ईरान तनाव से एशिया की ऊर्जा चिंता बढ़ी, रिन्यूएबल एनर्जी की ओर तेज़ी से बढ़ना अब आर्थिक मजबूरी
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे ऊर्जा बाज़ार पर दिखने लगा है। ईरान के आसपास हालात बिगड़ने और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के रास्ते को लेकर अनिश्चितता के कारण तेल और गैस की कीमतों में तेज़ उछाल आया है। ऊर्जा अर्थशास्त्र पर काम करने वाली संस्था इंस्टीट्यूट फ़ॉर एनर्जी इकनॉमिक्स एंड फ़ाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की एक नई रिपोर्ट कहती है कि यह संकट एशिया के लिए एक बार फिर चेतावनी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम नहीं की गई, तो ऐसे झटके बार बार अर्थव्यवस्था को हिला सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ 27 फ़रवरी से 9 मार्च 2026 के बीच कच्चे तेल की कीमत लगभग 51 प्रतिशत बढ़ी, जबकि तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की कीमतों में करीब 77 प्रतिशत उछाल आया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इसलिए हो सकता है एशिया पर सीधा असर
स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक है। यहाँ से निकलने वाले तेल और एलएनजी का 80 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा एशिया के देशों तक जाता है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की एलएनजी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा क़तर और संयुक्त अरब अमीरात से आता है। इसलिए इस क्षेत्र में कोई भी तनाव एशिया की ऊर्जा लागत को तुरंत प्रभावित करता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रिपोर्ट बताती है कि एशिया के गैस बाज़ार का प्रमुख सूचकांक, जापान कोरिया मार्कर यानी JKM, भी तेज़ी से बढ़ा है। हाल ही में बांग्लादेश को एक एलएनजी कार्गो लगभग 28 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू के आसपास खरीदना पड़ा, जो पिछले महीने की तुलना में बहुत ज़्यादा है। पाकिस्तान ने बढ़ती कीमतों के कारण फिलहाल एलएनजी खरीद रोक दी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कम गैस, ज़्यादा बिल
IEEFA के सस्टेनेबल फ़ाइनेंस लीड रामनाथ एन. अय्यर ने मीडिया ब्रीफिंग में बताया कि ऐसा पहले भी हो चुका है। उनके मुताबिक़ 2022 के ऊर्जा संकट के दौरान पाकिस्तान और बांग्लादेश ने एलएनजी का इस्तेमाल कम किया था। लेकिन इसके बावजूद उनकी कुल आयात लागत लगभग दोगुनी हो गई थी। जापान में भी एलएनजी की मांग लगभग 3 प्रतिशत कम हुई थी, लेकिन खर्च 65 प्रतिशत तक बढ़ गया था। यानी कई बार देश कम ईंधन खरीदते हैं, फिर भी उन्हें ज़्यादा पैसा देना पड़ता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सरकारों के प्रयास
ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से महंगाई का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में कई सरकारें ईंधन पर सब्सिडी देती हैं, टैक्स कम करती हैं या बिजली के दाम नियंत्रित रखती हैं। रिपोर्ट कहती है कि ऐसे कदम लंबे समय में सरकारी बजट और कंपनियों पर भारी पड़ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर दक्षिण कोरिया की सरकारी बिजली कंपनी KEPCO को 2022 में भारी घाटा झेलना पड़ा था, क्योंकि ईंधन महंगा हो गया था, लेकिन उपभोक्ताओं के लिए बिजली के दाम तुरंत नहीं बढ़ाए गए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
गैस से महंगी पड़ रही बिजली
रिपोर्ट का एक बड़ा निष्कर्ष यह भी है कि मौजूदा कीमतों पर गैस से बिजली बनाना अब काफ़ी महंगा हो चुका है। IEEFA के अनुसार, अभी गैस आधारित बिजली की लागत लगभग 130 से 140 डॉलर प्रति मेगावाट घंटा तक पहुंच सकती है। इसके मुकाबले सोलर और विंड एनर्जी की औसत लागत दुनिया भर में लगभग 40 डॉलर प्रति मेगावाट घंटा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यानी कई जगहों पर रिन्यूएबल एनर्जी अब गैस से सस्ती पड़ रही है। रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर 1 गीगावाट सोलर क्षमता लगाई जाए, तो उसके पूरे जीवनकाल में करीब 3 अरब डॉलर तक एलएनजी आयात लागत से बचत हो सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एशिया के लिए संकेत
ऊर्जा विश्लेषक दिनीता सेत्यावती का कहना है कि अगर एशिया आयातित ईंधनों पर निर्भरता कम करता है, तो इससे आर्थिक स्थिरता भी मजबूत हो सकती है। वहीं पाकिस्तान की ऊर्जा विशेषज्ञ नाबिया इमरान ने कहा कि उनके देश में उपभोक्ताओं द्वारा अपनाई गई सोलर एनर्जी ने हाल के वर्षों में तेल और गैस आयात के अरबों डॉलर बचाए हैं। उनके मुताबिक़, अगर सोलर का विस्तार न हुआ होता, तो मौजूदा संकट का असर कहीं ज्यादा गंभीर होता। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
लंबी दौड़ का समाधान
रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ़ है। सब्सिडी, टैक्स कटौती या मौद्रिक नीति जैसे कदम केवल थोड़े समय के लिए राहत दे सकते हैं, लेकिन ऊर्जा बाज़ार की अस्थिरता से बचने का असली तरीका यही है कि देश रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार तेज़ करें। विश्लेषकों के अनुसार, सोलर और विंड अब सिर्फ़ जलवायु नीति का हिस्सा नहीं हैं। वे एशिया की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से भी सीधे जुड़ चुके हैं।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


