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April 6, 2025

रिश्वत से जुगाड़ की एसोसिएशन, नशाबंदी हुई तो गम नहीं, पिकनिक पर रोक नहीं, लहलहाते खेत और डूबते घर का मंजर

जुगाड़ को अपनाने वालों का भी अलग अंदाज होता है। वे हर समस्या का कोई न कोई तोड़ निकालकर कुछ समय के लिए जुगाड़ कर ही देते हैं। शाम के समय अक्सर पीने वाले भी पीने के लिए कोई न कोई जुगाड़ तलाश ही लेते हैं।

जुगाड़ को अपनाने वालों का भी अलग अंदाज होता है। वे हर समस्या का कोई न कोई तोड़ निकालकर कुछ समय के लिए जुगाड़ कर ही देते हैं। शाम के समय अक्सर पीने वाले भी पीने के लिए कोई न कोई जुगाड़ तलाश ही लेते हैं। बिजली, पानी, टेलीफोन के बिल जमा कराने हों या फिर रेलवे के आरक्षण की लाइन हो, जुगाड़बाज यहां भी कोई न कोई जुगाड़ तलाशते हैं, जिससे उनका काम जल्द हो जाए।
कलक्ट्रेट स्थित एक दफ्तर में एक दिन मैं गया तो वहां बाबू हिसाब-किताब कर रहा था। वह मेरा परिचित था। वह हिसाब किताब में काफी तल्लीन था। मैने पूछा क्या कोई बड़ा काम आ गया है। इस पर वह बोला कि हम कुछ कर्मियों ने एक एसोसिएशन बनाई है। इसका नाम डीडीए रखा है। रिश्वत में मिली राशि से एसोसिएशन चल रही है। उसका ही हिसाब किताब कर रहा हूं। मेरी समझ में कुछ नहीं आया, तो मैने उस बाबू से पूछा कि ये डीडीए क्या है।
इस पर वह तपाक से बोला। इतना भी नहीं समझ पा रहे हो। डीडीए यानी डेली ड्रंकन एसोसिएशन। दफ्तर का काम निपटाने के बाद एसोसिएशन सक्रिय होती है। चंदा मिलाकर उसका खर्च सदस्य उठाते हैं। उसी का हिसाब-किताब जोड़ने में लगा हूं। उसकी बात सुनकर मुझे फकीरा की याद आ गई और मैं अतीत में खोने लगा।
फकीरा एक संस्थान में हेड कलर्क थे। तब मैं काफी छोटा था और मुझे यह पता था कि मोहल्ले में दो व्यक्ति काफी पियक्कड़ थे। इनमें से एक था मंगलू नाई, जो हर शाम कमाई को शराब की बोतल में उड़ा देता था। वह लड़खड़ाता, झूमता और गालियां बकता हुआ घर पहुंचता। दूसरा पियक्कड़ संस्थान में फकीरा था।
नाम शायद कुछ और था, लेकिन लोग उसे फकीरा ही कहते थे। फकीरा ने भी कुछ लोगों का ग्रुप बनाया था। शाम ढलते ही उनकी चौकड़ी पीने के लिए बैठ जाती। एक रात फकीरा ने कुछ साथियों के साथ शराब पी और लघुशंका के लिए समीप की झाड़ियों की तरफ गया। मित्र मंडली समीप ही खड़ी थी। फकीरा वापस आया तो उसकी गर्दन टेढ़ी हो चुकी थी। गर्दन नीचे को झुकी थी और वह परेशान था। संस्थान के डॉक्टर के घर मित्र मंडली फकीरा को लेकर गई। बताया कि लघुशंका के बाद से ही फकीरा की गर्दन टेढ़ी हो गई है। डॉक्टर ने परीक्षण के लिए कोट- पैंट उतारने को कहा। जब फकीरा कोट उतारने लगा तो डॉक्टर को मर्ज समझ आ गया। नशे में फकीरा ने पेंट का बटन कोट के काज में लगा दिया था। इससे खिंचाव होने पर गर्दन टेढ़ी हो गई।
वर्ष 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार चली गई और जनता पार्टी सत्ता में आई। तब देहरादून जिला यूपी राज्य में शामिल था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने नशाबंदी लागू कर दी। यूपी की प्रदेश सरकार ने भी इसे लागू कर दिया, लेकिन समीपवर्ती राज्य हिमाचल ने इसे लागू नहीं किया। शराबबंदी के दौरान अवैध शराब की कालाबाजारी भी खूब हुई और लोग पकड़े भी जाते। वह ऐसा दौर था जब संस्थान के कर्मचारी साल में एक बार आपसी चंदा एकत्र कर पिकनिक मनाने कहीं बाहर जाते थे। ऐसी पिकनिक ज्यादातर धार्मिक और तीर्थ स्थलों तक जाने की होती थी।
