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July 10, 2026

युवा कवयित्री प्रीति चौहान की कविता-जो तितलियों के पीछे कोसों दूर दौड़ती

जो तितलियों के पीछे कोसों दूर दौड़ती
उनके रंगों को हाथों में छापती
और फिर उस तितली को छोड़ देती खुले आसमान में
जो सुबह से शाम तक मशरूफ रहते अपनी ही दुनिया में
जो जेठ की गर्मियों में भी बिना सर ढके खेलती रहती
जो मोहल्ले में उन्माद मचाती हंसती गाती रहती
जो मां से डांट पड़ने पर फूट-फूट कर रोने लग जाती
और फिर मां की शिकायत बाबा से करती हैं
जो भाई बहनों पर अपना रोब जताती
खुद की गलती होने पर भी उन्हीं पर चिल्लाती
जो मां के खाने में भी नुक्स निकालती
हर त्योहार नए कपड़ों की फरमाइश करती
जो बड़ों का आदर मन से करती
मगर किसी के सामने सर नहीं झुकाती
जो बंधनों से मुक्त रही
जो किसी पिंजरे में नहीं रही
एक ऐसी लड़की थी
जिसे अब मै दर्पण में घंटो देखती और ढूंढती हूं
उस लड़की को जो न जाने कहां खो गई
या फिर दब गई समाज की परंपराओं के नीचे हमेशा हमेशा के लिए।
कवयित्री का परिचय
नाम-प्रीति चौहान
निवास-जाखन कैनाल रोड देहरादून, उत्तराखंड