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November 6, 2026

उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से की मुलाकात, उठाए ये मुद्दे

उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के 13 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन से मुलाकात कर उन्हें ज्ञापन दिया। इस मौके पर धामी सरकार पर राज्य की बेशकीमती जमीनों को औने-पौने दामों पर बेचने का आरोप लगाते हुए सरकार के निर्णयों को निरस्त करने की मांग की। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

राज्यपाल को सौंपे ज्ञापन में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति आपमें निहित है और अनुच्छेद 166 के अनुसार राज्य सरकार की समस्त कार्यवाही आपके नाम से होती है। जिन शासनादेशों से उत्तराखंड की सरकारी जमीनें और धरोहर भवन निजी हाथों में सौंपे जा रहे हैं, वे भी राज्यपाल की स्वीकृति के नाम से जारी हुए हैं। इसलिए राज्य की इन संपत्तियों के संवैधानिक संरक्षक आप हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

ज्ञापन में रखे गए ये तथ्य
1. मंत्रिपरिषद की शक्ति एक व्यक्ति के हाथ मेंः 20 दिसंबर 2022 के कैबिनेट निर्णय संबंधी शासनादेश द्वारा सभी विभागों की सरकारी भूमि पर अंतिम निर्णय का अधिकार मुख्यमंत्री को दे दिया गया। राज्य कैबिनेट का यह निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 164(2) के सामूहिक उत्तरदायित्व और कार्य नियमावली के नियम 3 (प्रभारी मंत्री) तथा नियम 7 (बहुविभागीय मामलों में परामर्श) के विपरीत है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

2. जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट, मसूरीः कैबिनेट के इस निर्णय के बाद उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद द्वारा हजारों करोड़ रुपये बाजार भाव वाली जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट, मसूरी की 142 एकड़ भूमि और राष्ट्रीय धरोहर 15 साल के लिए लगभग 1 करोड़ रुपये सालाना किराये पर एक निजी कंपनी को दे दी गई। प्रकाशित कंपनी अभिलेखों के अनुसार टेंडर की तीनों बोलीदाता कंपनियाँ एक ही व्यक्ति से जुड़ी थीं। सरकारी संपत्ति को इस प्रकार लीज पर देने का अधिकार किसी को नहीं था। मुख्यमंत्री द्वारा भूमि संबंधी निर्णय लेने के अधिकारों को अपने स्तर पर केंद्रित करने तथा बाजार में प्रतिस्पर्धा का आभास उत्पन्न कर सरकारी संपत्तियों के निजी आवंटन की प्रक्रिया अपनाने को लेकर गंभीर संवैधानिक एवं प्रशासनिक सवाल उत्पन्न हुए हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

3. जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट को लीज पर देने की प्रक्रिया में कार्य नियमावली (रूल्स ऑफ बिजनेस) और तब उत्तराखंड में प्रचलित “उत्तराखंड अधिप्राप्ति नियमावली” आदि के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ। इन निर्णयों की वैधानिकता और उनके लिए अपनाई गई प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा आवश्यक है।
4. यूआईआईडीबी अधिनियम, 2023 का उल्लंघनः सरकारी भूमियों और संपत्तियों के संबंध में बनाए गए यू0आई0आई0डी0बी0 अधिनियम, 2023 की धारा 28(3)(घ) के अनुसार हर परियोजना पर सरकार और संबंधित विभाग का अनुमोदन अनिवार्य है, और धारा 28(4) के अनुसार मुद्रीकरण राज्य सरकार के निर्देश पर ही हो सकता है। बाद में मूल विभाग की सहमति की शर्त यह कहकर हटा दी गई कि मुख्यमंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। सरकारी भूमियों और संपत्तियों को लीज हेतु यू0आई0आई0डी0बी0 को हस्तांतरित करने वाली फाइलों में किसी विभागीय मंत्री की सहमति दर्ज नहीं है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

