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July 12, 2026

शिक्षिका डॉ. पुष्पा खंडूरी की कविता-बीति ताहि बिसार दे

बीति ताहि बिसार दे
बैचेन मन सोचता बहुत है
तर्क बितर्क के जंजाल में
वो फंसता सा चला जाता है
निरन्तर जीता है अतीत में
और अपनी दशा का करता
रहता है विचारी कह आकलन
तरस खाता है बस दशा पर
अपनी और रोता है जार जार
सभी पर क्रोध करता है बेकार
भूलना चाहता है बेवश यादों को
अन किए अपने सब वादों को
तोड़ना चाहता है उस कारा को
जो उसके विचारों की मकड़ी ने
बुनी थी उसकी स्मृति के धागों से
पर तब बहुत देर हो चुकी होती है
अतीत से लेकर वर्तमान की खाई
और भी गहरी हो चुकी होती है
जिसको पाटना मुश्किल ही नहीं
अब नामुमकिन सा ही दिखता है
इसी लिए अतीत में नहीं हमें
वर्तमान में ही रहना और जीना है
हमें जी में भर कर नहीं।
जी भरकर जीना है॥
भविष्य फिर हमारा ही होगा
अतीत की स्मृतियाँ क्या हैं
ये वेवश यादें केवल सागर
तट पर बालू में पड़े निशान
जिन्हें हवा का एक झोंका
सागर की एक मौज जाने
कब बहा ले जाती है साथ
नहीं बचती हैं निशानियाँ
ऐसी क्षणिक है जिन्दगानियाँ
“बीति ताहि बिसार दे
बस ये पल ही तेरा है।
इसको ही तू संवार ले॥
कवयित्री की परिचय
डॉ. पुष्पा खंडूरी
प्रोफेसर, डीएवी (पीजी ) कॉलेज
देहरादून, उत्तराखंड