मां माफ करना, तूझे बेटों ने बना दिया है ब्रांड, अपने साथ नहीं रख सकता, करता रहूंगा ब्रांडिंग-एक नालायक बेटा
हे मां अब माफ करना। क्योंकि मैं तेरी ऐसी नालायक औलाद हूं, जो तुझसे दूर रहता हूं। मैने भले ही तेरी सेवा नहीं की, लेकिन तूझे ब्रांड के तौर पर इस्तेमाल करना इस सदी में मैने सीख लिया है।
हे मां अब माफ करना। क्योंकि मैं तेरी ऐसी नालायक औलाद हूं, जो तुझसे दूर रहता हूं। मैने भले ही तेरी सेवा नहीं की, लेकिन तूझे ब्रांड के तौर पर इस्तेमाल करना इस सदी में मैने सीख लिया है। मुझे याद है कि बचपन में तूने मुझे अंगुली पकड़कर चलना सिखाया। मैं लड़खड़ाया तो तेरा दिल टूटा। आज बुढ़ापे में, जीवन के अंतिम पड़ाव में तुझे हाथ पकड़ने की जरूरत पड़ी, लेकिन मैं तुझसे दूर हूं। मैं तो देश और प्रदेश और अपने काम को समर्पित हूं। मैं तेरे पास नहीं आ सकता हूं। एक साल, दो साल या फिर पूरे पांच साल बाद में तेरे दर्शन के लिए आऊंगा। तेरे साथ खाना खाऊंगा। पैर छू कर तेरे आशीर्वाद लूंगा। ये फोटो ही तो मेरी ब्रांडिंग करेगी। मीडिया में सुर्खियां बनेंगी। वाहवाही होगी कि मैं मां से मिला। मुझे परवाह नहीं कि अपनी कम हो रही एक एक सांस के साथ इस बुढ़ापे को कैसे झेलती है। क्योंकि मैं तो तेरी नालायक औलाद हूं। मैं तूझे वृद्धाश्रम में रख सकता हूं। गांव में अकेला छोड़ सकता हूं। खुद पलायन किया, लेकिन गांवों से हो रहे पलायन में आंसू बहा सकता हूं। ऐसी सभी माताओं के लिए मदर्स डे पर ऐसे सभी नालायक बेटों की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं और प्रणाम।मां, अब तेरी भी ब्रांडिंग शुरू हो चुकी है। बेटा साथ रहे या ना रहे। सेवा करे या न करे, लेकिन तेरे नाम का सहारा लेकर अपना नाम चमकाने के लिए ब्रांडिंग जरूर करेगा। सेवा के नाम पर, नौकरी के नाम पर, धर्म के के नाम पर तूझसे दूर हो रहे बेटे को मां भले ही याद न रहे, लेकिन इस शब्द से ब्रांडिंग जरूर याद रहती है। इस सदी का दोष ही यही है। यदि बेटा बड़े प्रतिष्ठित पद पर बैठा बेटा तेरे दर्शन करते ही समाचार पत्रों की सुर्खियां बन जाता है। पर मां तूने तो ऐसे बेटे के पैदा होने पर इस तरह की कोई कल्पना शायद ही की हो। बेटे के घर में पत्नी, बच्चे समा सकते हैं, लेकिन तेरे लिए जगह नहीं है। ऐसे बेटे की ओर से मां तूझे प्रणाम। मुझे याद है कि जब नोटबंदी हुई, तब गांव के लोगों ने बताया कि तू भी बैंक की लाइन में खड़ी हुई और मेरी ब्रांडिंग होती रही।
फिर भी यदि मुझे अपने जन्मदिन पर समय मिला तो तेरे पास आकर अपनी फोटो जरूर खिंचवाऊंगा। पैर छूकर आशीर्वाद लेने की खबर, साथ खाना खाने की खबर। कितनी सारी खबर की मैं सुर्खियां बनूंगा और तू तो अपना आशीर्वाद दे ही दोगी। क्योंकि जब बेटा सामने होता है तो तू सारे दुख भूल जाती हो। ये मुझे पता है। चिंता मत कर मेरा इंतजार करते रहना। जैसे दस, बीस, तीस साल से कर रही हो। मैं तेरे पैस छूने जरूर आऊंगा। फिलहाल मैं तेरी पुरानी फोटो को ही मदर्स डे पर वायरल कर रहा हूं। ताकी सोशल मीडिया की इस भीड़ में मैं किसी से पीछे न रह जाऊं। वैसे तू तो गांव की भोली भाली महिला है। तूझे मदर्स डे का मतलब शायद पता भी न हो। एक- नायालक बेटा।
जब चिड़िया चुग गई खेत
