अप्रैल माह में तरस गए बारिश को, एक बारिश वो भी थी, जब बात बात पर पड़ने लगती थी झड़ियां, बारिश के मजेदार किस्से
एक कहावत है कि देहरादून की बरसात का कोई भरोसा नहीं है। देहरादून में कब बारिश हो जाए, यह कहा नहीं जा सकता। आसमान में धूप होगी और लगेगा कि अभी गर्मी और सताएगी। फिर अचानक हवा चलने लगेगी।
एक कहावत है कि देहरादून की बरसात का कोई भरोसा नहीं है। देहरादून में कब बारिश हो जाए, यह कहा नहीं जा सकता। आसमान में धूप होगी और लगेगा कि अभी गर्मी और सताएगी। फिर अचानक हवा चलने लगेगी। मौसम करवट बदलेगा और बारिश होने लगेगी। बारिश भी ऐसी नहीं होती कि पूरा दून ही भीग रहा हो। कई बार तो शहर के एक हिस्से में बारिश होती है, तो दूसरे कोने में धूप चमक रही होती है। कुछ साल से देहरादून के मौसम को भी ना जाने क्या हो गया। अप्रैल माह में जहां कई दिन बारिश की झड़ी लग जाती थी, वो अब देखने को आंखे तरसने लगी हैं।बारिश में बिखरती है मनोरम छटा
बारिश यदि न हो तो इंसान परेशान और यदि ज्यादा हो तो तब भी व्यक्ति परेशान हो जाता है। ज्यादा बारिश अपने साथ आफत लेकर आती है। फिर भी बारिश इंसान के लिए जरूरी है। तभी तो बारिश को लेकर कई रचनाकारों में काफी कुछ लिखा है और प्रसिद्ध हो गए। बरसात में सूखी धरती हरी भरी हो जाती है। किसानों के चेहरे खिल उठते हैं। प्रकृति भी मनोरम छटा बिखेरने लगती है।
अब नहीं दिखते झूले
बचपन में देखता था कि बरसात शुरू होते ही जगह-जगह पेड़ की डाल पर लोग बड़े-बड़े झूले डालते थे। मोहल्ले के बच्चे व युवा इन झूलों पर खूब मौज-मस्ती किया करते थे। यही नहीं घर की देहरी में भी छत की बल्लियों में रस्सी डालकर छोटे बच्चों के लिए झूला टांगा जाता था। अब मेरे पुराने मोहल्ले से लगभग सारे पेड़ गायब हो चुके हैं। उन पर आरी चलाकर भवनों का निर्माण हो गया। पुराने कड़ियों व टिन की छत के मकान की जगह पक्के निर्माण हो गए। ना ही लोगों में आपसी भाईचारा रहा और ना ही नजर आते हैं बरसात या सावन के महीने में झूले। हां इतना जरूर है कि डाल पर झूले की बजाय लोगों के बरामदे में अब परमानेंट झूले लटके होते हैं। बेंत की कुर्सी पर रस्सी डालकर लटकाए गए ये झूले पेड़ की डाल में लटके झूले की तरह मदहोश करने वाले नहीं होते।
बाइक में हर वक्त बरसाती रखना नहीं भूलता
दून में बारिश कब हो जाए। इसका पहले से अंदाजा नहीं रहता। इसलिए मैं हमेशा अपनी मोटर साइकिल की डिक्की में बरसाती रखता हूं। देहरादून में इतनी बारिश होती है कि आज तक कोई बरसाती ऐसी नहीं बनी कि इस बारिश से बचा सके। हां हल्की बारिश में बरसाती भीगने से बचा लेती है और ज्यादा में इज्जत से भीगाती है।
एक बारिश ऐसी भी थी
जब मैं छोटा था तो घर से करीब सवा दो किलोमीटर दूर दिलाराम बाजार पैदल ही स्कूल के लिए जाता था। तब शायद मैं दूसरी क्लास में था और मेरे से बड़ी बहन चौथी में। स्कूल से घर को निकले तो रास्ते में बारिश होने लगी। छाता था नहीं। ऐसे में हम सिर पर अपनी अपनी तख्तियां रखकर घर को चलने लगे। तेज बारिश हुई तो मैं रोने लगा। आरटीओ दफ्तर करीब एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद हमारी नजर सामने पड़ी। मेरी मां हमें लेने के लिए आ रही थी। उसके हाथ में छाते थे। अब हमारी जान में कुछ जान आई और मैने रोना बंद किया। आगे पुरानी चुंगी नाम की एक जगह पड़ती थी। उससे ढलान में उतरकर एक शार्टकट रास्ता था। ढलान उतरने के बाद चढ़ाई थी। जैसे ही ढलान उतरे तो वहां बारिश के पानी ने नाले का रूप ले लिया। इस पर एक व्यक्ति जिन्हें हम राणा मामाजी कहते थे, उन्होंने हम दोनों भाई बहन को गोद में उठाया और उस जलजले से हमें पार कराया।
बच्चों का कष्ट बस चालक और कंडक्टर ने किया महसूस
