भले ही दिन में होगी भरपूर पानी की सप्लाई, सेव वाटर होली का लो संकल्पः डॉ. बृजमोहन शर्मा
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारे और प्रकृति से जुड़ाव का पर्व है। बदलते समय में हमें यह भी सोचना होगा कि हमारी खुशियाँ प्रकृति पर कितना भार डाल रही हैं। विशेषकर पानी, जो जीवन का आधार है। पानी के बगैर होली की कल्पना करना बेकार है। होली खेलने से लेकर बाद में रंग छुड़ाने तक, सबके लिए काफी पानी की जरूरत पड़ती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड में जल संस्थान का प्रयास रहता है कि होली के दिन दोपहर बाद से ही पानी की सप्लाई दोबारा से चालू कर दी जाए। हालांकि, अन्य दिन अधिकांश स्थानों पर सुबह और शाम पानी की सप्लाई होती है। पानी की दृष्टि से आज देश के साथ ही पूरी दुनिया गंभीर संकट से गुजर रही है। ऐसे में आवश्यकता है कि हम “सेव वाटर होली” का संकल्प लें। होली ऐसे खेलें कि नहाते समय पानी बचे और इसकी व्यर्थ बर्बादी न हो। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भारत में पानी की कमी के चिंताजनक आंकड़े
नीति आयोग की Composite Water Management Index (2018) रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 60 करोड़ लोग जल संकट का सामना कर रहे हैं। हर वर्ष लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु असुरक्षित पानी के कारण होती है। 21 बड़े शहर जैसे दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई भूजल संकट की कगार पर बताए गए थे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
वहीं, UNICEF की रिपोर्ट के अनुसार, भारत विश्व के उन देशों में है जहाँ जल संकट अत्यधिक गंभीर है। शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन औसतन 135 लीटर पानी की आवश्यकता मानी जाती है, परंतु कई स्थानों पर यह उपलब्ध नहीं है। एक अनुमान के अनुसार, एक व्यक्ति यदि पाइप से खुलकर नहाता है तो 100 से 150 लीटर पानी खर्च हो जाता है, जबकि बाल्टी से नहाने पर केवल 20 से 25 लीटर में काम हो सकता है। अब सोचिए कि यदि लाखों लोग होली के दिन बार-बार नहाएं। पिचकारी और पानी की टंकियों से रंग खेलें, तो कितने करोड़ लीटर पानी एक ही दिन में व्यर्थ बह जाता होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
होली में पानी की बर्बादी के कारण
1. पानी से भरे गुब्बारे
2. टैंकर से पानी मंगवाकर होली खेलना
3. रंग छुड़ाने के लिए बार-बार लंबा शॉवर लेना
4. केमिकल रंगों के कारण बार-बार साबुन और पानी का उपयोग
नोटः यह न केवल पानी की बर्बादी है, बल्कि केमिकल युक्त पानी नालियों से होकर नदियों में जाता है और जल प्रदूषण भी बढ़ाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
खेलें सूखी होली और बचाएं पानी
गुलाल और प्राकृतिक रंगों से होली खेलें। इससे पानी की बर्बादी नहीं होगी। ना ही त्वचा को नुकसान पहुंचेगा।
प्राकृतिक रंगों का करें प्रयोग
घर पर हल्दी, चंदन, फूलों और बेसन से बने रंग प्रयोग करें। इससे रंग आसानी से उतर जाते हैं और नहाने में कम पानी लगता है।
नहाने से पहले तेल लगाएँ
होली खेलने से पहले शरीर और बालों में नारियल या सरसों का तेल लगा लें। इससे रंग त्वचा में चिपकता नहीं और एक ही बाल्टी पानी में रंग उतर जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
शॉवर के बजाय बाल्टी का प्रयोग करें
शॉवर 100 लीटर तक पानी बहा सकता है, जबकि एक बाल्टी 20–25 लीटर में पर्याप्त है।
सामूहिक संकल्प लें
अपनी कॉलोनी, विद्यालय या संस्था में “नो वाटर होली” का संकल्प लें। बच्चों को जल संरक्षण का महत्व समझाएँ।
जल संरक्षण का संदेश फैलाएँ
सोशल मीडिया और पोस्टर के माध्यम से “सेव वाटर होली” अभियान चलाएँ।
होली का वास्तविक संदेश
होली का अर्थ प्रकृति से युद्ध नहीं, बल्कि सामंजस्य है। जब हम पानी बचाते हैं, तब हम आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन सुरक्षित करते हैं। हमारे गाँवों में आज भी महिलाएँ कई किलोमीटर चलकर पानी लाती हैं। ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि हम त्योहारों को जिम्मेदारी के साथ मनाएँ। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एक छोटा गणित
यदि 100 लोग होली के दिन केवल 50 लीटर अतिरिक्त पानी बचा लें, तो 100 × 50 = 5000 लीटर पानी बच सकता है। यदि एक शहर में 1 लाख लोग यह संकल्प लें तो-1,00,000 × 50 = 50 लाख लीटर पानी एक दिन में बच सकता है। सोचिए, पूरे देश में यदि यह संकल्प लिया जाए तो करोड़ों लीटर पानी बचाया जा सकता है।
होली का आनंद रंगों से है, पानी की बर्बादी से नहीं। आज जल संकट की चुनौती हमें सचेत कर रही है। आइए, इस बार होली पर संकल्प लें-
“रंगों से खेलेंगे, पानी नहीं बहाएँगे।
प्रकृति बचाएँगे, भविष्य सजाएँगे।”
सेव वाटर होली — यही समय की पुकार है।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


