नया सीखने के लिए होती है गलती, जो काम करेगा, वह गलत भी करेगा, यही है जीवन की रीत
सीखने की कोई उम्र नहीं होती। व्यक्ति हर समय किसी से किसी न किसी रूप में सीख सकता है। सीखने के मौके अपने आप आते हैं, सिर्फ ऐसे मौकों को भुनाने की आवश्यकता होती है।
सीखने की कोई उम्र नहीं होती। व्यक्ति हर समय किसी से किसी न किसी रूप में सीख सकता है। सीखने के मौके अपने आप आते हैं, सिर्फ ऐसे मौकों को भुनाने की आवश्यकता होती है। सीखाने वाला कोई भी हो सकता है। आपसे छोटा या बड़ा। कई बार तो गुरु ही शिष्य से सीख ले सकते हैं। शिष्य का ज्ञान अलग है और गुरु का ज्ञान अलग। एक दूसरे से सीखना ही समझदारी है। साथ ही गलतियों से सबक लेना भी आवश्यक है। कई व्यक्तियों को यह भ्रम हो जाता है कि उन्हें सबकुछ आता है। अब उनकी सीखने की उम्र नहीं है। ऐसा सोचकर वे अपने को ही धोखा देते हैं। सच ही कहा गया है कि अनजान होना उतनी लज्जा की बात नहीं, जितनी सीखने को तैयार न होना। अज्ञानी बनकर सीखने की प्रवृति ही व्यक्ति को महान बनाती है।गलती तो जीवन में हर व्यक्ति से होती है। इंसान गलती तो करेगा ही, लेकिन सही वही व्यक्ति है, जो गलती से सबक ले। आगे से गलती को न दोहराने का प्रयास करे। कई बार व्यक्ति यह जानते हुए भी कि वह गलत है, फिर भी अपनी बात पर अड़े रहते हैं। उसका प्रयास रहता है कि वह अपनी बात को सही साबित करें। यही नहीं ऐसे व्यक्ति अपनी गलती को छिपाते हैं और दूसरों का प्रचार करते हैं। दूसरों की गलती को ठीक करने की बजाय वे तो इस तलाश में रहते हैं कि कब दूसरा गलती करे और उन्हें उसके प्रचार करें।
दफ्तरों में ऐसी प्रवृति सहयोगियों में परस्पर देखी जाती है। दूसरों को गलत करते वे देखते हैं, लेकिन बताते नहीं हैं। बाद में तब बताते हैं, जब ठीक करने का समय निकल जाता है। ऐसे लोग चाटुकार प्रवृति के होते हैं, जो खुद के काम का बखान करते फिरते हैं और दूसरों को मूर्ख समझते हैं। अपने काम को महिमामंडित करके प्रस्तुत करना उनकी आदत होती है। मानों वही, सिर्फ वही, काम कर रहे हैं। दूसरे तो बेकार और निठल्ले हैं। मेरी अक्सर आदत है कि गलती पर दूसरे को टोक दिया करता हूं। इस पर मैं कई बार उस व्यक्ति के लिए बुरा बन जाता हूं, जिसे टोका गया है। क्योंकि सुनने व सीखने की तो शायद हर व्यक्ति की आदत खत्म हो रही है।
अक्सर जब भी मैं ऐसे विषय पर लिखता हूं, जिसकी मुझे ज्यादा जानकारी नहीं होती, तो उस विषय वाले के सामने ऐसा व्यवहार करता हूं जैसे मुझे उसकी जानकारी बिलकुल नहीं है। यानी शुरू से समझने का प्रयास करता हूं। मेरी अंग्रेजी कमजोर थी है और अब भी है। खेल की कमेंट्री, अंग्रेजी मूवी तो समझ आ जाती हैं, लेकिन यदि रिपोर्टिंग में अंग्रेजी बोलने वालों से पाला पड़े तो मेरी मुसीबत हो जाती थी। तब किसी तरह काम चलाना पड़ता था। सहयोगी पत्रकारों से पूछता। यदि कोई विदेशी सामने आ जाए और दूसरे रिपोर्टरों से अलग समाचार बनाना पड़े तो सहयोगी से पूछना भी बेकार है। ऐसे ही एक बार मैं ऐसे कार्यक्रम में चला गया, जिसमें कई देशों के लोग थे। वे हिंदू रीति रिवाजों के बारे में जानकारी ले रहे थे। उन्हें अपना रहे थे। पत्रकार आए और जानकारी लेकर चले गए। मैं वहीं जमा रहा। बाद में मैने आयोजकों से कहा कि मैं कुछ विदेशियों से बात करना चाहता हूं।
आयोजकों ने हामी भरी, लेकिन मेरी अंग्रेजी….। मैने आयोजकों से साफ कहा कि मैं हिंदी में सवाल करूंगा। आप लोगों में से कोई उनसे सवाल दोहराना। फिर उनके जवाब मुझे बता देना। आयोजक मान गए। फिर मैने कई सवाल किए। जवाब लिखता रहा। अगले दिन समाचार पत्र में मेरी बाइलाइन खबर प्रकाशित हुई। तब अमर उजाला में बाइलाइन लगना बड़ी बात कहलाती थी। साथी लोग बधाई दे रहे थे, पर मुझे ही पता था कि मैंने द्विभाषिये की मदद ली और मेरा काम चल गया।
एक कहानी है कि एक चित्रकार ने अपनी जीवन की सबसे बेहतर पेंटिंग बनाई और उसे सार्वजनिक स्थल पर लगा दिया। साथ ही उस पर लिख दिया कि इसमें जहां भी कोई गलती नजर आए, वहां निशान लगा दें। अगले दिन चित्रकार को यह देखकर काफी दुखः हुआ कि पूरी पेंटिंग पर निशान ही निशान लगे थे। फिर उसने दोबारा से वैसी ही पेंटिंग बनाई। उस पर लिख दिया कि जहां किसी को कोई गलती दिखे उसे ठीक कर सकता है। एक दिन बाद जब वह प्रतिक्रिया देखने पहुंचा तो देखा कि किसी ने पेंटिंग में कहीं भी संशोधन नहीं किया।
कई बार व्यक्ति को सच बोलने के बाद लगता है कि उसने गलती की है। एक महिला किसी संस्थान में नौकरी के लिए गई। उससे पूछा कि पिछली जगह उसे कितना वेतन मिलता है। इस पर महिला ने सच बता दिया। उसे नौकरी मिली और एक हजार रुपये बढ़कर मिले। उसी महिला की दूसरी साथी ने भी वहीं नौकरी के लिए अर्जी दी। उसे भी इंटरव्यू में बुलाया गया। उसने पिछला वेतन करीब चार हजार रुपये बढ़ाकर बताया। इस पर उसे भी एक हजार रुपये बढ़ाकर वेतन दिया गया। अब पहली महिला परेशान थी कि उसने सही वेतन बताकर गलती की।
फिर भी पर ऐसी गलती से पछतावा नहीं करना चाहिए। जिस महिला ने सच कहा उसे झूठ बोलने का जिंदगी भर मलाल नहीं रहेगा। फरेब से आगे बढ़ना आसान है, लेकिन हमेशा अपने को स्थापित बनाए रखना मुश्किल है। सच ही है कि आजकल काम की परख कम और झूठों को तव्वजो ज्यादा मिलती है, लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं चलता। एक न एक दिन नया सवेरा नई रोशनी लेकर जरूर आता है।
भानु बंगवाल



