डेढ़ लाख रुपये तक है इस शॉल की कीमत, जानिए इसका इतिहास और खासियत, रखरखाव का तरीका
सर्दियां जैसे जैसे बढ़ रही है, इसके साथ हीलोग गर्म कपड़ों की खरीददारी भी करने लगते हैं। यदि बात शॉल की हो तो इस पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। वहीं, हम आपको ऐसी शॉल के बार में बता रहे हैं, जिसकी कीमत सुनकर आप हैरान हो जाओगे। साथ ही ये शॉल बेहद गर्म और खूबसूरत होती है। जी हां, ये शाल है भारत के कश्मीर में तैयार की जाने वाली पश्मीना शॉल। जो दुनिया भर में कश्मीरी शॉल के नाम से भी बेहद मशहूर है। यह बेहद ख़ूबसूरत, मुलायम और बहुत गर्म होती है। उसकी वजह से इसे दुनियाभर में ख़ूब पसंद किया जाता है। पश्मीना शॉल विदेशों में भी काफी फेमस हैं। कहा जाता है कि ये शॉल महिलाओं की पहली पसंद होती है, ये शॉल काफी गर्म भी होती है। क्योंकि ये भेड़ और याक के बालों से बनाई जाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एक शॉल बनाने में तीन बकरियों की जरूरत
पश्मीना शॉल, कश्मीरी ऊन से काते गए शॉल का एक अच्छा प्रकार है। यह विशेष ऊन लद्दाख के उच्च पठार की मूल चांगथांगी बकरी से प्राप्त की जाती है। ठंड के मौसम में च्यांगरी बकरियां खुद ही अपने शरीर से ऊन की एक ऊपरी परत को अलग कर देती हैं। इसे उनके शरीर से काटना नहीं पड़ता है। एक च्यांगरी बकरी से करीब 80 से 170 ग्राम तक ऊन निकलता है। इस प्रकार एक पश्मीना शॉल बनाने के लिए तीन बकरियों के ऊन की आवश्यकता पड़ती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
डेढ़ लाख तक है कीमत
इस शॉल के मशहूर होने की वजह इसकी कीमत भी है। बताया जाता है कि एक पश्मीना शॉल की कीमत पंद्रह सौ रुपए से शुरू हो कर डेढ़ लाख रुपये तक होती है। कारोबारियों के मुताबिक पश्मीना शॉल की कीमत इस बात से तय होती है कि वो किस जानवर के बालों से बनायी गयी है। कोई भी शॉल अगर याक के बालों से बनी हुई होताी है तो उसकी कीमत काफी ज्यादा ही होती है। कीमत अधिक होने के कारण ये शॉल स्टेटस सिंबल बनती जा रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एक शॉल में लगते है कई घंटे
इस शॉल को बनाने में एक से तीन महीने का वक्त तक लग जाता है। रोजाना 2 कारीगर इस शॉल को बनाते है और इसी दौरान शॉल का रंग भी तय किया जाता है। इसको बनाने का काम काफी मेहनत भरा होता है। इसे बनाने के लिए चेगू और चंगतांगी बकरी की नस्लों से मिलने वाली ऊन का इस्तेमाल किया जाता है। यह बकरी पहाड़ों की ज्यादा ऊंचाई पर मिलती है जहां आबोहवा बहुत ही मुश्किल होती है। एक बार में एक बकरी से बहुत कम ऊन ही मिल पाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
चेंगू नस्ल की बकरी से लगभग हर साल 100 ग्राम और चंगतांगी नस्ल की बकरी से 250 ग्राम पश्मीना ऊन मिलती है। इसके साथ ही इसे बनाने के लिए याक के बालों का भी इस्तेमाल किया जाता है। एक शॉल बनाने में लगभग 250 घंटों का वक्त और 3 बकरियों की ऊन लगती है। रोजाना 2 कारीगर इस शॉल को बनाते है और इसी दौरान शॉल का रंग भी तय किया जाता है। इसलिए इसका इतना महंगा होना लाज़मी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एक शॉल एक महीने में होती है तैयार
