मजदूर दिवसः उत्तरखंड मे कांग्रेस ने आयोजित किया श्रमिक सम्मान कार्यक्रम, कांग्रेस नेता धस्माना बोले- किसी गरीब की झोपड़ी नहीं टूटने देंगे
अंतरास्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर आज राजधानी देहरादून में उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस श्रम प्रकोष्ठ की ओर से घंटाघर में श्रमिक सम्मान कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें मुख्य अतिथि सदस्य एआईसीसी व प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने महिला श्रमिकों को सूट भेंट किए। साथ ही पुरुष श्रमिकों को गमछा पहना कर सम्मानित किया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस अवसर पर एकत्रित श्रमिकों को संबोधित करते हुए धस्माना ने कहा कि कांग्रेस पार्टी जब भी सत्ता व सरकार में रहती है, चाहे केंद्र में या फिर प्रदेश में, वो हमेशा सबसे पहले देश के गरीबों श्रमिकों वंचितों के बारे में चिंता करती है। साथ ही उनके हितों के लिए नीतियां व कार्यक्रम बनती हैं। उन्होंने कहा कि देश में भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, पंचायतों व स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण को व्यवस्था इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कांग्रेस नेता धस्माना ने कहा कि देश में व उत्तराखंड में आज भाजपा की सरकारें गरीब विरोधी नीतियां बना रही है। गरीबों से रोजगार व उनकी छत छीनी जा रही है। कांग्रेस किसी गरीब की झोपड़ी टूटने नहीं देगी। कोरोना काल में अगर सबसे ज्यादा कोई परेशान हुआ तो देश का मजदूर परेशान हुआ। जिसे देश के अलग अलग हिस्सों से हजारों किलोमीटर चल कर अपने घरों को पैदल पैदल जाना पड़ा। आज अमरीका ईरान युद्ध के कारण भी जो रसोई गैस की किल्लत है, उससे सबसे ज्यादा प्रभावित कोई है तो वो मजदूर है। जिसे चूल्हा जलाना असंभव हो गया है। इसके कारण एक बार फिर उसे अपनी ध्याड़ी मजदूरी छोड़ कर अपने घरों को पलायन करना पड़ रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि उत्तराखंड में जब से नौ साल पहले भाजपा की सरकार आई है तभी से सबसे पहले निशाने पर गरीबों श्रमिकों की बस्तियां आईं हैं। जिनको उजाड़ने के लिए कभी हाई कोर्ट के आदेश का सहारा तो कभी एलिवेटेड रोड के नाम पर उजाड़ने की साजिश रची गई। उन्होंने कहा कि राज्य की सरकार को चाहिए कि किसी को भी उजाड़ने से पहले सरकार उसके पुनर्वास की व्यवस्था करे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उन्होंने कहा कि आगामी विधान सभा चुनाव में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनने पर कांग्रेस एक भी झोपड़ी को टूटने नहीं देगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रदेश कांग्रेस श्रम प्रकोष्ठ अध्यक्ष दिनेश कौशल ने कहा कि कांग्रेस पार्टी प्रदेश के सभी मेहनतकश लोगों को एक जुट कर उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा राज में आज मेहनत मजदूरी करने वालों को दो समय का चूल्हा जलाना मुश्किल हो गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उन्होंने कहा कि एक तरफ गरीब मजदूर महंगाई की मार से परेशान है। दूसरी तरफ सरकार गरीबों को बेघर करने की साजिश कर रही है। कौशल ने कहा कि श्रम कांग्रेस प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले श्रमिकों को लामबंद कर उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी जाएगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कार्यक्रम को श्रम प्रकोष्ठ की मुख्य महासचिव पूनम कंडारी, कांग्रेस नेता विनोद कुमार एडवोकेट, राम गोपाल वर्मा, फरजान अंसारी, आजाद अंसारी, चंद्रपाल, लक्की राणा, बच्चन सिंह नेगी, मनीष गर्ग, कमल किशोर शर्मा, मानसिंह देशराज, विलियम तथा बड़ी संख्याएं श्रमिक उपस्थित रहे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इसलिए मनाया जाता है मई दिवस
प्रत्येक वर्ष दुनिया भर के कई हिस्सों में 1 मई को मई दिवस अथवा ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस जनसाधारण को नए समाज के निर्माण में श्रमिकों के योगदान और ऐतिहासिक श्रम आंदोलन का स्मरण कराता है। 1 मई, 1886 को शिकागो में हड़ताल का रूप सबसे आक्रामक था। शिकागो उस समय जुझारू वामपंथी मज़दूर आंदोलनों का केंद्र बन गया था। एक मई को शिकागो में मज़दूरों का एक विशाल सैलाब उमड़ा और संगठित मज़दूर आंदोलन के आह्वान पर शहर के सारे औज़ार बंद कर दिये गए और मशीनें रुक गईं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
शिकागो प्रशासन एवं मालिक चुप नहीं बैठे और मज़दूरों को गिरफ्तारी शुरू हो गई। जिसके पश्चात् पुलिस और मज़दूरों के बीच हिंसक झड़प शुरू हो गई, जिसमें 4 नागरिकों और 7 पुलिस अधिकारियों की मौत हो गई। कई आंदोलनकारी श्रमिकों के अधिकारों के उल्लंघन का विरोध कर रहे थे। काम के घंटे कम करने और अधिक मज़दूरी की मांग कर रहे थे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
19वीं सदी का दूसरा और तीसरा दशक काम के घंटे कम करने के लिये हड़तालों से भरा हुआ है। इसी दौर में कई औद्योगिक केंद्रों ने तो एक दिन में काम के घंटे 10 करने की मांग भी निश्चित कर दी थी। इससे ‘मई दिवस’ का जन्म हुआ। अमेरिका में वर्ष 1884 में काम के घंटे आठ घंटे करने को लेकर आंदोलन से ही शुरू हुआ था। उन्हें गिरफ्तार किया गया और आजीवन कारावास अथवा मौत की सजा दी गई। अब इस दिन को कर्मचारी, श्रमिक अपने अधिकार की लड़ाई के लिए मनाते हैं।
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