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October 30, 2026

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही मौतें, वैज्ञानिकों ने की वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने की मांग

जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल बढ़ते तापमान, सूखे और बाढ़ तक सीमित नहीं है। यह लोगों की जान, काम करने की क्षमता, भोजन और पानी की उपलब्धता तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर भी भारी पड़ रहा है। द लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से होने वाले कई स्वास्थ्य नुकसान 2016 से 2025 के दशक में उससे पहले के दशक, 2006 से 2015, की तुलना में तेजी से बढ़े हैं। लैंसेट काउंटडाउन की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, पेरिस जलवायु समझौते के बाद के दशक में गर्मी से होने वाले नुकसान तेजी से बढ़े। वर्ष 2023 में गर्मी से जुड़ी अनुमानित 7.1 लाख मौतें हुईं, जिनमें 71.5% का संबंध मानवजनित जलवायु परिवर्तन से था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

वैज्ञानिकों ने की वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने की मांग
रिपोर्ट के लेखकों ने जलवायु परिवर्तन को औपचारिक रूप से वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने और जलवायु से जुड़े हर फैसले में स्वास्थ्य को केंद्र में रखने की मांग की है। इसमें उत्सर्जन घटाने की नीतियों से लेकर जलवायु वित्त के इस्तेमाल तक, स्वास्थ्य प्रभावों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के नेतृत्व में तैयार इस रिपोर्ट में 30 से अधिक देशों के 100 से ज्यादा संस्थानों के 146 शोधकर्ताओं ने योगदान दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ रणनीतिक सहयोग में तैयार इस दसवीं वार्षिक रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों और जलवायु कार्रवाई से मिलने वाले स्वास्थ्य लाभों को समझने के लिए 54 संकेतकों का आकलन किया गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

गर्मी से मौतों का बढ़ता खतरा
रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2023 के बीच गर्मी से हर साल औसतन करीब 5.41 लाख मौतें जुड़ी थीं। इनमें से लगभग 68%, यानी सालाना करीब 3.70 लाख मौतों का संबंध मानवजनित जलवायु परिवर्तन से था। 2006 से 2015 के बीच गर्मी से जुड़ी मौतों में जलवायु परिवर्तन का अनुमानित हिस्सा 55% था।
वर्ष 2023 में, जो इस अवधि का सबसे गर्म साल था, गर्मी से जुड़ी अनुमानित मौतों की संख्या रिकॉर्ड 7.1 लाख तक पहुँच गई। इनमें 71.5% मौतें मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जुड़ी थीं। रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2023 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी से लगभग 30 लाख मौतें होने का अनुमान है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

लोगों की कमाई और काम करने की क्षमता पर भी गर्मी का असर
गर्मी का असर लोगों की कमाई और काम करने की क्षमता पर भी पड़ा। वर्ष 2025 में गर्मी के कारण काम की उत्पादकता घटने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को संभावित आय में करीब 1.07 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ। यह वैश्विक आर्थिक उत्पादन का लगभग 0.91% था। लगातार तीसरे साल यह नुकसान एक लाख करोड़ डॉलर से अधिक रहा।
दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका में इसका असर अधिक रहा। संभावित आय का नुकसान दक्षिण-पूर्व एशिया में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.9% और अफ्रीका में 3.2% के बराबर था। यूरोप में यह 0.2% और अमेरिका महाद्वीपों में 1.5% था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

खेती और निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को सबसे अधिक नुकसान हुआ। इन दोनों क्षेत्रों में अधिकतर काम बाहर और शारीरिक मेहनत वाला होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, गर्मी के कारण संभावित आय के कुल नुकसान में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 38% और निर्माण क्षेत्र की 29% थी। अफ्रीका में कृषि क्षेत्र का हिस्सा गर्मी से जुड़ी संभावित आय के नुकसान का 71% था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने कहा कि जलवायु परिवर्तन मानवता के सामने स्वास्थ्य के सबसे बड़े खतरों में से एक है। इसके प्रभाव बढ़ते गर्मी के तनाव, चरम मौसमी घटनाओं, खाद्य असुरक्षा और बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु नीतियों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देकर लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है और समाज को अधिक लचीला बनाया जा सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

सूखा और पानी की बदलती स्थिति
रिपोर्ट बताती है कि 2025 में दुनिया की 51.8% भूमि कम से कम एक महीने तक अत्यधिक सूखे की चपेट में रही। यह रिकॉर्ड में दूसरा सबसे खराब साल था। इससे पहले 2023 में सूखे का असर सबसे अधिक दर्ज किया गया था। 2016 के बाद से सूखे से प्रभावित क्षेत्र में वृद्धि की दर, 2006 से 2015 के दशक की तुलना में सात गुना से भी अधिक रही। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

