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March 18, 2026

भारत के उर्वरक सिस्टम की कमजोरी, हॉर्मुज़ की हलचल से खेतों तक संकट, उर्वरक निर्भरता पर बड़ा सवाल

रातों-रात कुछ नहीं बदलता। फिर भी यदि दुनिया की सबसे अहम समुद्री गलियों में अगर हलचल बढ़ जाए, तो उसका असर चुपचाप खेतों तक पहुंच जाता है। इसी कड़ी में एक नई रिपोर्ट ने भारत के उर्वरक सिस्टम की एक गहरी कमजोरी की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट कहती है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ जैसे अहम रास्तों पर जोखिम, भारत की उर्वरक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यह रिपोर्ट बताती है कि भारत की उर्वरक व्यवस्था, खासकर यूरिया उत्पादन, बड़े पैमाने पर आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भर है। यह गैस अक्सर उन्हीं इलाकों से आती है जहां अभी भू-राजनीतिक तनाव सबसे ज्यादा है। समस्या सिर्फ सप्लाई की नहीं है। कीमत भी एक बड़ा कारक है। अगर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में किसी तरह का व्यवधान आता है, तो वैश्विक गैस कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर भारत में उर्वरक उत्पादन लागत पर पड़ेगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यहां से कहानी सिर्फ उद्योग तक सीमित नहीं रहती। यह कहानी खेत तक जाती है, किसान तक जाती है, और अंततः देश की खाद्य सुरक्षा तक पहुंचती है। रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि भारत पहले से ही उर्वरकों पर भारी सब्सिडी खर्च कर रहा है। ऐसे में अगर गैस महंगी होती है, तो सरकार पर वित्तीय दबाव और बढ़ेगा। यानी एक तरफ आयात निर्भरता, दूसरी तरफ बढ़ती सब्सिडी। दोनों मिलकर सिस्टम को और अस्थिर बनाते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है कि भारत का उर्वरक उपयोग, खासकर नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का असंतुलित है। इसका असर मिट्टी की सेहत पर पड़ रहा है। यानी जो मॉडल अभी चल रहा है, वह न तो आर्थिक रूप से टिकाऊ है और न ही पर्यावरण के लिहाज से बेहतर है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट का संकेत साफ है कि ऊर्जा सुरक्षा और कृषि सुरक्षा अब अलग-अलग मुद्दे नहीं रह गए हैं। वे एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अगर भारत को इस जोखिम से बाहर निकलना है, तो सिर्फ सप्लाई बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। उर्वरक उपयोग के तरीके बदलने होंगे, वैकल्पिक पोषक तत्वों को बढ़ावा देना होगा, और सबसे अहम, गैस पर निर्भरता कम करनी होगी। क्योंकि अगर समुद्र में उठी हलचल खेत तक असर डालने लगे, तो यह सिर्फ ऊर्जा का संकट नहीं रह जाता। यह भोजन और भविष्य दोनों का सवाल बन जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

टेक्सास विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री और फूड सिस्टम विशेषज्ञ राज पटेल इस संकट को एक बड़े ढांचे की समस्या मानते हैं। उनका इशारा साफ है कि यह कमजोरियां संयोग नहीं हैं। यह हमारी अपनी पसंद का नतीजा है। दुनिया भर में फॉसिल फ्यूल्स पर भारी सब्सिडी दी जाती है। कृषि सिस्टम उसी पर टिका है। हमने इस निर्भरता को खुद बनाया है। यह सिर्फ सप्लाई चेन का संकट नहीं, बल्कि नीति और निवेश का भी सवाल है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इस संकट का सबसे सीधा असर किसान पर पड़ता है। ईस्टर्न अफ्रीकन फार्मर्स फेडरेशन के प्रमुख स्टीफन मुचिरी (Stephen Muchiri) कहते हैं कि उर्वरकों की कमी और बढ़ती कीमतों का डर पहले से ही किसानों की चुनौतियों को बढ़ा रहा है। कई जगहों पर मौसम भी अनिश्चित हो गया है। ऐसे में सरकारों को स्थानीय विकल्पों, जैसे बायो-फर्टिलाइजर और टिकाऊ खेती में निवेश करना होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यानी, जलवायु और बाजार दोनों मिलकर दबाव बना रहे हैं। एशिया के किसानों के सामने भी यही दुविधा है। इंटर-कॉन्टिनेंटल नेटवर्क ऑफ ऑर्गेनिक फार्मर ऑर्गनाइजेशन्स की अध्यक्ष शमिका मोने (Shamika Mone) कहती हैं कि उर्वरक महंगे हो रहे हैं और बुवाई का समय करीब है। किसान लागत और उत्पादन के बीच फंसे हैं। उपभोक्ता पहले से ही महंगाई झेल रहे हैं. हमें इस चक्र से बाहर निकलना होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यह “रोलरकोस्टर” सिर्फ किसानों के लिए नहीं, खाद्य कीमतों के जरिये हर उपभोक्ता तक पहुंचता है। वर्ल्ड रूरल फोरम की निदेशक बेलेन सिटोलर (Belén Citoler) इसे एक बड़े संकट की तरह देखती हैं। वह कहती हैं कि यह सिर्फ उर्वरक या कमोडिटी का संकट नहीं है। यह एक कमजोर खाद्य प्रणाली की परीक्षा है, जो लचीली नहीं है। उनके मुताबिक, समाधान मौजूद हैं, लेकिन वे अक्सर छोटे किसानों के हाथों में हैं, जो एग्रोइकोलॉजी जैसे तरीकों को अपनाते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

ये हैं विकल्प
रिपोर्ट और विशेषज्ञ दोनों एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना प्राकृतिक और जैविक विकल्पों को बढ़ावा देना फसल चक्र और मिट्टी की सेहत पर ध्यान देना और सबसे अहम, कृषि सब्सिडी के ढांचे को बदलना। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

एग्रोइकोलॉजी को बढ़ावा देने वाले ओलिवर ओलिवरोस (Oliver Oliveros) कहते हैं कि कई देश अब समझ रहे हैं कि हमें फॉसिल फ्यूल आधारित उर्वरकों से आगे बढ़ना होगा। अगर हम सब्सिडी को सही दिशा में लगाएं, तो हम किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को इन झटकों से बचा सकते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यहां एक गहरा सवाल उठता है। आज की खेती ज्यादा उत्पादन देती है। लेकिन क्या यह टिकाऊ है? जर्मनी के किसान ओलिवियर जंग (Olivier Jung) अपने अनुभव से कहते हैं कि जब ऊर्जा महंगी होती है या सप्लाई चेन टूटती है, तो खेत सबसे पहले प्रभावित होते हैं। इसलिए हम अपनी खेती को ज्यादा आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहे हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हॉर्मुज़ में उठी हलचल शायद कुछ समय बाद शांत हो जाए। वहीं, इसने एक स्थायी सवाल छोड़ दिया है। क्या दुनिया की खाद्य प्रणाली बहुत ज्यादा बाहरी इनपुट्स पर निर्भर हो चुकी है? और अगर हां, तो अगला झटका कहां से आएगा? क्योंकि यह संकट सिर्फ समुद्र का नहीं है। यह मिट्टी, किसान और हमारे खाने की थाली का भी है।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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