मां शब्द में वाकई जादू है, ताकत है, हिम्मत है और हर समस्या का समाधान है। एक मां ही तो है जो अपनी औलाद को जिस सांचे में ढालना चाहे, ढाल सकती है। बच्चों की गलतियों को हमेशा वह क्षमा कर देती है। वह बच्चे की पहली गुरु होती है। उस मां का दर्जा सबसे बड़ा है। हो सकता है कि मदर्स डे के दिन कई ने अपनी मां को उपहार दिए हों। मां की उम्मीद के अनुरूप कार्य करने की कसमें खाई हों, लेकिन यह कसम दिन विशेष को ही क्यों खाने की परिपाटी बन रही है। इसके विपरीत मां तो बच्चे की खुशी के लिए कोई दिन नहीं देखती है और न ही समय। फिर हमें ही क्यों मां के सम्मान में मदर्स डे मनाने की आवश्यकता पड़ी। क्यों न हम भी हर दिन ही मदर्स डे की तरह मनाएं। क्योंकि मां के दर्द को जिसने नहीं समझा। उसके पास बाद में पछतावे के सिवाय कुछ नहीं बचता।
यह चिंतन भी जरूरी है कि हम अपनी मां को हर दिन कितना सम्मान देते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि साल भर उसकी बातों को तव्वजो तक नहीं देते। फिर एक दिन मां को खुश करने का दिखावा करने लगते हैं। अपने बचपन से लेकर बड़े होने तक मां की भूमिका और अपने व्यवहार में नजर डालें तो इसमें समय के साथ बदलाव नजर आएंगे। बचपन में बच्चा किसी दूसरे की बजाय अपनी मां की बातों पर ही ज्यादा विश्वास करता है। इसके बाद जब वह स्कूल जाने लगता है, तो वह गरु की बातों पर उसी तरह विश्वास करता है, जैसा मां की बातों पर करता था। बाद में यह स्थान मित्र का हो जाता है। फिर मां से बातें छिपाने की आदत औलाद पर पड़ने लगती है। तब औलाद अज्ञानवश मां को हर बात में यह कहने से नहीं चूकती कि- मां तू कुछ भी नहीं जानती। वे यह नहीं जानते कि मां ही पहली गुरु के साथ मित्र भी होती है। जो पहले हर अच्छी बुरी बात जानती थी, वह बच्चों के जवान होने पर कैसे अज्ञानी हो सकती है।
बात काफी पुरानी है। हमारे मोहल्ले में तीन भाइयों का संयुक्त परिवार रहता था। इन भाइयों की मां काफी वृद्धा थी। तब वृद्धा का करीब 18 साल का सबसे छोटा बेटा बीमार रहता था। इस गरीब परिवार के घर पानी का कनेक्शन तक नहीं था। ऐसे में वृद्धा हर सुबह हमारे घर पानी भरने आती थी। मां को हमेशा बेटों की ही चिंता सताती रहती थी, लेकिन बेटों को मैने कभी मां की चिंता करते नहीं देखा। पानी भरने के लिए उसके कई फेरे लगते थे। कभी-कभार उसका बीमार बेटा ही मां की पानी ढोने में मदद किया करता था। बाकि दो बेटों को शायद मां की उम्र की भी चिंता नहीं थी।
मां बेटों से कहती कि सत्तर साल की उम्र में अब पानी ढोना मुश्किल हो रहा है। घर मैं ही नल लगवा दो। बेटे पैसा न होने का तर्क देते। एक दिन लाचार मां का बीमार बेटा भी मर गया। अब इस मां का सहारा भी छिन गया। बेचारी मां भी टूट गई और एक साल बाद दुनिया से चल बसी। बेटों के सिर पर घर की जिम्मेदारी आने पर ही उन्हें अपनी मां के उस दर्द का अहसास हुआ, जो वह वर्षों से झेलती आ रही थी।
बेटों ने चार दिन पानी ढोना पड़ा तो मां याद आने लगी। एक दिन मेरे घर में उस परिवार का कोई सदस्य पानी लेने नहीं आया तो मेरे मन में अजीब सा ख्याल आया। सोचने लगा कि उनके घर में सब कुछ ठीक है या फिर वे किसी संकट में हैं। मेरे घर से उनका घर करीब पांच सौ मीटर दूर एक गली में था। दिल नहीं माना तो मैं उनके घर के निकट गया। पड़ोस से उनके बारे में पता किया। पता चला कि बेटों ने घर में पानी का कनेक्शन लगवा दिया। जिस मां के दर्द को वे महसूस नहीं करते थे, अपनी बारी आने पर वे बिलबिला उठे।
अब मोहल्ले के लोग कहते हैं कि मां के मरने के बाद दोनों भाई सुधर गए हैं। सुबह उठकर वे जब पूजा पाठ करते हैं तो मां की फोटो के आगे नतमस्तक होकर घंटी बजाते हैं। वहीं, लोग कहते हैं कि मां के मरने के बाद ऐसी पूजा किस काम की। जब चिड़िया खेत चुग गई, तो पछतावे से क्या होगा….
भानु बंगवाल




