आम बजटः आम आदमी को राहत के बिना विकासः जगमोहन मेंदीरत्ता
केंद्र सरकार की ओर से पेश किए गए केंद्रीय बजट को लेकर देशभर से मिलीजुली प्रतिक्रिया आ रही हैं। कोई इसे विकास से लेकर जोड़कर कर देख रहा है। वहीं, कई लोग इसे धोखा, फरेब और बदमाशी बता रहे हैं। बैंक कर्मचारी यूनियन उत्तराखंड के पदाधिकारी रह चुके एवं देहरादून में देहरादून सिटीजंस फोरम के संस्थापक सदस्य जगमोहन मेंदीरत्ता ने बजट को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। हम उनकी इस प्रतिक्रिया को लोकसाक्ष्य में वैसा ही ज्यों का त्यों लगा रहे हैं, जैसी उन्होंने भेजी है। बस आपसे अनुरोध है कि यदि उनकी बातों से सहमत हों तो खबर को शेयर जरूर करें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जगमोहन मेंदीरत्ता के विचार
हर साल केंद्रीय बजट को आम आदमी की आकांक्षाओं का दस्तावेज़ बताकर पेश किया जाता है। इनमें “समावेशी विकास”, “अंतिम छोर तक पहुँच” और “सशक्तिकरण” जैसे आकर्षक शब्दों का प्रयोग होता है, लेकिन हर साल की तरह इस बार भी आम आदमी बजट के बारीक अक्षरों में खुद को ढूँढता रह जाता है। नवीनतम बजट भी इसका अपवाद नहीं है। यह बाज़ारों को स्थिरता, निवेशकों को भरोसा और कॉरपोरेट भारत को निरंतरता का आश्वासन देता है, लेकिन यह उन करोड़ों लोगों को वास्तविक राहत देने में असफल रहता है, जिनका जीवन महँगाई, रोज़गार की असुरक्षा और सिमटती सार्वजनिक सेवाओं से प्रभावित है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
महँगाई: रोज़मर्रा की आपात स्थिति
आम आदमी के लिए अर्थव्यवस्था कोई जीडीपी आँकड़ा या राजकोषीय घाटा नहीं होती। अर्थव्यवस्था उसके लिए खाने-पीने की चीज़ों के दाम, ईंधन, किराया, परिवहन, स्वास्थ्य और शिक्षा का खर्च होती है। इन मोर्चों पर बजट कोई ठोस भरोसा नहीं देता। खाद्य महँगाई लगातार दबाव बनाए हुए हैं। ईंधन की कीमतें ऊँची बनी हुई हैं। अप्रत्यक्ष कर हर ख़रीद पर चुपचाप बोझ डालते हैं। बजट इस वास्तविकता का सामना करने से बचता है। सार्वभौमिक सब्सिडी के विस्तार, मूल्य नियंत्रण या सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मज़बूत करने की कोई गंभीर कोशिश नज़र नहीं आती। जब महँगाई स्थायी बन जाए और मज़दूरी ठहरी रहे तो हर वह बजट जो पुनर्वितरण से इंकार करता है। वस्तुतः ग़रीब-विरोधी बन जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रोज़गार: सबसे बड़ी कमी
इस बजट की सबसे बड़ी कमी है एक विश्वसनीय रोज़गार नीति का अभाव है। भारत आज एक विरोधाभास का सामना कर रहा है। ऊपर से आर्थिक वृद्धि, लेकिन ज़मीनी स्तर पर बेरोज़गारी और अर्ध-बेरोज़गारी दिखती है। आम आदमी, विशेषकर युवा, प्रवासी मज़दूर और असंगठित क्षेत्र के कामगार, एक ही सवाल पूछते हैं कि नौकरियाँ कहाँ हैं? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
बजट इसका जवाब इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और कौशल विकास की भाषा में देता है, लेकिन प्रत्यक्ष रोज़गार सृजन, शहरी रोज़गार गारंटी या सार्वजनिक क्षेत्र में भर्ती के विस्तार से बचता है। विकास के “नीचे टपकने” (trickle-down) की उम्मीद की जाती है। अनुभव बताता है कि ऐसा नहीं होता। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कर व्यवस्था: नीचे बोझ, ऊपर लाभ
कर ढांचा आज भी श्रम की तुलना में पूँजी को तरजीह देता है। कॉरपोरेट प्रोत्साहन, निवेशकों को आश्वासन और बाज़ार-हितैषी संकेत बजट की सोच पर हावी हैं, जबकि कम आय वाले परिवारों के लिए राहत नाममात्र की है। आम आदमी जीएसटी, ईंधन कर और उपयोग शुल्क के ज़रिये असमान रूप से कर चुकाता है। ऐसे कर जो आय के आधार पर भेद नहीं करते। इसके विपरीत, संपत्ति कर, उत्तराधिकार कर और गंभीर कॉरपोरेट कर सुधार अब भी वर्जित विषय बने हुए हैं। यह तटस्थता नहीं, बल्कि राजकोषीय नीति में अंतर्निहित वर्गीय पक्षधरता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सार्वजनिक सेवाएँ: सिमटता राज्य, बढ़ता खर्च
स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और आवास आम आदमी के असली सुरक्षा कवच हैं। लेकिन इन क्षेत्रों में सार्वजनिक खर्च ज़रूरत की तुलना में अपर्याप्त बना हुआ है। जैसे-जैसे राज्य पीछे हटता है, बाज़ार आगे बढ़ता है और वह भी कीमत वसूलकर। तब कमज़ोर सार्वजनिक सेवाओं की भरपाई आम आदमी को अपनी जेब से करनी पड़ती है, जिससे कर्ज़ और असुरक्षा बढ़ती जाती है। जो बजट सार्वजनिक सेवाओं को कमज़ोर करता है, वह आम आदमी को अपने अस्तित्व का निजीकरण करने के लिए मजबूर करता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कल्याण: अधिकार नहीं, कृपा
जहाँ कहीं कल्याण योजनाएँ दिखती भी हैं। वहाँ उन्हें सार्वभौमिक अधिकार की बजाय लक्षित सहायता के रूप में पेश किया जाता है। इससे सामाजिक सुरक्षा अधिकार न रहकर कृपा बन जाती है। पात्रता जांच, डिजिटल बहिष्करण और नौकरशाही विवेक पर निर्भर। आम आदमी अब अधिकार वाला नागरिक नहीं, बल्कि ऐसा लाभार्थी बनता जा रहा है जिसे बार-बार अपनी पात्रता साबित करनी पड़ती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
निष्कर्ष: लोगों से मुँह मोड़ता बजट
बजट एक मज़बूत और विकसित भारत की परिकल्पना का दावा करता है। लेकिन बहुसंख्यक जनता के रोज़मर्रा के संघर्षों से कटा हुआ विकास खोखला है। आम आदमी के लिए यह बजट सुरक्षा की जगह धैर्य, राहत की जगह उम्मीद, नीतियों की जगह कथाएँ पेश करता है। जब तक बजटों का मूल्यांकन बाज़ार की प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि रोज़गार, महँगाई, मज़दूरी और सार्वजनिक सेवाओं पर उनके असर से नहीं किया जाएगा, तब तक आम आदमी राजकोषीय नीति में वही बना रहेगा जो वह लंबे समय से है। भाषणों में मौजूद, लेकिन नीतियों में अनुपस्थित।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।