तब दारू मिल नहीं रही थी। एसे में फकीरा व उसके साथियों में छटपटाहट लाजमी थी। जुगाड़बाज फकीरा ने पिकनिक का कार्यक्रम अपने हाथ लिया और हिमाचल के शहर पांवटा साहिब की पिकनिक तय कर दी। मेरे पिताजी को यह नहीं पता था कि इस बार पांवटा की पिकनिक के पीछे क्या राज है। अक्सर वे मुझे भी अपने साथ पिकनिक ले जाते थे। जब पांवटा को बस चली तो मैं भी उनके साथ था। उस दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। तब बरसाती नदियों में पुल नहीं होते थे। ऐसे कई रपटे रास्ते में पड़े, जहां पानी काफी ज्यादा था। पानी उतरने का इंतजार भी कई स्थानों पर करना पड़ा। कई स्थानों पर ग्रामीण जुगाड़ से बस पार करा रहे थे। पैसा देने पर एक आदमी पानी में आगे चलता और उसके पीछे बस। उसे पता होता कहां पानी कम है।
खैर किसी तरह यमुना नदी का पुल पार कर हम हिमाचल प्रदेश पहुंच गए। पांवटा में जिस धर्मशाला में हम ठहरे वहां के बरामदे से नदी और पुल का नजारा साफ दिख रहा था। नदी के उस पार देहरादून जनपद की सीमा वाला क्षेत्र था। जहां फसल लहलहा रही थी। लोगों के पक्के मकान व झोपड़ियां भी पानी से काफी दूर नजर आ रही थी। नदी के पानी में वन विभाग के ठेकेदारों ने लकड़ी के स्लीपर छोड़े हुए थे। ट्रक की बजाय वे जुगाड़ से लकड़ियों को गणतव्य तक पहुंचाते थे। स्लीपर में पहचान के लिए नंबर लिखे होते और जगादरी या फिर किसी अन्य शहर में उन्हें पानी से बाहर निकाल लिया जाता था।
दारूबाज कर्मियों ने पांवटा पहुंचते ही छककर शराब पी। मैं पिताजी के साथ कुछ देर बाजार तक घूमा और फिर धर्मशाला पहुंचकर दूर के गांवों को निहारने लगा। तभी मेरा ध्यान गया कि, जो गांव पानी से करीब पांच सौ मीटर दूर थे, धीरे-धीरे पानी उन तक पहुंचने लगा। बारिश लगातार बढ़ रही थी। लगने लगा कि यमुना का पुल भी डूब जाएगा। देखते-देखते देखते सारे खेत नदी के पानी में समा चुके थे। पानी में डूबे मकानों से कुछ पुरुष सिर पर रखे टोकरे में सामान लेकर सुरक्षित स्थान की तरफ ले जा रहे थे। ये सिलसिला पूरी रात भर चला। रात को मुझे नींद भी नहीं आई। मैं उस काली बरसात को देखकर डर चुका था। जिसने कई घरों की रात काली कर दी थी।
खैर बाढ़ प्रभावित लोगों ने भी जुगाड़ का सहारा लिया और सुरक्षित स्थान पर चले गए। सुबह चर्चा होने लगी कि किस रूट से देहरादून वापस लौटा जाए। जगादरी, यमुनानगर व सहारनपुर का रूट लंबा था, लेकिन सुरक्षित माना जा रहा था। वहीं सीधे पुल पार कर देहरादून पहुंचने के लिए रास्ते के रपटों जैसा पानी का खतरा था। दारूबाज लंबे रास्ते से जाने को तैयार नहीं थे। क्योंकि वे पांवटा में कई दिनों की दारू का कोटा खरीद चुके थे। उन्हें डर था कि दूसरे लंबे रास्ते में ज्यादा स्थानों पर तलाशी होगी। ऐसे में कहीं उनकी दारू न पकड़ी जाए।
इस घटना के कई साल बाद मुझे पांवटा जाने का मौका मिला। सबसे पहले मैने उन्हीं गांवों की तरफ देखा, जिन्हें मै अपनी आंखों से डूबता देख चुका था। गांवों को निहारने पर फिर वही नजारा नजर आया, जो पहली बार देखा था। लहलहाते खेत मानो ये रह रहे थे कि यहां कभी कुछ भी नहीं हुआ। हां जहां पहले मैने झोपड़ियां देखी थी, वहां तब पक्के मकान बन चुके थे। तब मेरे साथ न पिताजी थे और न ही फकीरा। सिर्फ मेरे साथ थी पुरानी यादें।
भानु बंगवाल

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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