सरकार ने नहीं सुनी तो उत्तराखंड के इन गांवों के लोग कड़ाके की ठंड में सड़क निर्माण में जुटे, देखें वीडियो

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में जौनपुर क्षेत्र में बंगशील से ओडार्सू मोटर मार्ग या संपर्क मार्ग की मांग काफी समय से की जा रही है। इसके बावजूद शासन और प्रशासन ने ग्रामीणों की सड़क की मांग को पूरा नहीं किया। ऐसे में अब पट्टी पालीगाड़ के साथ साथ दशजूला जैसी चार पट्टियों के ग्रामीणों ने खुद संपर्क मार्ग तैयार करने का बीड़ा उठाया है। हालांकि, आश्वासन तो उन्हें एक बार फिर से मिला है, लेकिन इससे पहले ग्रामीण सड़क निर्माण में जुट गए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इन दिनों पर्वतीय इलाकों में कड़ाके की सर्दी पड़ रही है। वहीं, इस क्षेत्र के पुरुष, महिलाएँ, बुजुर्ग और बच्चे गांव के रास्ते को बनाने के लिए कुदाल, फावड़ा, दराती और अन्य औजार लेकर हर दिन जुट रहे हैं। इस अभियान में रिवर्स माइग्रेशन के लिए अपने गाँव में 1500 सेब और कीवी के पेड़ लगाने वाले भुयाँसारी के विमल नौटियाल भी हैं। साथ ही उत्तराखंड की ओर से डी20 सम्मेलन में प्रतिनिधित्व करने वाली पड़ोसी गाँव की ही शोभना देवी भी ग्रामीणों का साथ दे रही हैं। इसके साथ ही क़रीब 3000 लोग इस संपर्क मार्ग के श्रमदान और निर्माण में अपना हर संभव योगदान दे रहे हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ये है मोटर मार्ग का मामला
बंगशील से ओडार्सू मोटर मार्ग कई सालों से थत्यूड़ जौनपुर क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। साल 2019 में क़रीब 13 गांव के लगभग सभी ग्राम प्रधान, जनप्रतिनिधि इस सड़क के निर्माण के पक्ष में एकजुट हुए थे और महापंचयत आयोजित की गई थी। इसमें सड़क मार्ग से प्रमुख रूप से प्रभावित होने वाले 13 मुख्य गांव के प्रधान, क्षेत्रपंचायत प्रतिनिधि, क्षेत्रीय लोग, सामाजिक कार्यकर्ता, वन विभाग व लोक निर्माण विभाग के अधिकारी मौजूद रहे। सभी लोगों की सर्वसम्मति से महापंचायत ने यह निर्णय लिया था कि बंगशील गांव से सड़क देवलसारी के पैदल रास्ते से मिलकर ओडार्सू गांव जाएगी, जिससे देवदार के वृक्षों का कटान बच जाएगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एक गांव से दूसरे गांव जाने में तय करनी पड़ती है 20 किमी की दूरी
बता दें कि बंगशील से ओडार्सू, दोनों गांव सड़क से तो जुडे़ हैं, किन्तु दोनों गांवों के बीच की करीब चार किमी की दूरी सड़क मार्ग से नहीं जुड़ पाई है। इस कारण एक गांव से दूसरे गांव जाने के लिए लगभग ग्रामीणों को 18 से 20 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। साथ ही अब ये मार्ग उत्तरकाशी एवं चिन्यालिसौड के लिए भी इन तमाम गाँवों को इकतरफ़ा कनेक्टिविटी प्रदान करने में सहायक होगा। जहां से कि जौनपुर के अधिकांश हित जुड़े हुए हैं। यदि यह चार किमी सड़क बन जाए तो दोनों गांव आपस में मोटर मार्ग से जुड़ जांएगे व लगभग 14 से 16 कि० मी० का फासला भी कम हो जाएगा। इसी दूरी को कम करने के लिए बंगशील ओडार्सू मोटर मार्ग निर्माण क्षेत्रवासियों की प्रमुख मांग रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
वीडियो में देखें श्रमदान करते ग्रामीण
पलायन रोकने को सड़क सुविधा जरूरी
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें भी मुख्यधारा से जुड़ने का अधिकार है। इस क्षेत्र में भी रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ, पर्यटन की सुविधा का लाभ सभी ग्रामीण उठा सकेंगे। उनकी शिकायत है कि फारेस्ट के अधिकारी ख़ुद लोगों से जंगली जानवरों की डर से घरों से बाहर ना निकालने की अपील करते हैं, तो ऐसे में वो अपने बच्चों को स्कूल भी कैसे भेज पाएँगे। इन जंगलों से आवाजाही समय के साथ और भी ख़तरनाक होती जा रही है। यदि इलाक़े में पलायन को रोकना है तो उसके लिए उन्हें सड़क और सुविधाएँ भी चाहिए। आज वहाँ पर श्रमदान करने के लिए हर जाति और वर्ग के लोग एकजुट हो रखे हैं। इस क्षेत्र में लोकसभा चुनाव के बीच ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ के नारे भी लगे थे और ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार भी किया था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पर्यावरणविद्द नहीं चाहते सड़क
दोनो गांवों को सड़क से जोड़कर पूरे क्षेत्र का विकास भी संभव है, लेकिन इन सब बातों के बीच कुछ पार्यवरणविद और ईकोसिस्टम से जुड़े NGO इस सड़क का निर्माण नहीं चाहते। उनका कहना है कि सड़क निर्माण से कई पेड़ कटेगें, जबकि जो पुराना आवागमन का पारंपरिक मार्ग है, उसी में यदि वाहन जाने लायक़ सुविधा हो जाए तो उसमें कहीं भी पेड़ों को नुक़सान नहीं हो रहा है। हालाँकि ग्रामीणों की सड़क की माँग का मामला टिहरी ज़िलाधिकारी मयूर दीक्षित के पास पहुँच गया है। इसमें उन्होंने संबंधित अधिकारियों को उचित कार्रवाही करते हुए इस मामले का समाधान निकालने के आदेश दिये हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास जब यह मामला पहुँचा तो उन्होंने इसका संज्ञान लेते हुए यह आश्वासन दिया है कि आचार संहिता हटने के बाद वे ख़ुद इस सड़क मार्ग के लिए स्थानीय नागरिकों के हित में उचित कार्रवाई करेंगे। हालाँकि 45 गाँवों के ये ग्रामीण अपने श्रमदान से कड़ाके की ठंड, बर्फ और बारिश के बीच भी मौक़े पर डटे हुए हैं और मार्ग बनाने में जुटे हैं।
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।