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February 22, 2026

आठवीं के बाद छूट गई थी पढ़ाई, बच्चों को पढ़ते देख मां की भी जागी पढ़ने की इच्छा, अब कर ली 12 वीं पास

जब बच्चे पढ़ते तो मां की भी पढ़ाई की इच्छा जागी। मन में उठती भावनाओं को साकार करने के प्रयास किए। फिर शुरू की पढ़ाई और अब स्थिति ये है कि बड़ी बेटी दसवीं में पढ़ रही है तो मां ने 12वीं पास कर ली।

पारिवारिक स्थिति ऐसी रही कि आठवीं से ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाई। फिर शादी हो गई और इसके बाद तीन बच्चे। शादी के बाद तो पढ़ाई की बात कल्पना के समान थी। बच्चे हुए तो जीवन का एक ही लक्ष्य रहा कि उनका लालन पालन, शिक्षा सही तरीके से हो जाए। जब बच्चे पढ़ते तो मां की भी पढ़ाई की इच्छा जागी। मन में उठती भावनाओं को साकार करने के प्रयास किए। फिर पढ़ाई शुरू की और अब स्थिति ये है कि बड़ी बेटी दसवीं में पढ़ रही है तो मां ने 12वीं पास कर ली।
बच्चों को पढ़ते देख उत्तराखंड के चमोली जिले के दशोली विकासखंड स्थित ग्राम ठेली निवासी 39-वर्षीय कमला रावत के मन में यह टीस हमेशा रहती थी कि काश! वह भी आगे पढ़ पातीं। उनका विवाह वर्ष 2006 में ठेली निवासी हरेंद्र सिंह से हुआ, जो दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करते हैं। कमला के मुताबिक शादी के बाद उन्हें लगा कि जिम्मेदारियों के बीच अब आगे पढ़ने का सपना पूरा नहीं हो सकता है। सरकार के ‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ’ नारे ने उन्हें खासा प्रभावित किया और मन में ठान लिया कि अब हर हाल में आगे की पढ़ाई करेंगी
कमला की बड़ी बेटी आईशा रावत वर्तमान में इंटर कालेज मैठाणा में दसवीं की छात्रा है। बेटा प्रसून रावत जूनियर हाईस्कूल पलेठी में आठवीं और छोटी बेटी कृष्णा प्राथमिक विद्यालय ठेली मैड में पांचवीं में अध्ययनरत है। कमला बताती हैं कि बच्चों को पढ़ते देख वह भी गाहे-बगाहे पढ़ने की इच्छा जाहिर कर देती थीं।
बच्चों को पढ़ाने के बहाने ही उनका किताबों से साथ कभी नहीं छूटा और परिवार वालों ने वर्ष 2018 में राजकीय इंटर कालेज नंद्रप्रयाग से उनका दसवीं की परीक्षा के लिए प्राइवेट फार्म भरवा दिया। इस परीक्षा में वह उतीर्ण रहीं और इस साल राइंका नंदप्रयाग से ही उन्होंने द्वितीय श्रेणी में बारहवीं पास की है। कमला के मुताबिक वह आगे भी पढ़ाई जारी रखेंगी। ज्ञान अर्जित करने में उम्र कभी बाधा नहीं बनती। कमला के इस तरह के प्रयास अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं, जो किसी कारणवश पढ़ाई बीच में छोड़ चुकी हैं।

Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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