पानी की उपलब्धता को लेकर भी चिंता बढ़ी है। उपग्रह आँकड़ों पर आधारित नए विश्लेषण के मुताबिक, 2003 के बाद से दुनिया की 43% भूमि पर लंबे समय में पानी के भंडारण में गिरावट आई, यानी ये क्षेत्र अधिक सूखे हुए। वहीं, 37% भूमि पर पानी के भंडारण में लंबे समय की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ये दोनों बदलाव मिलकर दुनिया की 80% से अधिक भूमि पर पानी की स्थिति में बड़े बदलाव दिखाते हैं।
पानी के भंडारण में ऐसे बदलाव खेती, खाद्य आपूर्ति और स्वच्छता को प्रभावित कर सकते हैं। जिन क्षेत्रों में पानी कम होता जा रहा है, वहाँ पेयजल और खेती की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, अत्यधिक पानी और बाढ़ वाले क्षेत्रों में घरों, फसलों और स्वास्थ्य सेवाओं को नुकसान हो सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

अत्यधिक बारिश का क्षेत्र भी बढ़ा
यही नहीं, अत्यधिक बारिश का क्षेत्र भी बढ़ा है। 2016 से 2025 के दौरान हर साल औसतन दुनिया की 17.2% भूमि पर बहुत अधिक बारिश दर्ज की गई, जबकि 2006 से 2015 के बीच यह अनुपात 14.8% था। इससे बाढ़, भूस्खलन और पानी से फैलने वाली बीमारियों का जोखिम बढ़ता है। लैंसेट काउंटडाउन की कार्यकारी निदेशक और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर मरीना रोमानेलो के मुताबिक, जलवायु से जुड़े कई स्वास्थ्य खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि कार्रवाई की रफ्तार उससे पीछे है। उन्होंने कहा कि सूखे का फैलना और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पानी की स्थिति का अधिक चरम होना इस खतरे को और गंभीर बनाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

स्वच्छ ऊर्जा से स्वास्थ्य को लाभ, लेकिन फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कायम
रिपोर्ट में जलवायु कार्रवाई के कुछ सकारात्मक परिणाम भी दर्ज किए गए हैं। वर्ष 2025 में स्वच्छ ऊर्जा में वैश्विक निवेश बढ़कर रिकॉर्ड 2.1 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। यह फॉसिल फ्यूल में हुए 1.16 लाख करोड़ डॉलर के निवेश से 82% अधिक था। रिन्यूएबल एनर्जी से बनने वाली बिजली की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। 2016 में कुल बिजली उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 5.5% थी, जो 2023 में बढ़कर 13.5% हो गई। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इस बदलाव का स्वास्थ्य पर भी लाभ दिखाई दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 के बाद कम से कम 77 देशों में फॉसिल फ्यूल से होने वाला वायु प्रदूषण घटने से हर साल अनुमानित 3.23 लाख मौतें टली हैं। इसके बावजूद, दुनिया की कुल ऊर्जा आपूर्ति में फॉसिल फ्यूल की हिस्सेदारी अब भी 80% से अधिक है। वर्ष 2024 में जलवायु को गर्म करने वाले उत्सर्जन रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गए। दुनिया भर में फॉसिल फ्यूल से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण हर साल अनुमानित 28 लाख मौतें होती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की 100 सबसे बड़ी तेल और गैस कंपनियों की उत्पादन योजनाएँ पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान लक्ष्य के अनुरूप नहीं हैं। उनकी योजनाओं के अनुसार, 2040 तक फॉसिल फ्यूल का उत्पादन इस लक्ष्य के अनुकूल स्तर से 150% अधिक हो सकता है। 2025 की रिपोर्ट में यह अंतर 138% बताया गया था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

