हर घर कुछ कहता है, छिपा कार्बन वहां खामोश रहता है
जब हम नया घर बनाते हैं, तो अक्सर सोचते हैं कि बिजली का बिल कितना आएगा, एसी कितना चलेगा, या घर कितना ठंडा रहेगा। एक सच्चाई ऐसी भी है, जो घर बनते ही शुरू हो जाती है और दिखती नहीं। वो है उस घर में छिपा हुआ कार्बन। Greentech Knowledge Solutions की एक नई रिपोर्ट इसी छिपे हुए कार्बन की कहानी सामने लाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
Building the Baseline: Embodied Carbon in India’s Urban Housing नाम की इस स्टडी में दक्षिण और पश्चिम भारत के 26 रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स का विश्लेषण किया गया है। इसमें जो तस्वीर निकलकर आई है, वो सिर्फ कंस्ट्रक्शन सेक्टर नहीं, बल्कि पूरे क्लाइमेट एजेंडा के लिए अहम है। यह स्टडी 12 से ज्यादा डेवलपर्स के साथ मिलकर की गई, जिसमें हर प्रोजेक्ट के मटेरियल और कंस्ट्रक्शन से जुड़े डेटा को इकट्ठा किया गया। खास बात यह है कि इसमें बिल्डिंग के “प्रोडक्ट स्टेज” यानी मटेरियल बनने से लेकर साइट पर पहुंचने तक के एमिशन को मापा गया, जिसे तकनीकी भाषा में A1 से A3 स्टेज कहा जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यहीं से एक अहम सवाल उठता है, क्या घर का कार्बन सिर्फ उसके इस्तेमाल से आता है, या उसके बनने से भी? रिपोर्ट साफ कहती है, घर का बड़ा हिस्सा उस कार्बन से बनता है, जो ईंट, सीमेंट और स्टील के उत्पादन में निकलता है। इसे ही एम्बॉडिड कार्बन कहा जाता है। यानी घर बनते वक्त ही उसका एक “कार्बन कर्ज” तय हो जाता है, जिसे बाद में कम करना आसान नहीं होता। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भारत में यह सवाल और भी बड़ा हो जाता है। देश का बिल्डिंग सेक्टर कुल ऊर्जा मांग का करीब 30% और ग्रीनहाउस गैस एमिशन का 25.6% हिस्सा है। और जैसे-जैसे शहर बढ़ रहे हैं, यह आंकड़ा और ऊपर जाने वाला है। अनुमान है कि 2050 तक भारत में करीब 40 करोड़ लोग और शहरों में जुड़ेंगे। इसका मतलब है, लाखों नए घर, और उनके साथ लाखों टन नया कार्बन। अब तक क्लाइमेट की बातचीत में ज्यादातर फोकस “ऑपरेशनल कार्बन” पर रहा है। यानी घर में रहने के दौरान बिजली, कूलिंग, लाइटिंग से निकलने वाले एमिशन। इसमें कुछ हद तक प्रगति भी हुई है, जैसे बेहतर इंसुलेशन, एनर्जी एफिशिएंट उपकरण और सोलर का इस्तेमाल। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
“एम्बॉडिड कार्बन” अब भी चर्चा के किनारे खड़ा है। रिपोर्ट बताती है कि कंस्ट्रक्शन मटेरियल्स में खासकर सीमेंट और स्टील सबसे बड़े योगदानकर्ता हैं। भारत जैसे देश में, जहां ये दोनों इंडस्ट्री बहुत बड़े पैमाने पर हैं, वहां इस कार्बन को नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। यह रिपोर्ट सिर्फ समस्या नहीं बताती, बल्कि एक बेसलाइन भी तैयार करती है। यानी अब पहली बार यह समझ बनने लगी है कि एक औसत शहरी घर में कितना एम्बॉडिड कार्बन होता है, और अलग-अलग प्रोजेक्ट्स में यह कितना बदलता है। इससे डिजाइनर और डेवलपर्स अपने फैसलों को कार्बन के नजरिए से भी देख पाएंगे, सिर्फ लागत या लुक्स से नहीं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
फरवरी में बेंगलुरु में इस पर एक स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन भी हुआ, जहां इंडस्ट्री, पॉलिसी और एक्सपर्ट्स ने मिलकर इस पर चर्चा की। यह रिपोर्ट NITI Aayog की हाल की बिल्डिंग सेक्टर डिकार्बनाइजेशन रिपोर्ट के बाद आई है, जिससे यह साफ है कि अब इस मुद्दे पर बातचीत तेज हो रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
असली चुनौती अभी बाकी है। भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है। इतिहास बताता है कि किसी भी ऊर्जा बदलाव में 50-60 साल लगते हैं। ऐसे में 45 साल के अंदर बिल्डिंग सेक्टर को कम-कार्बन बनाना आसान नहीं होगा।
इसके लिए सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि सोच में बदलाव भी जरूरी है। हमें यह समझना होगा कि “सस्टेनेबल घर” सिर्फ वो नहीं जो कम बिजली खाए, बल्कि वो भी है जो कम कार्बन लेकर बने। क्योंकि सच यही है, घर की कहानी सिर्फ दीवारों और छत की नहीं होती। उसमें छिपा कार्बन भी उसका हिस्सा होता है। अगर उसे नहीं समझा, तो क्लाइमेट की लड़ाई आधी ही लड़ी जाएगी।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