पश्मीना चांगरा बकरियों की ऊन से ही बनती है। जिसे के मिकल वॉश के बाद ही बनाया जाता है। एक पशमीना शॉल को बनाने में कम से कम एक महीने का समय लगता है। वहीं, इसके विपरीत एक सामान्य शॉल एक दिन में तैयार कर ली जाती है। पश्मीना का एक धागा सिर्फ14 से 19 माइक्रोन्स का होता है, यानि मनुष्य के बाल से भी छह गुना पतला। इसे बनाने वाले कारीगर इस काम में पारंगत होते हैं, क्योंकि जानकारी न होने पर इसके धागे टूटते हैं और बुनाई नहीं हो पाती। ऐसा माना जाता है कि पश्मीना का धागा जितना पतला होता है, वह उतना ही ज्यादा गर्मी देता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
50 साल तक ऐसे करें रखरखाव
पश्मीना शॉल को संभालकर रखने का भी एक तरीका है। पशमीना शॉल को घर पर भी धोया जा सकता है, बस उसका सही तरीका पता होना चाहिए। इसके लिए शॉल को ईजी में धोकर ड्रायर में सुखाने के तत्काल बाद ही उसे प्रेस करना जरूरी होता है। ऐसा करने से उसकी वास्तविकता बरकरार रहती है। इसके बाद इसे पेपर में तह कर रख दें। फिनायल की गोली डायरेक्ट न डालें, बरसात में एक बार धूप में जरूर डालें। जिन्हें इसकी जानकारी नहीं होती, वे उसे धोने के बाद निचोड़कर लटकाकर सुखाते हैं। ऐसा करने से उसका धागा रूखा होकर सिकुड़ जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस शॉल का नाम पश्मीना कैसे पड़ा
पश्मीना शब्द फारसी के ‘पश्म’ शब्द से बना है, जिसका मतलब होता है ऊन। पश्म का मतलब चरणबद्ध तरीके से ऊन की बुनाई भी बताया गया है। इसलिए इस विशेष प्रकार की शॉल का नाम पश्मीना शॉल पड़ा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पश्मीना शॉल का इतिहास
इतिहासकारों के मुताबिक 15वीं सदी में कश्मीर में ऊन उद्योग की स्थापना की गई थी। इसकी स्थापना उस दौर के शासक जैनुल आब्दीन ने की थी। इसके बाद कश्मीरी पश्मीना शॉल को बढ़ावा दिया गया। कुछ इतिहासकार 15वीं सदी के पहले भी पश्मीना शॉल का चलन मानते हैं। बताया जाता है कि मुगल शासन के दौर में पश्मीना शॉल की लोकप्रियता कश्मीर से बाहर निकल कर भारत के साथ- साथ दुनिया के अन्य कोनों तक पहुंची। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ऐसा बताया जाता है कि मुगल शासक बाबर के दौर में वफादारों को ‘खिलत’ (वस्त्र देने की) की एक परंपरा हुआ करती थी। इस परंपरा के अनुसार उपहार में कोट, गाउन और पगड़ी आदी के साथ पश्मीना ऊन से बने उपहार दिए जाते थे। जब अकबर ने कश्मीर को जीत लिया तो उसके बाद एक खास ‘खिलत’ समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में अकबर ने अपने दरबारियों और वफादारों को उपहार के तौर पर पशमीना शॉल दी थी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
मुगल साम्राज्य के दौर में पश्मीना शॉल एक कुलीनता की वस्तु के रूप में प्रचलित थी। उस दौरान पश्मीना शॉल और कंबल धनी लोगों के संकेतक वस्त्र हुआ करते थे। यह शॉल भारत के साथ- साथ नेपाल और पाकिस्तान में भी अमीर महिलाओं के दहेज का जरूरी हिस्सा थी। बाद में इन शॉलों को विरासत के रुप में उपयोग किया जाने लगा। उस दौरान इन शॉलों को खरीदना बेहद मंहगा हुआ करता था इसलिए ये विरासत में एक पीढी से दूसरी पीढ़ी को दी जाने लगी। बाद में ये शॉल व्यापार के माध्यम से भारत से यूरोप तक पहुंची, जहां इनको काफी लोकप्रियता मिली और बाद में पूरी दुनिया में फैल गई। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पहचान के लिए किए जाते हैं कई दावे