इसी तरह एक दिन स्कूल से घर जाते समय तेज बारिश हुई। हम करीब तीन चार बच्चे थे। जो बारिश में ही भीगते हुए जा रहे थे। तब सड़कों पर वाहन भी बहुत कम ही दिखते थे। एक रोडवेज की सिटी बस हमसे कुछ आगे रुकी और उसके परिचालक ने हमसे कहा कि बैठ जाओ। हमने कहा कि पैसे नहीं है। इस पर उसने डांट लगाई और बस में बैठा दिया। तब लोग बच्चों के कष्टों के प्रति कितने संवेदनशील थे। अब तो किसी को दूसरे की परवाह तक नहीं रहती है।
साइकिल खरीदने में लगता था वक्त
मैं जब सातवीं क्लास में पहुंचा तो मैने पिताजी से साइकिल की जिद की। उन्होंने कहा कि पहले चलाना सीख ले। मैं किराए की छोटी साइकिल लाया और उसे किसी तरह चलाने सीख लिया, लेकिन बड़ी साइकिल मुझे चलानी नहीं आती थी। पिताजी ने समझा कि मैं साइकिल सीख गया। एक दिन उन्होंने आफिस से तीन सौ रुपये का लोन लिया और मुझे लेकर साइकिल खरीदने बाजार गए। तब साइकिल की दुकान में पहुंचे तो साइकिल तैयार होने में तीन घंटे लगे। पहले रिम में स्पोक लगाए गए। फिर फ्रेम से उसे जोड़ा गया। टायर ट्यूब आदि लगाए गए। फिर हैंडिल और फिर गद्दी आदि लगी। फिर गई 306 रुपये में एवन कंपनी की साइकिल तैयार।
बारिश ने उड़ाई नई साइकिल की खुशी
पिताजी ने घंटाघर के निकट मुझसे कहा कि मैं बस से घर जाऊंगा, तू साइकिल से पहुंच जाना। मैं खुश था, लेकिन मुझमें चढ़ाई के रास्ते में साइकिल पर चढ़ने का साहस नहीं था। तभी तेज बारिश होने लगी। साइकिल के फ्रेम में लिपटे पैकिंग के गत्ते गलकर गिरने लगे। मैं पैदल ही चलता रहा। करीब चार से पांच किलोमीटर के रास्ते में दो किलोमीटर के बाद ही मेरा धेर्य जवाब देने लगा। ऊपर से बारिश हो रही थी और मेरे हाथ दुख रहे थे। तब मुझे पता चला कि पैदल चलने के दौरान भी साइकिल पकड़ना कितना मुश्किल काम है। किसी तरह घर पहुंचा और सबसे पहले हाथो की सिकाई की। घर में बधाई देने वालों की भीड़ लगने लगी, लेकिन मैं हाथ में दर्द से परेशान था।
शादी का दिन और बारिश
वर्ष 1983 में मेरी दूसरी बहन की शादी थी। तब हम देहरादून में एनआइवीएच में रहते थे। 14 अप्रैल का दिन बारात आने का था। टैंट लग चुका था। सजावट हो रही थी। शाम होते होते इतनी तेज हवा आंधी के साथ बारिश हुई कि टैंट उखड़कर गिर गया। एनआइवीएच की एक खाली बैरिक (एक लंबा हाल) में कनातें लगाई गई और वहीं कुर्सी आदि लगाकर स्टेज सजाया गया। बारात की वहां व्यवस्था हो गई। भोजन के लिए मेज आदि भी वहीं लगा दी गई। मेरे और मेरे दोस्तों की इस बदलाव के दौरान काफी मेहनत हो गई। बाल्टियों से पीने का पानी ढोया गया, पर व्यवस्था इतनी बेहतर हुई कि सारे बाराती भी खुश हो गए। क्योंकि तब खुले मैदानों में ही टैंट लगाकर शादियों के आयोजन होते थे। वैडिंग प्वाइंट तब शायद नहीं थे। हां धर्मशालाओं में जरूर शादियों का आयोजन होता था। अब तो मोहल्लों में मैदान ही नहीं बचे। उनके स्थान पर भवन खड़े हो गए।
विदाई के दिन भी हुए परेशान
अगली सुबह भी बारिश थी। विदाई के समय भी बारिश से सब भीग रहे थे। ऐसे में दुल्हन के विदा होने के दौरान ये पता नहीं चल रहा था कि किसकी आंख में आंसू हैं। क्योंकि चेहरा तो पानी से भीगा हुआ था। उस दिन इतनी सर्दी हुई कि दिल्ली या अन्य बाहरी जिलों से आए मेहमानों के लिए बक्सों से स्वैटर निकाली गई। जाते समय सब स्वैटर पहन कर चले गए। फिर जिसे मौका मिलता रहा, वे किसी न किसी के हाथ स्वैटर वापस भिजवाते रहे। छोटा भाई होने के कारण मुझे बहन के साथ भेजा गया। उसका देवर मोहित मुझसे करीब दो साल छोटा है। मेरी उससे दोस्ती हो गई थी। जब बहन के ससुराल पहुंचा तो वहां भी बारिश का सिलसिला थमा नहीं था। बारात भी देहरादून के लुनिया मोहल्ला गई थी।
पड़ोसी आए काम
