आप नेता रवींद्र जुगरान ने चमोली आपदा में रेस्क्यू ऑपरेशन पर जताई चिंता, उठाए सवाल

उत्तराखंड में आप नेता रवींद्र जुगरान ने 7 फरवरी को चमोली के रैणी गांव में आई आपदा के रेस्क्यू पर चिंता जताई। आप नेता ने कहा कि आज घटना के 6 दिन बीत गए हैं। अभी भी 166 के लगभग लोग लापता हैं, जबकि 38 शव अब तक बरामद हो चुके हैं। सबसे बड़ी चिंता का विषय टनल में फंसे वो 30 से 35 मजदूर हैं जो पिछले 6 दिनों से अन्दर फंसे हैं, जहां ऑक्सीजन की कमी है। रेस्क्यू टीम अब तक मलबे को पूरी तरह हटा कर वहां तक पहुंचने में कामयाब नहीं हो पाई।
आप नेता ने एनटीपीसी के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा पहले एनटीपीसी ने जिस टनल में मजदूरों के फंसे होने की बात कही ओर वहां रेस्क्यू टीम प्रयास कर रही थी, बाद में पता चला उस टनल में काम ही नहीं चल रहा था। यही नहीं वहां रेस्क्यू ऑपरेशन में मशीनों की वजह से भी तमाम दिक्कतें आई जहां कई बार मशीन खराब होने की बात भी सामने आई।
आप नेता ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल वहां पिछले 6 दिनों से मौजूद उन परिजनों के दिमाग में है जो अपनों के इंतजार में हैं। वे बेतहाशा इधर उधर भटक रहे। उनके दिल में अभी भी उम्मीद की किरण है कहीं से उनके अपने सुरक्षित रेस्क्यू टीम को मिल जाए। वहीं, जिस तरह से पिछले 6 दिनों से काम चल रहा, उससे भी उनको निराशा हो रही। हालत ये हो गए कि अब प्रशासन, सरकार के खिलाफ वो लोग नारेबाजी और विरोध में उतर आए हैं। जैसे जैसे दिन बढ़ते जा रहे वैसे वैसे उनकी उम्मीदें भी टूट रही है। कई परिजन ऐसे भी हैं, जो अब हताश होकर अपने घरों को खाली हाथ लौटने लगे हैं को सरकार के आपदा प्रबंधन पर सवाल खड़ा करता है ।
आप नेता ने कहा कि प्रशासन को अब मुस्तैदी दिखाते हुए तत्काल पीड़ितों को मुआवजा देना चाहिए। हेल्प लाइन सिस्टम भी बनाना चाहिए। ताकि पीड़ित परिवारों को अपनों से जुड़ी जानकारी मिल सके। उन्होंने कहा कि इस तबाही से अन्य 13 गांवों का संपर्क मुख्य घारा से कट चुका है। इन गांवों को जोडने वाले 5 पुल बह गए हैं। जहां पर प्रशासन हेलीकॉप्टर से मदद पहुंचाने में जुटा हुआ है। उन्होंने कहा कि भारी हानि हुई है, लेकिन अभी इसका आंकलन ठीक से नहीं किया जा सकता है। अभी भी कुछ लोग टनल में फंसे हुए हैं, जिन्हें रेस्क्यू के लगातार दिन रात प्रयास किए जा रहे हैं। हम आशा करते हैं कि वो लोग अभी सुरक्षित हों।
उन्होंने कहा,वर्ष 2013 में केदारनाथ में आई जलप्रलय त्रासदी से आखिर सरकार ने क्या सबक लिया। जलवायु परिवर्तन से पिघल रहे ग्लेशियर के कारण बन रही झीलों को क्यों स्टडी नहीं की गई। सवाल यही है कि जब हर सरकार विकास का श्रेय लेती है, तो विकास की कीमत पर होने वाले किसी भी विनाश का जिम्मा क्यों नहीं लेती ? यह अब स्थापित तथ्य होने जा रहा है कि उत्तराखंड में कोई आपदा यूं ही नहीं आती। यहां विनाश का सीधा संबंध सरकारी विकास से है। नीति घाटी में आई आपदा एक उदाहरण है। सरकार की ऐजेंसियां भले ही यहां फेल हो गयी, मगर नीति घाटी के ग्रामीणों को किसी भी अनहोनी का अंदेशा काफी पहले से था।




