक बढ़ा दी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
WWA का नया विशलेषण
यह निष्कर्ष वैज्ञानिकों के अंतरराष्ट्रीय समूह World Weather Attribution (WWA) के नए विश्लेषण में सामने आया है। जुलाई की शुरुआत से फ्रांस और स्पेन के कई हिस्सों में लगी जंगल की आग में तीन लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों घर नष्ट हो गए और तीन लाख से अधिक लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। आग का दायरा इतना बड़ा था कि कुछ जगहों पर उसने अपना अलग मौसम तंत्र ही बना लिया। इससे आग पर काबू पाना और मुश्किल हो गया। केवल जुलाई महीने में स्पेन में करीब 1.4 लाख हेक्टेयर जंगल जल गए, जबकि फ्रांस में इस साल अब तक 1.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र आग की चपेट में आ चुका है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हीटवेव नहीं थी जिम्मेदार
WWA के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस आपदा के पीछे सिर्फ़ एक हीटवेव जिम्मेदार नहीं थी। इससे पहले लगातार दो भीषण हीटवेव आईं। फिर सामान्य से पहले सूखे जैसी स्थिति बनी। इन दोनों ने मिलकर जंगलों और वनस्पतियों को इतना सूखा दिया कि वे बारूद की तरह सुलगने लगे। वैज्ञानिकों ने आग के लिए अनुकूल मौसम का आकलन Daily Severity Rating (DSR) नामक सूचकांक से किया। इसमें तापमान, सूखापन और हवा की गति जैसे कारकों को शामिल किया जाता है। यह बताता है कि आग लगने के बाद उसे बुझाना कितना कठिन होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ये कहता है अध्ययन
अध्ययन के मुताबिक आज की जलवायु में दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस में इस तरह की आग के लिए अनुकूल परिस्थितियां औसतन 20 साल में एक बार, जबकि मध्य स्पेन में हर छह साल में एक बार बनने की संभावना है। रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करती है। प्रभावित क्षेत्रों में अब गीली सर्दियों और उसके बाद आने वाले सूखे वसंत का क्रम जंगल की आग का बड़ा कारण बनता जा रहा है। सर्दियों में अच्छी बारिश से वनस्पति तेजी से बढ़ती है, लेकिन बाद में गर्मी और सूखे में यही वनस्पति सूखकर आग के लिए ईंधन बन जाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
वैज्ञानिकों का तर्क
जर्मनी के Helmholtz Centre for Environmental Research की जलवायु वैज्ञानिक Andreia Ribeiro कहती हैं कि जब अलग-अलग क्षेत्रों में एक साथ भीषण आग लगती है, तो देशों के लिए एक-दूसरे की मदद करना भी मुश्किल हो जाता है। क्योंकि सभी जगह अग्निशमन संसाधनों की जरूरत एक ही समय पर पड़ने लगती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
फ्रांस के National Institute for Industrial Environment and Risks के Augustin Colette के अनुसार आग से उठे धुएं ने वायु गुणवत्ता पर भी गंभीर असर डाला। कई इलाकों में PM2.5 का स्तर यूरोप में “उचित वायु गुणवत्ता” माने जाने वाले स्तर से 20 गुना तक अधिक दर्ज किया गया। आग का धुआं 400 किलोमीटर दूर तक महसूस किया गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
Imperial College London की शोधकर्ता Dr. Clair Barnes कहती हैं कि फ्रांस और स्पेन में जो हो रहा है, वह बदकिस्मती नहीं बल्कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। उनके मुताबिक पहले गीली सर्दी, फिर बेहद सूखी गर्मी और लगातार हीटवेव ने जंगलों को सूखी लकड़ी के ढेर में बदल दिया, जबकि बढ़ते तापमान ने छोटी-सी चिंगारी को भी विशाल आग में बदलने की परिस्थितियां पैदा कर दीं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
Imperial College London में जलवायु विज्ञान की प्रोफेसर Dr. Friederike Otto कहती हैं कि यूरोप की जलवायु जितनी तेजी से बदल रही है, सरकारों की तैयारियां उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रही हैं। उनके अनुसार फॉसिल फ्यूल का लगातार इस्तेमाल ऐसे मौसम को पहले की तुलना में कहीं अधिक सामान्य बना रहा है, जिसमें छोटी आग भी बड़ी आपदा में बदल सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
Red Cross Red Crescent Climate Centre की कार्यक्रम निदेशक Julie Arrighi का कहना है कि जैसे-जैसे भीषण गर्मी और सूखा बढ़ेगा, वैसे-वैसे जंगल की आग रोकने, उससे बचाव और आपदा प्रतिक्रिया क्षमता में निवेश भी तेज़ करना होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय (UN Climate Change) के कार्यकारी सचिव Simon Stiell ने कहा कि ये “मेगा-फायर” दिखाते हैं कि अत्यधिक गर्मी और सूखे परिदृश्य किस तरह जंगल की आग को राष्ट्रीय आपदा में बदल सकते हैं। उनके मुताबिक कोयला, तेल और गैस का लगातार उपयोग पृथ्वी को और गर्म कर रहा है, जिससे ऐसी आग पहले से अधिक घातक और विनाशकारी होती जा रही है। उनका कहना है कि इसका समाधान फॉसिल फ्यूल से तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ना और लोगों को बढ़ते जलवायु जोखिमों से सुरक्षित करना है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सिर्फ जंगलों की समस्या नहीं रही ये आग
यह अध्ययन एक बार फिर याद दिलाता है कि जंगल की आग अब सिर्फ़ जंगलों की समस्या नहीं रह गई है। यह जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, वायु प्रदूषण, आपदा प्रबंधन और लोगों की सुरक्षा से जुड़ा संकट बन चुकी है। वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ़ है। जब तक वैश्विक तापमान बढ़ता रहेगा, ऐसी भीषण आग की घटनाएं पहले से अधिक बार और अधिक तीव्रता के साथ सामने आती रहेंगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कई शहरों पर गंभीर संकट
गौरतलब है कि फ्रांस और स्पेन में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और सूखे के कारण जंगलों में भीषण आग भड़क उठी। इस आपदा से 300,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं और 4.34 लाख हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र जल चुका है, जिससे कई शहरों और रिहायशी इलाकों पर गंभीर संकट आ गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
मुख्य कारण भीषण गर्मी और सूखा: तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया है, जिससे पेड़-पौधे बारूद की तरह सूख गए हैं।
विनाशकारी आंकड़े: स्पेन और फ्रांस के प्रभावित क्षेत्रों से तीन लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।
फायर क्लाउड (Pyrocumulonimbus): फ्रांस के गिरोंड क्षेत्र में इस आग ने अपने खुद के खतरनाक मौसमी बादल बना लिए हैं, जिससे हवाएं और तेज हो गईं तथा आग पर काबू पाना नामुमकिन सा हो गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
प्रशासनिक कदम और राहत कार्य
स्पेन और फ्रांस की सरकारों ने आपातकाल घोषित कर दिया है और दमकल तथा सेना की टीमें लगातार आग बुझाने में जुटी हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने इसे जलवायु संकट का सबसे दर्दनाक रूप बताया है।
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