जय मां संतोषी, एक फिल्म ने बदल दिए भक्ति के माइने, शुरू हुआ आडंबर, फिर छलावा
तब बचपन में मैंने उन्हें करीब से देखा। उनके हाथों में स्टेनगन तक देखी। तमंचे और रिवाल्वर आदि तो समझो उनके लिए खिलौना थे। बच्चों के साथ ऐसे लोगों का व्यवहार छोटे भाई या दोस्त की तरह होता था।
बात करीब वर्ष 1975 की है। तब सिनेमा हॉल में जय मां संतोषी पिक्चर लगी। तब देहरादून में टेलीविजन नहीं होते थे। टेलीफोन भी सरकारी ऑफिस व सेठ लोगों तक ही सीमित थे। देहरादून के लक्ष्मी टॉकिज में ये फिल्म लगाई गई। देहरादून रेलवे स्टेशन के निकट अब ना तो वो सिनेमा हॉल रहा और न ही उसके अवशेष। इस धार्मिक फिल्म का प्रभाव हर वर्ग के लोगों पर पड़ा। पहले तो गांव-गांव व मोहल्लों की महिलाओं के जत्थे इस फिल्म को देखने सिनेमा हॉल तक पहुंचने लगे। फिर शुरू हुआ संतोषी माता की पूजा का दौर।महिलाएं संतोषी माता की पूजा के लिए शुक्रवार का उपवास रखने लगी। पांच, सात या सोलह उपवास के बाद उद्यापन किया जाने लगा। उपवास समाप्ति पर ब्राह्रामण परिवार के बच्चों को जिमने के लिए घर-घर बुलाया जाने लगा। मैं छोटा था। मुझे भी करीब हर शुक्रवार को किसी न किसी घर से उद्यापन में जिमने को बुलाया जाता। मोहल्ले के मंदिर में पंडितजी का बेटा मेरी उम्र का था। वही, मुझे और मेरी तरह के कई बच्चों को एकत्र कर उद्यापन में जिमने के लिए ले जाता था।
तब दक्षिणा भी दस पैसे मिलती थी, जो उस समय के हिसाब से मेरे लिए काफी थी।अच्छे पकवान व दक्षिणा की लालच में हर शुक्रवार का मुझे भी बेसब्री से इंतजार रहता था। खाने का हमें कोई ज्यादा उत्साह नहीं था, लेकिन दक्षिणा पर मेरी हमेशा ही नजर रही। व्रती हमें कहते थे कि बेटा आज के दिन खट्टा मत खाना। माता नाराज हो जाएगी। हम भी पूरे दावे के साथ कहते कि नहीं खाएंगे, लेकिन कुछ ही घंटों के बाद भूल जाते।
इसमें ये बात भी खास थी कि कुछ लोग तो संतोषी माता के प्रसाद के रूप में गुड़ और चना खिलाते थे। कुछ इसके साथ ही अन्य पकवान भी बनाकर खिलाते। अब खाली गुड़ और चना मिलने की स्थिति में बच्चे इस प्रसाद को पेट भर नहीं खा सकते। ऐसे में उनका पेट अधूरा ही रह जाता था। फिर उद्यापन का खाना खाने के बाद बच्चों का पेट को पूरा भरने के लिए शुरू होता था जुगाड़ तंत्र।
गर्मियों का सीजन हो तो बच्चे कच्चे आम तोड़ने निकल जाते। या फिर नींबू, चकोतरा आदि की बच्चे पार्टी करते। किसी भी पेड़ से आम, नींबू या चकोतरा तोड़ते। नमक मिर्च बच्चे साथ लेकर चलते। आम या चकोतरा काटने के लिए ब्लेड होता। छोटे टुकड़े करके पेड़ के चौड़े पत्तों में परोसा जाता और फिर मजेदार दावत हो जाती। खैर बाल अपराध को संतोषी माता नजरअंदाज करती रही होगी। तभी उस समय हमें कुछ नहीं हुआ। इतना जरूर है कि कई बार ज्यादा कच्चे आम खाने से अपच जरूर हो जाता था।
इस फिल्म ने लोगों में आध्यात्म की भावना को जाग्रत तो किया ही। साथ ही देशवासियों पर एक उपकार भी किया। वह यह था कि सप्ताह में एक दिन महिलाओं का भूखे रहने से राशन की बचत भी हो रही थी। साथ ही भूखे रहने की आदत से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक दृष्टि से भी व्यक्ति मजबूत होने लगता है।
विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए मानसिक व शारीरिक मजबूती भी जरूरी है। इसीलिए लाल बहादुर शास्त्री जी ने भी देशवासियों से सप्ताह में एक दिन भूखे रहने की अपील की थी। यदि पूरे देश की एक फीसदी आबादी भी हर सप्ताह उपवास रखे तो इसका परिणाम सार्थक निकलेगा। काफी राशन की बचत होगी, जो देश की तरक्की के लिए शुभ संकेत होगा।
संतोषी माता की पूजा, उपवास तक तो बात ठीक थी, लेकिन धर्म की आड़ में भोले-भाले लोगों को फंसाकर अपनी दुकान चलाने वाले लोग भी उन दिनों सक्रिय हो गए। यहां मेरा मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का नहीं है। मैं तो धर्म के नाम पर अपनी झोली भरने वालों व दूसरों को ठगने वालों का चेहरा उजागर करना चाहता हूं।
देहरादून में राजपुर रोड पर दृष्टिबाधितार्थ संस्थान है। इसी से सटा हुआ है राष्ट्रपति आशियाना। राष्ट्रपति आशियाना में राष्ट्रपति के अंगरक्षक रहते हैं। जिनकी पोस्टिंग देहरादून में समय-समय पर दिल्ली राष्ट्रपति भवन से देहरादून के लिए होती है। प्रेजीडेंट्स बाडीगार्ड के नाम से ही आसपास के मोहल्ले का नाम बाडीगार्ड पड़ गया। उच्चारण बिगड़ा और बाद में इस मोहल्ले को बारीघाट के नाम से जाना जाने लगा।
संतोषी माता हरएक के दिलों दिमाग में छाने लगी। इसी बीच दृष्टिबाधितार्थ संस्थान में कार्यरत एक चौकीदार के घर में उनके गांव से एक महिला और उसका भाई आया। चौकीदार दंपती की मेहमान महिला ने खुद को संतोषी माता के अवतार के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते यह चर्चा चारों ओर फैलने लगी। पहले चौकीदार के घर में ही महिला ने आसन सजाया। छोटे-मोटे चमत्कार दिखाए। फिर घर से आसन को उठाकर पास ही एक खाली जगह पर एक पंडाल के नीचे ले गई। तब कंक्रिट के भवन इतने नहीं होते थे। हर मोहल्ले में खाली जगह का अभाव भी नहीं था।
घर के आगे छोटे के मैदान में पंडाल सजाकर शाम के समय से भजन व कीर्तन के कार्यक्रम आयोजित होने लगे। मोहल्ले के लोग पंडाल में भरपूर रोशनी के लिए पेट्रोमैक्स तक घरों से लाने लगे। संतोषी माता का रूप धरकर महिला मंच पर बैठती। लाल साड़ी, हाथ में त्रिशूल, सिर पर मुकुट आदि सभी कुछ उसके श्रृंगार में शामिल थे। रात को कीर्तन होता। इसमें पुरुष कम और मोहल्ले की महिलाओं व बच्चों की भीड़ ज्यादा रहती।
दिनोंदिन भीड़ बढ़ने लगी और महिलाएं घर का काम करना भले ही भूल जाए, लेकिन संतोषी माता के दरबार जाना नहीं भूलतीं। अब महिलाएं चढ़ावे के नाम पर घर राशन भी दरबार में लुटाने लगी। लोगों के घर राशन कम होता जा रहा था, संतोषी माता व चौकीदार दंपत्ती का घर भरता जा रहा था।
