छोटा सा मॉलिक्यूल बदल सकता है एलपीजी का खेल
कहीं पुणे की एक लैब में, दो मेथेनॉल के मॉलिक्यूल आपस में जुड़ रहे हैं। बीच से पानी का एक अणु हटता है और बनता है एक नया ईंधन। इस ईंधन का नाम डीएमई (DME) है। ये नाम सुनने में छोटा लगता है। वहीं, इसका असर बहुत बड़ा हो सकता है। आज सच ये है कि भारत अपनी रसोई के लिए भी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। हम जो LPG सिलेंडर इस्तेमाल करते हैं, उसका करीब 65% बाहर से आता है। उसमें से भी ज़्यादातर वेस्ट एशिया से हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
मतलब, आपके किचन का चूल्हा सिर्फ गैस से नहीं जलता। उसमें तेल के टैंकर, समुद्री रास्ते, जियोपॉलिटिक्स सब शामिल होते हैं। यही सबसे बड़ा रिस्क है। पिछले कुछ सालों में दुनिया ने साफ देखा है, जंग सिर्फ बॉर्डर नहीं बदलती, बल्कि सप्लाई चेन भी हिला देती है। यहीं पर इस नए खिलाड़ी DME की एंट्री होती है। कहानी थोड़ी साइंस वाली है, लेकिन आसान है। मेथेनॉल को, जो कोयले, बायोमास या आगे चलकर ग्रीन हाइड्रोजन और CO₂ से बन सकता है। एक खास कैटेलिस्ट के ऊपर 250-300 डिग्री तापमान पर गुज़ारा जाता है। दो मेथेनॉल मिलते हैं, एक पानी का मॉलिक्यूल निकलता है और DME बनता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
असली बात ये नहीं है कि ये कैसे बनता है। असली बात ये है कि ये काम कैसे करता है। DME, LPG की तरह ही सिलेंडर में भर सकता है। कोई नया चूल्हा नहीं चाहिए। कोई नया रेगुलेटर नहीं चाहिए। यानी, आपके घर में कुछ भी बदलने की ज़रूरत नहीं। नीली साफ़ लौ के साथ डीएमई जलता है। ना कालिख, ना सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड भी कम। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
अब असली गेम चेंजर
अगर भारत सिर्फ 8% DME को LPG में मिलाना शुरू कर दे, तो हर साल करीब 9,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बच सकती है। अगर ये 20% तक गया, जो कि स्टैंडर्ड्स में अलाउड है, तो बचत 23-24 हजार करोड़ रुपये तक पहुँच सकती है। ये कोई हवा-हवाई आंकड़े नहीं हैं। सीधी गणित हमारे इम्पोर्ट बिल की है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पर ये कहानी सिर्फ पैसे की नहीं है। LPG जब पूरी तरह नहीं जलती, तो वो काला धुआँ, ब्लैक कार्बन बनाती है। यही ब्लैक कार्बन हिमालय की बर्फ को तेज़ी से पिघलाने में बड़ा रोल निभाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
DME जलता है बिना कालिख के
डीएनई बिना कालिख के जलता है। इसका मतलब ये है कि किचन से निकलने वाला धुआँ सीधे-सीधे क्लाइमेट पर असर कम कर सकता है। अब सोचिए, अगर कल को यही DME पराली से बनने लगे। या ग्रीन हाइड्रोजन और CO₂ से। फिर वही सिलेंडर जो आज प्रदूषण का हिस्सा है, कल लगभग कार्बन-न्यूट्रल बन सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस कहानी में ट्विस्ट भी है। अभी DME सस्ता नहीं है। पायलट लेवल पर इसकी लागत LPG से ज़्यादा पड़ती है। इकोनॉमिक्स तभी सेट होंगे, जब बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू होगा। फिलहाल जो सबसे आसान रास्ता है, कोयले से DME बनाना। वो क्लाइमेट के लिए बहुत बड़ा गेम-चेंजर नहीं है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
क्या ये पूरा समाधान
अब सवाल उठता है कि क्या ये पूरा समाधान है। इसका जवाब नहीं में है। दूसरा सवाल ये है कि क्या ये एक ठोस शुरुआत है। इसका जवाब है- बिलकुल। अभी जो सबसे बड़ी बात समझने वाली है, वो ये है कि इस टेक्नोलॉजी के लिए नया इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं चाहिए, नया सिस्टम नहीं चाहिए, और न ही विदेशी लाइसेंस। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ये खोज पूरी तरह से भारतीय
ये खोज पूरी तरह भारतीय है। जो CSIR-NCL की लैब से निकली है। इंडियन ऑयल, ONGC जैसे खिलाड़ी इसके साथ जुड़ सकते हैं। कभी-कभी बड़े बदलाव, शोर मचाकर नहीं आते। बदलाव चुपचाप आते हैं। जैसे दो मॉलिक्यूल जुड़ते हैं, और बीच से पानी हट जाता है। DME वही पल हो सकता है। LPG संकट के बीच ये कोई जादुई हल नहीं है, लेकिन ये एक रास्ता है, जहाँ भारत… थोड़ा कम निर्भर, थोड़ा ज़्यादा मजबूत बन सकता है।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