वहां सबसे ज्यादा चिंता इस बात की थी कि मेहमानों के भोजन की व्यवस्था कहां की जाए। क्योंकि वहां भी टैंट से बारिश की झड़ियां टपक रही थी। तब वहां भी बेहतर व्यवस्था हो गई। बगल में एक सरदारजी की कोठी थी। उनके घर के बरामदों और कमरों में मेज लगाकर उसमें भोजन सजाया गया। एक तरफ भोजन चल रहा था, दूसरी तरफ बहन का देवर मोहित मुझे मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म डिस्को डांसर का नाइट शो दिखाने ले गया। घर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पायल सिनेमा हाल तक हम पैदल गए। फिर जैसे ही इंटरवल हुआ तो चिंता घर में डांट की सताने लगी। तय किया गया कि आधी फिल्म किसी दूसरे दिन देखेंगे। फिर हम आधी फिल्म को छोड़कर ही वापस लौट आए। इसके बाद मुझे इस फिल्म को दोबारा पूरी देखने का जल्द मौका नहीं मिल पाया। इस घटना के दो साल बाद ही मेने इस फिल्म को देखा।
बारिश और टीवी की कहानी
इसके कुछ साल बाद की बात है। साल तो सही से याद नहीं, फिर भी ये बात वर्ष 87 के आसपास की है। तब छोटी-छोटी आवश्यकता के सामान के लिए मुझे घर से करीब पांच किलोमीटर दूर देहरादून के पल्टन बाजार की तरफ का रुख करना पड़ता था। मोहल्ले में एक दो छोटी-छोटी दुकानें होती थी। वहां भी सारा सामान नहीं मिलता था। कई बार एक दिन में मेरे दो से तीन चक्कर तक देहरादून में पल्टन बाजार के लग जाते थे। तब हमारे घर में पोर्टेबल टेलीविजन था। जो हम बारह वोल्ट की बैटरी से चलाते थे। हर पंद्रह से बीस दिन में बैटरी चार्ज कराने के लिए घर से करीब छह किलोमीटर दूर प्रिंस चौक के पास ले जाना पड़ता था। उस दौर में जब टीवी सीरियल रामायण आती थी और उस समय बिजली गुल हो जाती थी, तो हमारे घर दर्शकों की भीड़ लग जाती थी।
ऐसे दिया बारिश ने धोखा
एक दिन सुबह बैटरी को चार्ज कराने मैं दुकान पर देकर घर लौट आया। तब बैटरी चार्ज करने के मात्र पांच रुपये लिए जाते थे। दुकानदार ने दोपहर को बैटरी ले जाने को कहा। दोपहर को जब बैटरी लेने को घर से बाजार जाने की मैं तैयारी करने लगा, तो एकाएक तेज बारिश होने लगी। घर में मैने पायजामा व बनियान पहनी थी। कपड़े बदलने लगा ही था कि फिर मैने सोचा कि बारिश में भीगकर कपड़े खराब हो जाएंगे। ऐसे में मैने घर के ही कपड़ों पायजामा व बनियान के ऊपर बरसाती ओढ़ ली। कौन देखेगा कि भीतर क्या पहना है। बारिश हो रही है। जब तक वापस आऊंगा तब तक तो बारिश रहेगी ही। यही सोचकर मैं साइकिल उठाकर बजार की तरफ रवाना हुआ।
करीब डेढ़ किलोमीटर आगे चलने पर आरटीओ के निकट बारिश और तेज हो गई। रास्ता भी नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में चार पहिया वाहन भी लोगों ने सड़क किनारे रोक दिए। खैर मैं गाना गुनगुनाते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। बाजार पहुंचने पर बैटरी उठाई और साइकिल के कैरियर पर रखी। फिर घर की तरफ चलने लगा। तभी बारिश एकाएक कम हुई और फिर थम गई। इसके बाद चमकदार धूप निकल गई। अब मैं मुसीबत में फंस गया। मुझे सूझ नही रहा था कि क्या करूं। बरसाती उतारूं तो बनियान व पायजामा पहना हुआ था। ऐसे में मैं बरसाती को उतार नहीं सका और घर की तरफ साइकिल चलाता रहा।
अब सड़क में मेरी स्थिति विचित्र प्राणी की तरह थी। जो खिलखिलाती धूप में बरसाती पहनकर राजपुर रोड की चढ़ाई में साइकिल चला रहा था। सभी राहगीर मेरी तरफ देखते। कईएक टोक भी चुके थे कि बारिश नहीं है, बरसाती तो उतार लो। घर पहुंचा। बाहर से जितनी बरसाती बारिश से भीगी थी, उससे कहीं ज्यादा भीतर से पसीने से भीग चुकी थी। गरमी से पूरे बदन में दाने उभर आए, जो कई दिन के बाद ही दबे। इस दिन से मैने यही तय किया कि दून की बारिश का कभी भरोसा मत करो। अब वैसी बारिश होती ही नहीं है। कई दिन की झड़ियों का तो एक जमाना ही गुजर गया। किस्से तो और भी हैं, लेकिन अब बस इतना ही।
भानु बंगवाल