उन दिनों दून में गैंगवार चल रही थी। भरतू व बारू गैंग के लोग एक-दूसरे के दुश्मन थे। अक्सर कहीं न कहीं दोनों गिरोह के सदस्य जब भी आमने-सामने होते तो गोलियां चल जाती और किसी गुट का कोई न कोई सदस्य जरूर मारा जाता था। या फिर घायल हो जाता था। वह ऐसा दौर था, यदि आप दूसरे राज्य में जाओ, तो देहरादून का नाम सुनकर सभी कान पकड़ने लगते थे। उसके बाद यदि उस मोहल्ले का नाम लिया जाए, जहां मेरा बचपन कटा तो लोगों के मन में और दहशत होती थी। ये था देहरादून में एनआइवीएच का इलाका। जहां शहर के नामी बदमाश पुलिस की निगाह से छिपने के लिए पहुंचते थे।
तब बचपन में मैंने उन्हें करीब से देखा। उनके हाथों में स्टेनगन तक देखी। तमंचे और रिवाल्वर आदि तो समझो उनके लिए खिलौना थे। बच्चों के साथ सभी का व्यवहार छोटे भाई की तरह या दोस्ताना रहता था। बड़े बुजुर्गों के साथ वे ऐसा व्यवहार करते थे कि कोई ये अंदाज नहीं लगा सकता था कि वे कितने हार्ड कोर क्रिमिनल हैं। मोहल्ले से बाहर निकलने पर किसी लड़की को छेड़ने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। रात को कोई आटो वाला उस इलाके में सवारी लेकर नहीं आता था। वह एनआइवीएच के गेट से काफी पहले ही सवारी उतार देता था। हालांकि ये लोग किसी तंग नहीं करते थे। फिर भी उनका खौफ बाहर के सभी व्यक्तियों को रहता था। उनके डर से मोहल्ले में कभी चोरी तक नहीं होती थी। कई घरों में लोग ताले तक नहीं लगाते थे। सिर्फ रस्सी से दरबाजे के कुंडे को बांध देते थे। ताकी कोई मवेशी कमरे के भीतर प्रवेश न करे।
भरतू गिरोह का एक सदस्य बारीघाट रहता था। इस व्यक्ति को मोहल्ले के लोग दाई करकर पुकारते। मोहल्ले के लोगों से उसका व्यवहार भी काफी अच्छा था। इस पर उसकी बात सभी मानते और उसकी इज्जत भी करते थे। दाई का अक्सर समय या तो पुलिस से छिपने में बीतता या फिर जेल में। उसकी पत्नी गाय व भैंस पालकर बच्चों की परवरिश करती। संतोषी माता का प्रभाव दाई की पत्नी पर भी पड़ा। वह भी हर शाम दरबार में जाने लगी। शाम को गाय का दूध निकालने का समय भी नियमित नहीं रहा। ऐसे में जब गाय का बछड़ा जब हर रोज दूध के लिए चिल्लाने लगा तो गाय भी बिगड़ गई। उसने दूध देना बंद कर दिया।
दाई को जब इसका पता लगा कि मोहल्ले के लोग घर का कामकाज छोड़कर कथित संतोषी माता के फेर में पड़ गए हैं। साथ ही घर का राशन तक लुटाने लगे हैं। ऐसे में उसने पहले तो अपनी पत्नी को दरबार में न जाने ही चेतावनी दी। साथ ही उसे ये भी डर रहता था कि मोहल्ले में कहीं संतोषी माता के नाम पर पुलिस का आना जाना न हो जाए। ऐसे में शहर भर के उसके मित्र जो वहां छिपने आते थे, उनके लिए खतरा हो सकता है।
दाई की चेतावनी का भी जब भक्तों पर असर नहीं पड़ा तो एक दिन वह खुद दरबार में पहुंचा। ये दरबार उसके घर से मात्र सौ कदम की दूरी पर था। उसने संतोषी माता व उसके भाई की पिटाई कर दी। पूरा पंडाल तहस-नहस कर दिया। फिर इसके बाद वहां कभी संतोषी माता का दरबार नहीं लगा। जब संतोषी माता भाग गई, तभी कई लोगों को पाखंडी महिला के चक्कर में खुद के लुटने का अहसास हुआ। इस घटना के बाद से लोग फिर से अपने कामकाज में जुट गए। घरों में संतोषी माता की पूजा की जाती रही। उपवास होते रहे, लेकिन अंतर यह आया कि पाखंड व छलावे के फेर में पड़कर लोगों ने किसी पाखंडी की पूजा नहीं की।
भानु बंगवाल