असली कश्मीरी पश्मीना शॉल की पहचान करने के लिए आज कल सोशल मीडिया पर कई लोग दावा करते हैं कि इसे किसी अंगूठी में एक ओर से डाल कर दूसरी ओर से निकाल सकते हैं। वहीं, कुछ लोग दावा करते हैं कि अगर पशमीना शॉल में छेद किया जाता है तो वो अपने आप वापस जुड़ जाता है या वो छेद अपने आप गायब हो जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ऐसे दावे भ्रामक
जानकार कहते हैं कि ऐसे दावे पूरी तरह गलत और भ्रामक है। बताया जाता है कि अगर पश्मीना शॉल में कोई छोटा छेद हो जाता है तो उसके फैब्रिक की बनावट के कारण दिखाई नहीं देगा। अगर किसी चीज का उपयोग कर के उसमें एक बड़ा छेद कर दिया जाता है तो उसका दोबारा जुड़ना बिल्कुल नामुमकिन है। क्योंकि ऐसा करने से शॉल के धागे टूट जाते हैं और वो फिर आपस में दोबारा कभी नहीं जुड़ते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पहचान का सरल तरीका
हालांकि कश्मीरी पश्मीना शॉल की पहचान का सबसे उत्तम तरीका है उस पर लगा ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग हैं। जीआई टैग केवल उन उन्हीं कश्मीरी पश्मीना प्रोडक्ट को मिलता है, जो पूरी तरह हाथ से बुने हुए होते हैं। इसलिए कश्मीर की हर एक पश्मीना शॉल पर जीआई टैग लगा होता है। हालांकि जो शॉल मशीन से बुने होते हैं, उन पर जीआई टैग नहीं लगता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
दुनिया की सबसे महंगी है शहतूश शॉल
शहतूश शॉल दुनिया की सबसे महंगी शॉल है जिसकी कीमत लगभग 15 लाख रुपये है। आपको बता दें कि शहतूश शब्द का अर्थ ऊन का राजा होता है। यह ऊन सबसे उत्तम माना जाता है और इसकी क्वालिटी सबसे अलग और दूसरे शॉल से अधिक सर्वोत्तम मानी जाती है। शहतूश में फाइबर की मोटाई 10 माइक्रॉन होती है। आपको बता दें कि इस शॉल को बनाने के लिए कई सारे चीरू को मारा जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
चीरू एक जानवर होता है जो तिब्बत की पहाड़ियों में पाया जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस शॉल को बनाने के लिए करीब 20 हजार चीरू मारे जाते हैं। इस शॉल को 16वीं शताब्दी में अकबर के शासन के समय पर बनाना शुरू किया गया था। उस समय केवल राज महलों में ही इस शॉल का उपयोग किया जाता था। फिर कुछ समय के बाद इसे लोग बेचने भी लगे और इसे ज्यादा से ज्यादा बनाया जाने लगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भारत में इसलिए है बैन
इस शॉल को बनाने में हजारों चीरू मारे जाते हैं इस कारण से साल 1975 में अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने शहतूश शॉल को बैन कर दिया था, लेकिन भारत में कश्मीर में लोग इस शॉल के बैन होने पर भी बेचते थे। फिर साल 2000 में इसे पूरी तरह से भारत में बैन कर दिया गया। यह शॉल बैन करने के पीछे कई सारे संगठनों ने चीरू की जनसंख्या कम होने का कारण बताया और फिर सरकार ने हमेशा के लिए इसे बैन कर दिया।
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Bhanu Prakash
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भानु बंगवाल
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।



