16 साल में 1875 से घटकर 901 पहुंच गई थी पौड़ी की जनसंख्या, जानिए कारण, पौड़ी का रोचक इतिहास
पौड़ी नगर, उत्तर रेलवे के निकटतम रेलवे स्टेशन कोटद्वार से 117 किलोमीटर तथा हरिद्वार से मोटर मार्ग पर 157 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यह सागर तट से लगभग 6000 फीट की ऊँचाई पर है। गढ़वाल के द्वार हरिद्वार-ऋषिकेश से होते हुए देवप्रयाग-श्रीनगर से मात्र तीस किलोमीटर की दूरी पर सीढ़ीनुमा खेत, सर्पीली सड़क एवं चीड़ और देवदार के घने जंगलों के मध्य, हिमखण्डित चोटियों से घिरा हिमालय की गोद में पौड़ी बसा है।

कंडोलिया देवता का मंदिर
यह अपने नैसर्गिक सौन्दर्य से सैलानियों को बरबस अपनी और आकर्षित कर लेता है। दूर-दूर तक प्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण, छोटी-बड़ी पर्वत श्रृंखलाओं का अनोखा दृश्य, दूर तक पहाड़ियों और घाटियों में घरोंदेनुमा मकान यह सब अविस्मरणीय हैं। नगर बस अड्डे से आधा किलोमीटर खड़ी चढ़ाई पर कण्डोलिया मैदान, वहाँ कण्डोलिया देवता का मन्दिर अनायास ही सैलानियों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है।

इस मन्दिर में आज भी आस-पास के अनेकानेक गाँव श्रद्धापूर्वक भूमिरक्षक के रूप में देवता का पूजन करते हैं। किंवदन्ती है कि गोरखाली शासन के समय विपत्ति काल में यह कन्डोलिया देवता, आवाज देकर गाँववासियों को शत्रु के आक्रमण से सजग करता था।

रांसी मैदान है आकर्षण
कन्डोलिया से दिखने वाली घाटी, हरे-भरे मीलों तक फैले लहलहाते खेत, चीड़, देवदार बुरांस एवं खड़ीक आदि के घने जंगल, कल-कल करती नदियाँ, झर-झर झरते झरने,6500 फीट की ऊँचाई पर स्थित रांसी का विशाल मैदान यह सब कम आकर्षक नहीं है। पौड़ी से 8 किलोमीटर खण्ड्यूसैंण की ओर 7600 फीट ऊँची कुमाऊँचूला चोटी, जहाँ आज भी भग्नावशेष रूप में खण्डहर, कुमाऊँ राजा के गढ़ का प्रमाण दे रहे हैं और मनमोहक जंगल के मध्य नागदेव का प्राचीन मन्दिर प्राणिमात्र को भाव-विभोर कर देता है।
क्यूंकालेश्वर मंदिर
पौड़ी की सबसे ऊँची चोटी झिन्डीधार जिस की ऊँचाई 7000 फोट है से सेममुखेम पर्वत के पाँच गढ़ हाथी पर्वत, लैंसडौन, चौखंभा, त्रिशूल भरतकंट, नीलकंठ व बन्दरपूँज जैसे चोटियाँ तो स्पष्ट दृष्टिगोचर होती ही हैं। साथ ही गंगोत्री, भागीरयों जैसी पुण्य स्थलों के दर्शन भी होते हैं। नगर से पश्चिम की ओर तीन किलोमीटर दूर सात हजार फीट की ऊँचाई पर क्यूंकालेश्वर शिव का ऐतिहासिक मन्दिर अपनी धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक छटा बिखेरता नजर आता है।