5. सरकारी जमीनों और संपत्तियों को यूआईआईडीबी को देने के सभी निर्णय मुख्यमंत्री ने अकेले लिएः नियोजन विभाग की पत्रावली पर मुख्यमंत्री के अनुमोदन (जनवरी 2025) से शासनादेश संख्या 28, दिनांक 15.01.2025 जारी हुआ, जिससे पटवाडांगर, नगऊ, धनौल्टी और मगरा की भूमि दी गई। ई-पत्रावली ई-93327 के नोट 19 पर मुख्यमंत्री के अनुमोदन (19.11.2025) से आई0डी0पी0एल0 ऋषिकेश, डाकपत्थर, रामगढ़, एच0एम0टी0 रानीबाग, पाटकोट-मरचूला, सलेमपुर महमूद और माजरी ग्रांट की भूमि का रास्ता खुला और शासनादेश संख्या 815, दिसंबर 2025 जारी हुआ। पत्रावलियों से स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री जी ने सरकारी विभागों की संपत्तियों को लीज पर देने अथवा बेचने का निर्णय अकेले लिया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यू0आई0आई0डी0बी0 अधिनियम, 2023 के अनुसार ये निर्णय बोर्ड द्वारा लिए जाने थे, अकेले मुख्यमंत्री इन्हें नहीं ले सकते थे। जमीनें अनुशंसा समिति की संस्तुति पर दी गई हैं, जबकि यू0आई0आई0डी0बी0 अधिनियम, 2023 में अनुशंसा समिति का कहीं उल्लेख नहीं है। जमीनों और संपत्तियों को यू0आई0आई0डी0बी0 को हस्तांतरित करते समय संवैधानिक प्रावधानों, कार्य नियमावली (रूल्स ऑफ बिजनेस) तथा यू0आई0आई0डी0बी0 अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

6. बिना राजस्व अभिलेख और बिना पैमाइश के हस्तांतरणः 15 जनवरी 2025 को पटवाडांगर की भूमि यू0आई0आई0डी0बी0 को हस्तांतरित करने के लिए जारी शासनादेश में इस भूमि को “कृषि विभाग की” बताया गया है, जबकि राजस्व विभाग ने 04.09.2025 को अधिसूचना संख्या 661 से गाँव का सर्वेक्षण शुरू किया और राजस्व परिषद ने 09.09.2025 के पत्र संख्या 2708 में लिखा कि यह 108 एकड़ भूमि “वन विभाग एवं राजस्व विभाग के अभिलेखों में दर्ज नहीं” है। डाकपत्थर की भूमि भी बंदोबस्त पूरा हुए बिना और बिना खसरा संख्या के दे दी गई। बिना राजस्व अभिलेखों और स्पष्ट मालिकाना हक के भूमि का हस्तांतरण राज्य में प्रचलित भू-राजस्व अधिनियम तथा जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम का उल्लंघन है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

7. शासनादेशों की अपनी शर्तों और वन कानून का उल्लंघनः भूमि और संपत्ति हस्तांतरण के लिए निर्गत सभी शासनादेशों की शर्त है कि धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व की इमारत वाली भूमि नहीं दी जाएगी और भूमि केवल अनुमोदित परियोजना के लिए दी जाएगी। इनमें से कोई भी परियोजना अनुमोदित नहीं है। हर की पैड़ी का अलकनंदा होटल और ऋषिकेश सहित 25 निरीक्षण भवन (जिनमें 1866 से 1928 तक के ब्रिटिशकालीन भवन भी हैं) इस सूची में हैं। रामगढ़ के राजकीय उद्यान की 8 हेक्टेयर भूमि में से लगभग 4 हेक्टेयर घना वन है, जिसका गैर-वन उपयोग वन संरक्षण कानून के विरुद्ध है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

8. मूल्य तय किए बिना 90 साल की लीजः अनुशंसा समिति के 29.08.2025 के कार्यवृत्त के अनुसार भूमि के मूल्य और राजस्व साझेदारी पर चर्चा “आगामी बैठक” में होनी थी, फिर भी पटवाडांगर की 13.64 एकड़ भूमि 90 साल के लिए 37.80 करोड़ रुपये के रिजर्व प्राइस पर टेंडर कर दी गई। नैनीताल शहर के सीवर ट्रीटमेंट प्लांट को होटल परियोजना के लिए वहाँ से हटाने के निर्देश दिए गए। प्रचलित बाजार भाव के अनुसार कम से कम 1,00,000 करोड़ रुपये की ये 40 सरकारी संपत्तियाँ राज्य के 13 में से 12 जिलों में हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

की गई ये मांग
(1). जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट से संबंधित सभी पत्रावलियाँ मँगाई जाएँ, नियम विरुद्ध की गई जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज निरस्त की जाए और पूरे मामले की उच्च न्यायालय की निगरानी में स्वतंत्र जाँच कराई जाए।
(2). 20 दिसंबर 2022 के कैबिनेट निर्णय के अंतर्गत मुख्यमंत्री द्वारा अकेले लिए गए सभी निर्णय तथा उनसे जारी शासनादेश निरस्त किए जाएँ।
(3) यू0आई0आई0डी0बी0 के तीनों टेंडर, पटवाडांगर (टेंडर संख्या 97862/2026), अलकनंदा होटल हरिद्वार (टेंडर संख्या 99265/2026) और ऋषिकेश निरीक्षण भवन (टेंडर संख्या 99301/2026), तत्काल निरस्त किए जाएँ।
(4). यू0आई0आई0डी0बी0 और सिडकुल को दी गई सभी जमीनें और संपत्तियाँ उनके मूल विभागों को वापस की जाएँ, और लोक निर्माण विभाग के निरीक्षण भवनों को पी0पी0पी0 में देने की प्रक्रिया रोकी जाए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

