शिक्षिका विनीता डबराल की कविता- रिश्ते
रिश्ते
क्यों रिसते हैं ये रिश्ते
जान नहीं पाती हूँ
स्वप्न रुलाते हैं और
दिनभर गमगीन करते हैं
क्यूं रिसते हैं ये रिश्ते
दिनभर उधेड़ बुन में
यही जानने की कोशिश में
क्या गलत हुआ मुझसे
पर समझ नहीं पाती ,
क्यों रिसते हैं ये रिश्ते
भीड़ में भी अकेली हूँ
सब होते हुए भी
बेचारी हूँ
रिश्तों को खोजती रहती हूँ
पर अपना नहीं पाती, (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
क्यों रिसते हैं ये रिश्ते
इस एकान्त उदास जीवन में
हंसने का ढोंग करती ,
कोई जाने तो ये बता दे मुझे
क्यों हैं ये रिश्ते वेदना दायक
जान नहीं पाती हूं,
क्यों रिसते हैं ये रिश्ते
छोड़ नही पाती हूं।
कवयित्री का परिचय
विनीता डबराल
सहायक अध्यापक, राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय गुनियाल, विकास क्षेत्र जयहरीखाल, जिला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड।
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