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March 31, 2026

राजी भाषा एवं संस्कृति पर डॉ. शोभाराम शर्मा की पुस्तक का लोकार्पण

दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से सोमवार को उत्तराखंड की सबसे प्राचीन और विलुप्तप्राय जनजाति ‘राजी’ (वनरावत) के भाषाई और सांस्कृतिक इतिहास पर आधारित डॉ. शोभाराम शर्मा की महत्वपूर्ण कृति ‘राजी भाषा एवं संस्कृति’ का लोकार्पण संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम देहरादून स्थित केन्द्र के सभागार में आयोजित किया गया। बता दें कि 2011 में उत्तराखंड में वनराजियों की आबादी 690 के करीब थी। उनकी भाषा विलुप्त होने की कगार पर है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कार्यक्रम में विद्वानों ने राजी जनजाति को हिमालय की प्राचीनतम ‘आग्नेय’ (ऑस्ट्रोएशियाटिक) सभ्यता का अंतिम अवशेष बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया। सभी ने एक स्वर में माना कि राजी भाषा को बचाना केवल एक समुदाय को बचाना नहीं, बल्कि समूचे हिमालय की प्राचीन विरासत को बचाना है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कार्यक्रम की शुरूआत 93 वर्षीय वयोवृद्ध लेखक डॉ. शोभाराम शर्मा के वीडियो वक्तव्य से हुई। इसमें उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें राजी भाषा के अध्ययन की प्रेरणा मिली। 1955 से 1961 तक के राजी भाषा भाषियों के बीच जमीनी अध्ययन किया और फिर 1969 में आगरा विवि से पीएचडी की। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह राजी भाषा आग्नेय यानी मुंडा भाषा परिवार की भाषा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

 

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव व पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त नृप सिंह नपल्च्याल ने बताया कि पुस्तक को विलुप्तप्राय हिमालयी भाषाओं के अध्ययन की एक अमूल्य थाती बताया। उन्होने बताया कि विलुप्त होती भाषा के संरक्षण और बढ़ावे के लिए नीतिगत उपाय भी सुझाए और कहा कि राजियों को उनकी भाषा में प्राथमिक शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्होंने डॉ. शोभाराम शर्मा के साथ छात्र के रूप में अपने अनुभव भी साझा किए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

मुख्य चर्चाकार के रूप में उपस्थित प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. कविता रस्तोगी ने कहा हालांकि वह राजी को तिब्बती-बर्मी परिवार का मानती हैं, लेकिन डॉ. शर्मा का शोध इसमें ‘आग्नेय’ तत्वों की मौजूदगी की ओर इशारा करता है, जो भविष्य के भाषाविदों के लिए नई बहस का द्वार खोलता है। उन्होंने कहा कि यह राजियों की भाषा का देश में किया गया सबसे पहला विस्तृत भाषा वैज्ञानिक अध्ययन है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

भाषाविद् डॉ. कमला पंत ने पुस्तक के मानवीय पक्ष को छूते हुए कहा कि यह केवल एक व्याकरणिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि एक एक विलुप्त होती जनजाति की भाषा व संस्कृति का संरक्षण करने वाला ऐतिहासिक शोध दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि राजी पहले किसी को दुआ सलाम नहीं करते क्योंकि वे खुद को अस्कोट के राजवंश के बड़े भाई की संतान मानते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं डॉ. शोभाराम शर्मा के पुत्र अरविंद शेखर ने किया। उन्होंने कहा कि दून लाइब्रेरी की मदद से शोध के करीब 60 वर्ष बाद यह महत्वपूर्ण पुस्तक अब भाषाओं व संस्कृति विषय के शोधकर्ताओं को सुविधा जनक रूप से उपलब्ध हो सकेगी। प्रारम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने सभी का स्वागत किया और मंचासीन अतिथियों का परिचय दिया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन निकोलस हॉफलैण्ड ने दिया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इस अवसर पर डॉ. सुधारानी पाण्डेय, अनिल कार्की, डॉ. सुशील उपाध्याय, हयात सिंह रावत, राजेश सकलानी ऊषा नौडियाल रमाकांत बेंजवाल, महावीर रवाल्टां, सुधीर सिंह बिष्ट, डॉ. सुभाष थलेड़ी, बीना बेंजवाल, जितेन्द्र भारती, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट भगवान प्रसाद घिल्डियाल साहित अनेक साहित्यकार, भाषाविद और शोध छात्र, युवा पाठक व शहर के अन्य प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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