केदारखण्ड में इसके धार्मिक महत्त्व का वर्णन मिलता है। यह सिद्धपीठ कहा जाता है। यहाँ से हिमालय की सर्वाधिक हिमाच्छादित पहाड़ियाँ दिखाई देती है। यहाँ पर खड़ा सैलानी अपने आपको चारों ओर से हिमाच्छादित पर्वत शिखरों की गोद में पाता है।
जमीन का स्वामी था राजा, जनता का काम हल जोतना
सन् 1815 तक पौड़ी को स्थिति एक गाँव की सी थी। यह गाँव आज भी पौड़ी शहर के नीचे अपने
ऐतिहासिक रूप में विद्यमान है। 1815 के पश्चात अंग्रेजों ने पौड़ी को ब्रिटिश गढ़वाल के नागरिक प्रशासन की अदालत के लिए चुना। राजशाही के दौरान पौड़ी व इसके समीपवर्ती च्वींचा, बैज्वाड़ी, राई आदि गाँवों से एकत्र हुआ टैक्स क्यूंकालेश्वर श्रीनगर के कमलेश्वर मन्दिर के पुरोहितों के पास जाता था। जमीन पर जनता का कोई अधिकार नहीं था। सम्पूर्ण भूमि का स्वामी राजा था। जनता का काम केवल जमीन पर हल जोतना था।
अंग्रेजों ने मांगी रकम तो नहीं दे सका राजा
1805 से 1815 तक गोरखों ने सम्पूर्ण गढ़वाल को हस्तगत कर यहाँ की प्रजा पर अनेकों अत्याचार किये। पौड़ी भी इससे अछूता न रहा। गढ़वाल नरेश सुदर्शन शाह ने गोरखों के चुंगल से मुक्त होने के लिए अंग्रेजों से सांठगांठ की। अंग्रेजों ने गढ़वाल से गोरखों को खदेड़ तो दिया। परन्तु युद्ध व्यय के रूप में गढ़वाल नरेश से एक मोटी रकम मांग ली। जिसे गढ़वाल नरेश अदा न कर सका। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने आधे से अधिक गढ़वाल को हस्तगत कर लिया। पौड़ी को भी
ब्रिटिश गढ़वाल में सम्मिलित कर कुमाऊँ कमिश्नरी में मिला दिया गया।
इस पर गढ़वाल नरेश को अपनी राजधानी श्रीनगर ले जानी पड़ी। सन 1815 से 1840 तक पौड़ी, कुमाऊँ कमिश्नरी के अधीन रहा। 1840 तक नैनीताल व अल्मोड़ा ही जिले के रूप में थे। 1840 में पौड़ी को भौगोलिक स्थिति व जलवायु को मद्देनजर रखते हुए पहली बार जिले का रूप दिया गया और पौड़ी के डिप्टी कमिश्नर की अदालत स्थापित की गयी। इस अदालत में पूरे ब्रिटिश गढ़वाल के मुकदमों की सुनवाई होती थी।
शिक्षण संस्थाओं की शुरूआत
सन 1854 में पौड़ी में अमेरिकन एपिस्कोपल मैथोडिस्ट चर्च की स्थापना की गई। पौड़ी में पहली शिक्षण संस्था सन 1865 में खेरेण्ड हेनरी मेंसल द्वारा प्रारम्भ करवायी गई। यह स्कूल चर्च
के ही समीप था। पंडित पुरूषोत्तम चन्दोला इस स्कूल के पहले हेड मास्टर थे। सन 1881 में इस स्कूल में मिडिल तक शिक्षा दी जाने लगी। इसी स्कूल को जेएन मेस्मोर की स्मृति में 1884 में मेस्मोर स्कूल का नाम दिया गया। सन 1902 में यह हाईस्कूल बना और वर्तमान समय में इंटर कालेज के रूप में है।
कोटद्वार बदरीनाथ पैदल मार्ग का पड़ाव
सन 1928 तक सम्पूर्ण पौड़ी जंगलों से घिरा हुआ था। वर्तमान धारा रोड में ग्रामीणों की झोपड़ियां थीं। जिनमें उनके जानवर बंधे रहते थे। 1902 में पौड़ी में जेल की स्थापना कर दी गयी थी। कण्डोलिया के घने जंगलों के बीच डिष्टी कमिश्नर का बंगला भी बन चुका था। यहाँ तक कि उस समय कोटद्वार से बदरीनाथ तक जाने वाले पैदल मार्ग का एक पड़ाव पौड़ी था।
महामारी फैली तो घटी जनसंख्या
1921 में पौड़ी की जनसंख्या 1875 थी, जो 1937 तक घटकर मात्र 901 रह गई। जनसंख्या के घटने का प्रमुख कारण पौड़ी में महामारी फैलना था। इस समय तक गढ़वाल में आवागमन के साधन का पूर्णतया अभाव था। अत: ब्रिटिश अधिकारियों को दौरा करने के लिए कूलियों की आवश्यकता पड़ती थी। जिसकी पूर्ति के लिए गढ़वालियों से बिना भेदभाव किये कुली का काम लिया जाता था।
