सोलर की जीत पक्की, फंडिंग की जंग बाकी
शाम ढल चुकी है। शहर रोशनी से भर गया है। कहीं सोलर के जरिये तो कहीं अब भी कोयले से बिजली बनकर आई है। इस रोशनी के पीछे एक और कहानी चल रही है, जो अक्सर दिखाई नहीं देती। यह कहानी है पैसे की। Institute for Energy Economics and Financial Analysis की एक नई रिपोर्ट इस कहानी को सामने लाती है। रिपोर्ट का नाम है “Financing the energy transition: A credit perspective on India’s power sector”। इसे केविन लेउंग, सौरभ त्रिवेदी और सोनी तिवारी ने मिलकर तैयार किया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रिपोर्ट सीधी बात कहती है। एनर्जी ट्रांजिशन अब सिर्फ टेक्नोलॉजी या पॉलिसी का सवाल नहीं है। असली खेल अब फाइनेंस का है। भारत ने लक्ष्य तय किया है, 2035 तक अपनी ऊर्जा का 60 फीसदी हिस्सा नॉन-फॉसिल सोर्सेस से लाना है। वहीं, इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जिस पैमाने पर निवेश चाहिए, वो चुनौती अब साफ दिख रही है। अनुमान है कि रिन्यूएबल, स्टोरेज और ट्रांसमिशन में सालाना निवेश 2032 तक 68 अरब डॉलर से बढ़कर 2035 तक 145 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यानी धूप और हवा से बिजली बनाना आसान हो रहा है। लेकिन उस सिस्टम को खड़ा करने के लिए जो पैसा चाहिए, वो सबसे बड़ा सवाल बन गया है। रिपोर्ट एक दिलचस्प ट्रेंड भी दिखाती है। फाइनेंशियल मार्केट खुद फैसला लेने लगा है कि भविष्य किसका है। रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों को ज्यादा भरोसेमंद माना जा रहा है। उनके पास फ्यूल का खर्च नहीं है, मुनाफा ज्यादा स्थिर है। उन्हें पूंजी भी आसानी से मिल रही है। दूसरी तरफ, कोयले पर आधारित थर्मल कंपनियों के लिए पैसा जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यह सिर्फ ट्रेंड नहीं है, यह स्ट्रक्चरल बदलाव है। और यही बदलाव आने वाले वर्षों में तय करेगा कि कौन सी कंपनियां टिकेंगी और कौन पीछे छूट जाएंगी। साथ ही भारत के सामने एक अपनी चुनौती भी है। देश का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट अभी भी कमजोर है। ज्यादातर कंपनियां कर्ज के लिए बैंकों पर निर्भर हैं। इसका मतलब है कि लंबी अवधि के सस्ते फाइनेंस के विकल्प सीमित हैं। ऊपर से, विदेशी निवेश पर ज्यादा निर्भरता भी जोखिम बढ़ाती है। जैसे ही वैश्विक हालात बिगड़ते हैं, पैसा तेजी से बाहर निकल सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रिपोर्ट इसीलिए एक अहम बात कहती है। भारत को अपने घरेलू निवेशकों को मजबूत करना होगा। पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियां और प्रोविडेंट फंड जैसे लंबे समय के निवेशक इस ट्रांजिशन को स्थिर बना सकते हैं। इस पूरी तस्वीर में एक बड़ा किरदार है, NTPC। देश की सबसे बड़ी पावर कंपनी, जिसके पास भारी निवेश योजना है। करीब 7 लाख करोड़ रुपये का कैपेक्स प्लान इसे इस स्थिति में लाता है कि यह पूरे सेक्टर के लिए फाइनेंस का रास्ता खोल सकती है। अगर NTPC साफ तौर पर ग्रीन ट्रांजिशन की दिशा पकड़ती है, तो बाकी कंपनियों के लिए भी रास्ता आसान हो सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यह सब सिर्फ क्लाइमेट की कहानी नहीं है। भारत अभी भी तेल और गैस के आयात पर निर्भर है। हर वैश्विक संकट, हर युद्ध, हर सप्लाई शॉक सीधे हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। ऐसे में साफ ऊर्जा की तरफ बढ़ना अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल बन गया है। रात गहरी हो चुकी है। शहर में रोशनी है। लेकिन इस बार फर्क यह है कि रोशनी का भविष्य तय हो चुका है। अब असली सवाल है, उस भविष्य को फंड कौन करेगा।
नोटः सच का साथ देने में हमारा साथी बनिए। यदि आप लोकसाक्ष्य की खबरों को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए गए आप्शन से हमारे फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ सकते हैं, बस आपको एक क्लिक करना है। यदि खबर अच्छी लगे तो आप फेसबुक या व्हाट्सएप में शेयर भी कर सकते हो। यदि आप अपनी पसंद की खबर शेयर करोगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। बस इतना ख्याल रखिए।

Bhanu Bangwal
लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


