हैरान कर देने वाली जानकारी, इस फैक्ट्री में हर हफ्ते बन रहे हैं चार करोड़ डेंगू और मलेरिया मारने वाले मच्छर, भारत भी ले सकता है सीख
दुनिया का शायद सबसे अजीब सवाल इस वक्त कोलंबिया के शहर मेडेलीन में पूछा जा रहा है। सवाल ये है कि क्या इंसानों को बचाने के लिए करोड़ों मच्छर पैदा किए जा सकते हैं? सुनने और पढ़ने में किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन यही सच है। दक्षिण अमेरिकी देश Medellin में एक ऐसी “मच्छर फैक्ट्री” चल रही है, जहां हर हफ्ते 3 से 4 करोड़ मच्छर पैदा किए जाते हैं। इस मामले में भारत भी सीख ले सकता है। मेक इन इंडिया के नाम पर असेंबल से काम नहीं चलेगा। इसके लिए अपने नए प्रयोग करने होंगे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हैरानी की बात ये है कि लोग उनसे डर नहीं रहे। लोग उनका इंतज़ार कर रहे हैं। इस दो मंज़िला बायोफैक्ट्री को World Mosquito Program चलाता है, जिसे Bill & Melinda Gates Foundation का समर्थन मिला हुआ है। यह दुनिया की सबसे बड़ी मच्छर प्रजनन सुविधा मानी जाती है। यहां ये भी बताना जरूरी है कि ये कोई आम मच्छर नहीं हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जानकारी ये है कि इन मच्छरों के अंदर एक खास बैक्टीरिया डाला जाता है, जिसका नामWolbachia है। यह कोई लैब में बना केमिकल नहीं, बल्कि प्रकृति में पहले से मौजूद एक बैक्टीरिया है, जो कई कीड़ों में पाया जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के करीब 16 प्रतिशत कीड़ों में यह प्राकृतिक रूप से मौजूद रहता है। इंसानों या दूसरे स्तनधारी जीवों के लिए इससे कोई खतरा नहीं माना गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
अब इस खेल के बारे में समझिए
असल में डेंगू, जीका, चिकनगुनिया और येलो फीवर जैसे वायरस मच्छरों के जरिये फैलते हैं। खासकर Aedes aegypti नाम का मच्छर इन बीमारियों का बड़ा वाहक माना जाता है। Wolbachia इसी चेन को तोड़ देता है। जब यह बैक्टीरिया मच्छर के शरीर में होता है, तब वायरस उसके अंदर ठीक से विकसित नहीं हो पाते। मतलब मच्छर इंसान को काट भी ले, तब भी वायरस फैलने की क्षमता काफी घट जाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
आसानी से कहा जा सकता है कि ज़हर को ज़हर काट रहा है। मच्छर ही मच्छरों से लड़ रहे हैं। फैक्ट्री में इन मच्छरों को बड़े पैमाने पर पाला जाता है। अंडों से लेकर लार्वा तक की देखभाल होती है। लार्वा को fishmeal खिलाया जाता है। बड़े होने पर मच्छरों को शक्कर और एक्सपायर हो चुके ब्लड बैंक के खून से पोषण दिया जाता है। फिर इन्हें शहरों में छोड़ा जाता है। शहरों में छोड़ने की प्रक्रिया कभी ड्रोन से तो कभी मोटरसाइकिल से पूरी की जाती है। वहीं, कभी लोगों को छोटे egg capsules देकर भी इस अभियान का चलाया जा रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इसके बाद ये लैब वाले मच्छर जंगली मच्छरों के साथ प्रजनन करते हैं और Wolbachia अगली पीढ़ियों में फैलता जाता है। एक बार अगर स्थानीय मच्छरों में इसकी मौजूदगी 60 प्रतिशत से ऊपर पहुंच जाए, तो सिस्टम खुद टिकने लगता है। बार-बार स्प्रे या केमिकल डालने की ज़रूरत कम हो जाती है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे public health की दुनिया में गेम चेंजर मान रहे हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कोलंबिया में इसके नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे हैं। मेडेलीन और उसके आसपास के Aburrá Valley इलाके में Wolbachia आधारित प्रोग्राम लागू होने के बाद डेंगू के मामलों में 95 से 97 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई। कुछ दूसरे अध्ययनों में 47 से 89 प्रतिशत तक कमी देखी गई। खास बात ये रही कि जब आसपास के इलाकों में डेंगू के बड़े प्रकोप आए, तब भी इन शहरों में संक्रमण अपेक्षाकृत बेहद कम रहा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यह प्रोजेक्ट अब 25 लाख से ज्यादा लोगों को कवर कर चुका है और 100 वर्ग किलोमीटर से बड़े क्षेत्र में फैल चुका है। कोलंबिया के दूसरे शहरों में भी इसे बढ़ाया जा रहा है। इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद तकनीक नहीं, सोच है। दुनिया दशकों तक मच्छरों से लड़ने के लिए कीटनाशकों पर निर्भर रही है। इसके लिए धुआं, स्प्रे, केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच मच्छर जनित बीमारियां लगातार फैल रही हैं। गर्म शहर, अनियमित बारिश और पानी भराव ने मच्छरों के लिए नई दुनिया बना दी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ऐसे में मेडेलीन का यह प्रयोग एक अलग रास्ता दिखाता है। ये रास्ता प्रकृति के खिलाफ नहीं है। ये रास्ता प्रकृति के अंदर से समाधान खोजने का रास्ती है। हालांकि कुछ लोग अब भी सवाल उठाते हैं कि करोड़ों मच्छरों को जानबूझकर छोड़ना कितना सुरक्षित है। वहीं, वैज्ञानिकों का कहना है कि Wolbachia पर वर्षों से रिसर्च हो चुकी है, इसकी मॉनिटरिंग लगातार होती है। अब तक इंसानों में संक्रमण या बड़े पर्यावरणीय खतरे का कोई प्रमाण नहीं मिला है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
दिलचस्प बात यह भी है कि इस प्रोजेक्ट को स्थानीय लोगों का अच्छा समर्थन मिला। हजारों वॉलंटियर्स इसमें शामिल हुए। क्योंकि जिन शहरों ने डेंगू के डर में साल बिताए हैं, उनके लिए यह सिर्फ साइंस नहीं, राहत की उम्मीद है। इससे ये ही निष्कर्स निकलता है कि कभी-कभी भविष्य लैब में नहीं बनता है। वो भनभनाता हुआ उड़कर आता है।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