कुली बनाने का निकाला ऐसा तरीका
इस कुप्रथा से समस्त गढ़वालवासियों में उत्तेजना फैल गयी। जनता की उत्तेजना को शान्त करने का अजीब रास्ता ढूंढा जोधसिंह रावत ने। जो उस समय पौड़ी में तहसीलदार थे। उन्होंने सब लोगों पर एक एक रूपया टैसा लगाया। इस प्रणाली द्वारा जरूरतमन्द गरीब लोगों को कुली बनाने की प्रथा अपनायी गयी। डिप्टी कमिश्नर वीए स्टोवल को भी इस प्रणाली के प्रणेताओं ने मना लिया।
पौड़ी जिले में बनाई गई कुली एजेंसी
अब पूरे जिले में कुली एजेंसी की स्थापना की गयी। इस संस्था का नाम ‘ट्रान्सपोर्ट एण्ड सप्लाई कोआपरेटिव एसोसिएशन’ रखा गया। इस एजेन्सी का अस्तित्व आज भी टूटे फटे मकानों के रूप में मौजूद है। इस स्थान को आज भी एजेन्सी के नाम से पुकारा जाता है।
अकाल का लाभ उठाकर कराया धर्मांतरण
सन् 1917-18 में पौड़ी में भीषण अकाल पड़ा। इस विषम परिस्थिति में इसाई मिशनरियों ने हिन्दुओं को इसाई बनाने में कोई कसर न छोड़ी। हिन्दुओं को विवश होकर इसाई बनने से रोकने
के लिए लाला हंसराज, स्वामी श्रद्धानन्द व कोतवालसिंह नेगी ने अकाल पीड़ितों के लिए सस्ते दरों पर अनाज की व्यवस्था की तथा ‘गढ़वाल रिलीफ फण्ड’ की स्थापना की। बाद में इसी रिलीफ फण्ड से बचे हुए पैसों से पौड़ी में दूसरी शिक्षण संस्था डीएवी स्कूल की स्थापना की गयी।
स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में योगदान
सन 1922 से 1947 तक पौड़ी में राजनैतिक गतिविधियों का जोर रहा। 1930 में डिप्टी कमिश्नर ईबटसन का कण्डोलिया मैदान में घेराव किया गया और उसे झण्डे दिखाये गये। उसने गुस्से में आकर आन्दोलनकारियों के ऊपर अपना घोड़ा दौड़ा दिया व भीड़ की तितर-बितर करने का आदेश दिया। विरोध स्वरूप जनता ने ईबटसन के ऊपर पथराव किया। इस घटनाक्रम में प्रमुख आन्दोलनकारियों को पकड़ लिया गया व उन्हें सजा दी गयी। वह पौड़ी का उस समय तक का सबसे बड़ा जुलूस था। ईबटसन द्वारा गढ़केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के साथ जेल में किये
गए दुर्व्यवहार के विरोध में ही यह आन्दोलन चलाया गया।
सरकार परस्त लोगों की सभा में लहराया तिरंगा
13 जून 1932 को संयुक्त प्रान्त के गवर्नर जनरल लार्ड मैलकम हैनी के सम्मान में सरकार परस्त लोगों द्वारा कण्डोलिया में एक सभा का आयोजन किया गया। इस सभा के आयोजन का प्रमुख लक्ष्य मैलकम हेनी को यह बताना था कि गढ़वाल में कांग्रेस का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। कड़े प्रबन्धों के बाद भी जयानन्द भारती ने भरी सभा में आस्तीन में छिपा तिरंगा झण्डा निकालकर हवा में
लहराया व हैनी को आभास दिलाया कि गढ़वाल में कांग्रेस का अस्तित्व बरकरार है।
गढ़वाली ने किया आजादी के लिए संघर्ष
1946 में पेशावर काण्ड के नायक चन्द्रसिंह गढ़वाली को बड़ी मुश्किलों से गढ़वाल आने की अनुमति मिली। इन्होंने भी गढ़वाल आकर आजादी के लिए संघर्ष करना प्रारम्भ कर दिया। आजादी के पश्चात् भी पौड़ी में राजनीतिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक क्षेत्र में अत्याधिक कार्य हुआ। 1970 में पौड़ी को मण्डल मुख्यालय बनने का श्रेय मिला।
पढ़ने के लिए यहां क्लिक करेंः यहां केदारनाथ मंदिर से भी है प्राचीन मंदिर, विद्यमान हैं दुर्लभ प्रतिमाएं

लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।