फॉसिल फ्यूल पर सरकारी सब्सिडी भी चिंता का विषय है। ऊर्जा की कीमतों में उछाल के बाद 2022 से 2024 के बीच वैश्विक शुद्ध फॉसिल फ्यूल सब्सिडी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँची। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में दस देशों ने स्वास्थ्य प्रणालियों पर खर्च से अधिक राशि ऐसी सब्सिडी पर खर्च की। पेरिस समझौते के बाद से देशों ने कुल मिलाकर 6.20 लाख करोड़ डॉलर की शुद्ध सब्सिडी दी है, जो 2016 के मुकाबले दोगुनी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी बढ़ी, वित्त की कमी से बढ़े खतरे
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्वास्थ्य प्रणालियों की तैयारी में भी प्रगति हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 194 सदस्य देशों में से 56 ने अब जलवायु परिवर्तन के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाओं को तैयार करने के लिए राष्ट्रीय योजना बनाई है। 2015 में ऐसे देशों की संख्या केवल 14 थी। इसके अलावा, 47 देशों ने स्वास्थ्य सेवाओं की जलवायु संबंधी कमजोरियों का आकलन पूरा किया है। लगभग आधे सदस्य देशों ने बताया कि उनके पास ऐसी स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली है, जिसमें जलवायु संबंधी जानकारी भी शामिल होती है। सर्वेक्षण में जवाब देने वाले 145 देशों में से 75 ने कम से कम एक ऐसी शुरुआती चेतावनी प्रणाली होने की जानकारी दी, जो जलवायु की जानकारी का इस्तेमाल करती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट के मुताबिक, जहाँ चरम मौसमी घटनाओं के लिए स्वास्थ्य संबंधी शुरुआती चेतावनी प्रणालियाँ मौजूद हैं, वहाँ उनसे होने वाली मौतों में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी पड़ रही है। जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य को जोड़ने वाले राष्ट्रीय कानूनों की संख्या भी वर्ष 2000 के मुकाबले करीब 50 गुना बढ़ी है। जलवायु और स्वास्थ्य पर शोध के लिए उपलब्ध वित्तपोषण 2016 के 4.2 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2024 में 31.6 करोड़ डॉलर हो गया। यह 655% की वृद्धि है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इस राशि का 84% हिस्सा दुनिया के सबसे अमीर देशों के शोधकर्ताओं को मिला। इससे उन देशों में शोध की कमी बनी हुई है, जहाँ जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य संबंधी खतरे अधिक हो सकते हैं। स्वास्थ्य और जलवायु पर लैंसेट काउंटडाउन के सह-अध्यक्ष प्रोफेसर एंथनी कॉस्टेलो ने कहा कि पिछले दशक में यह प्रमाण मिला है कि स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर की गई जलवायु कार्रवाई काम करती है। स्वच्छ हवा, अधिक तैयार स्वास्थ्य सेवाएँ और शुरुआती चेतावनी प्रणालियाँ लोगों की सेहत की रक्षा कर रही हैं। लेकिन उत्सर्जन घटाने की रफ्तार और पैमाना जलवायु परिवर्तन से बढ़ते नुकसान के मुकाबले बहुत कम है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

सबसे कमजोर देशों के लिए जलवायु वित्त की कमी
जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन पर खर्च भी जरूरत से काफी कम है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन के अंतर्गत विकासशील देशों में स्वास्थ्य संबंधी अनुकूलन जरूरतों का अनुमान लगाने वाले 79 देशों में से 48 के उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर न्यूनतम जरूरत 3.3 अरब डॉलर सालाना आँकी गई है। 2024 में इसके लिए केवल करीब 1.1 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई गई। यह अनुमानित जरूरत का लगभग एक-तिहाई है। रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य क्षेत्र की राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं को लागू करने में वित्त और प्रशिक्षित लोगों की कमी सबसे बड़ी बाधाओं में हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

विदेशी सहायता बजट में कटौती से यह अंतर और बढ़ सकता है। इसका सबसे अधिक असर उन देशों और समुदायों पर पड़ने की आशंका है, जिनका जलवायु परिवर्तन में योगदान कम रहा है, लेकिन जो इसके प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फॉसिल फ्यूल उद्योग और उसके राजनीतिक सहयोगियों की लॉबिंग तथा भ्रामक सूचनाएँ जलवायु कार्रवाई के समर्थन को कमजोर कर सकती हैं। साथ ही, राष्ट्रीय सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और निजी क्षेत्र की ओर से स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भागीदारी में भी कमी देखी गई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

जलवायु परिवर्तन को स्वास्थ्य आपातकाल मानने की मांग
लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट के लेखक चाहते हैं कि जलवायु परिवर्तन को औपचारिक रूप से वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल माना जाए और विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व में समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया के लिए एक नया तंत्र बनाया जाए। उनकी मांग है कि सरकारें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से और न्यायसंगत कटौती करें, वैज्ञानिक शोध में लगातार निवेश करें और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए जलवायु वित्त बढ़ाएँ। रिपोर्ट यह भी सुझाव देती है कि जलवायु अनुकूलन के लिए वित्तीय सहायता कर्ज के बजाय अनुदान के रूप में दी जाए, ताकि कमजोर देश और अधिक कर्ज में फँसे बिना अपनी तैयारी मजबूत कर सकें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री और लैंसेट काउंटडाउन के बोर्ड की अध्यक्ष हेलेन क्लार्क ने कहा कि जलवायु परिवर्तन को स्वास्थ्य आपातकाल मानने के लिए सबूतों की कमी नहीं है। असली कमी राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। उन्होंने सरकारों से जलवायु कार्रवाई की प्रतिबद्धताएँ मजबूत करने, उत्सर्जन तेजी से घटाने और सबसे कमजोर समुदायों के लिए अनुकूलन सहायता बढ़ाने की अपील की। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है। जलवायु परिवर्तन से होने वाला नुकसान पहले से लोगों की सेहत, आजीविका और स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव डाल रहा है। स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर तैयारी से लाभ मिल रहे हैं, लेकिन मौजूदा प्रयास बढ़ते जोखिमों की भरपाई नहीं कर पा रहे। जलवायु नीति में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना आने वाले वर्षों में बीमारियों, मौतों और आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए अहम हो सकता है।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।