अन्य मुद्दे भी उठाए
1. कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति का मामलाः
राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में माननीय न्यायालय द्वारा मुकदमा दर्ज करने की अनुमति से संबंधित निर्देश दिये जाने के बावजूद राज्य सरकार द्वारा अभी तक आवश्यक अनुमति प्रदान नहीं की गई है। यह अत्यंत गंभीर विषय है कि जब किसी जनप्रतिनिधि के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले में न्यायालय द्वारा निर्देश दिये गये हों, तब सरकार की ओर से कार्रवाई में देरी क्यों की जा रही है? इससे सरकार की भ्रष्टाचार के प्रति कथित जीरो टॉलरेंस की नीति पर भी सवाल उठते हैं। अतः इस मामले में तत्काल वैधानिक अनुमति एवं निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

2. कोरोना काल में सहकारिता विभाग की भर्तियों में कथित घोटालाः
कोरोना महामारी के दौरान जब आम नागरिकों को घरों से बाहर निकलने तक की अनुमति नहीं थी तथा पूरा देश अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा था, उस समय प्रदेश के सहकारिता मंत्री धन सिंह रावत के कार्यकाल में राज्य से बाहर प्रतियोगी परीक्षा आयोजित कर सहकारिता विभाग में भर्तियां की गईं। इन भर्तियों में कथित रूप से अभ्यर्थियों से 20-20 लाख रुपये लेकर नौकरियां बेचे जाने के गंभीर आरोप सामने आये हैं। यह प्रकरण न केवल युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि प्रदेश की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। इस पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच एजेंसी से जांच कराई जानी अत्यंत आवश्यक है, ताकि दोषियों को चिन्हित कर उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जा सके। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

3. एमबीबीएस दाखिलों में फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल का मामलाः
विगत वर्ष प्रदेश में एमबीबीएस की कई सीटों पर कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दाखिले किये जाने का मामला प्रकाश में आया था। चिकित्सा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इस प्रकार की अनियमितताएं न केवल योग्य एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के अधिकारों का हनन हैं, बल्कि चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और गुणवत्ता के लिए भी गंभीर खतरा हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने गंभीर मामले में अभी तक प्रभावी एवं निर्णायक जांच सामने नहीं आई है। अतः इस प्रकरण की समयबद्ध जांच कराकर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए तथा अनुचित तरीके से प्राप्त दाखिलों के संबंध में नियमानुसार निर्णय लिया जाना चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

ज्ञापन में कहा गया कि उपरोक्त तीनों प्रकरण राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण से सीधे जुड़े हुए हैं। इन मामलों में सरकार की चुप्पी और कार्रवाई में देरी से यह संदेश जा रहा है कि सत्ता में बैठे प्रभावशाली व्यक्तियों को संरक्षण दिया जा रहा है, जबकि आम नागरिकों एवं युवाओं के लिए न्याय प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी प्रतिनिधिमंडल ने कहा इस ज्ञापन की प्राप्ति के 10 दिनों के भीतर उपरोक्त निर्णयों को निरस्त करने और संपत्तियों को उनके मूल विभागों को लौटाने की कार्यवाही की जाए। यदि इस अवधि में राज्य सरकार और मुख्यमंत्री के ये निर्णय वापस नहीं लिए गए और जमीनें विभागों को नहीं लौटाई गईं, तो उत्तराखंड की जनता की संपत्ति बचाने के लिए कांग्रेस को मजबूरन माननीय उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने राज्यपाल के संज्ञान मे यह भी लाते हुए कहा कि काबिना मंत्री रेखा आर्य के पति ने उनपर 210 करोड़ का घोटाला करने का आरोप लगाया है जिसकी सी बी आई तथा ई डी के माध्यम से जाँच कराई जानी आवश्यक है। प्रतिनिधिमंडल में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, चुनाव प्रबन्धन समिति के अध्यक्ष डॉ हरक सिंह रावत, विधायक मदन बिष्ट, फुरकान अहमद, पूर्व विधायक मनोज रावत, प्रदेश उपाध्यक्ष सीपी सिंह, राजीव महर्षि, प्रदेश महामंत्री राजेन्द्र शाह, महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष जयोति रौतेला, सुरेन्द्र सिंह रांगड, राजेश चमोली आदि शामिल थे।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।