माघ माह के आगमन पर गोपाल चौहान की कविता- ये देवप्रयाग है
ये देवप्रयाग है,
पूस की विदाई, माघ आया
धूप, पौड़ी शिखरों को छोड़
प्रयाग निखर उठा है
और हवाओं ने
क्वीली पालकोट से भरपूर पट्टी तक
गीत छेड़ा है।
खासपट्टी ने सर्दियों का बंदोबस्त करके,
बोरिया बिस्तर बांध लिया है
और इस शहर में बंसत,
बसंत अब चढ़ रहा है ….। (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
फ्योंली, झूम उठेगी
घेन्डुड़ि, पधानु का छाजा
और घुघुती ने राग कहा है
संगम की आँखे अब नम हो चली,
बसंत पंचमी, रौनक ले आ चली है
झूला पुल अलसाया हुए है
और फिर “पूसू” ने “मंगसीरी” पुकारा है
और वहीं दुसरी तरफ
बीचला बाजार और मंदिर मोहल्ला
रातों में जाग रहा है
जी हाँ,
यह देवप्रयाग है और
पूस की विदाई, माघ आया।
कवि का परिचय
गोपाल चौहान। महड़ (देवप्रयाग) टिहरी गढ़वाल निवासी। वर्तमान में फरीदाबाद हरियाणा में निवासरत और दिल्ली में एक फर्म में अकाउंट असिस्टेंट हैं।
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Bhanu Bangwal
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मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।



