कोरोना काल में मील का पत्थर साबित होगी समग्र स्वच्छता, परंपराएं व वर्तमान आवश्यकताः सोमवारी लाल सकलानी
स्वच्छता मनुष्य के कर्तव्यों में सर्वोच्च कर्तव्य है। यह हमें जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

सर्वोच्च कर्तव्य
स्वच्छता मनुष्य के कर्तव्यों में सर्वोच्च कर्तव्य है। यह हमें जीवन जीने की प्रेरणा देता है। तथा एक सामाजिक प्राणी होने का प्रमाण देता है। स्वच्छता के कारण मन प्रसन्न रहता है। तन स्वस्थ रहता है और बुद्धि का विकास होता है। स्वच्छता के कारण मनुष्य के मस्तिष्क में सकारात्मक सोच का विकास होता है। स्वच्छता से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और मन प्रफुल्लित रहने के कारण अनेक असाध्य बीमारियों से हम दूर रहते हैं।
आशय
स्वच्छता का आशय केवल शारीरिक स्वच्छता से ही नहीं बल्कि मानसिक, सामाजिक और पर्यावरणीय स्वच्छता से है जो कि समस्त प्राणी मात्र के लिए लाभकारी होती है। स्वच्छता के कारण आत्मा, मानव बुद्धि का विकास होता है। इसलिए जरूरी है कि हम शारीरिक स्वच्छता के साथ-साथ सामाजिक और पर्यावरणीय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। स्वस्थ रहने के लिए हम अपने शरीर के मैल तथा शरीर के अंदर का मल विसर्जन करते हैं, क्योंकि नीति में भी लिखा गया है-“सर्वरोग मलाश्रृते”।
मैल और मल का विसर्जन
मैल तथा मल के कारण शरीर और आत्मा दोनों पर प्रभाव पड़ता है । जिसके कारण स्वरूप अनेक विजातीय तत्वों के कारण पेट, त्वचा संबंधी रोग, आंख नाक गला, फेफड़े आदि के रोग उत्पन्न होते हैं। हमारा स्नायु तंत्र क्षीण हो जाता है। दांत दुर्बल पड़ जाते हैं। चेहरे का रंग भुने हुए बैंगन के समान हो जाता है। बाल सूखे और सिर खलघाट हो जाता है, जो कि हमारी लापरवाही और जीवन का मूल्य ना समझने के कारण होता है।
स्वच्छता जीवन शैली है
स्वच्छता के बारे में आदिकाल से ही चर्चा होती रही है। हमारे मनीषियों ,धर्म शास्त्रों और समाज सुधारकों ने हर समय स्वच्छ और स्वस्थ जीवन के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है और स्वच्छ वातावरण रखने का भरसक प्रयास भी किया है।
गरीबी ,अशिक्षा और धरती पर जनसंख्या के भार बढ़ जाने के कारण वातावरण दूषित होता गया जो कि एक भयानक महामारिओं का घर बनता गया। अनेक प्रकार के रोग और महामारी इस संसार में आई, जिसका मूल कारण अस्वच्छता, गंदगी, दूषित वातावरण था। स्वच्छता जीवन शैली है। जीवन को किस प्रकार से गुणवत्ता पूर्ण ढंग से जिया जाए, हम अपने घर, व्यवसाय, वातावरण, समाज और समुदाय को किस प्रकार से स्वच्छ रखें, यह हमारी सोच पर निर्भर करता है।
लापरवाही
पुराने जमाने (मध्य काल) में शिक्षा का विकास न होने के कारण स्वच्छता के प्रति लोगों ने लापरवाही बरती। जिसका परिणाम यह हुआ के अनेक प्रकार के असाध्य रोग जैसे हैजा, चेचक, बड़ी माता, छोटी माता, चर्म रोग, कुष्ठ आदि प्रकार की बीमारियां संसार में व्याप्त हो गई। जिसने मानव जाति ही नहीं, बल्कि प्राणी जगत का समय-समय पर व्यापक पैमाने पर संहार किया
वर्तमान
वर्तमान समय में कोरोना महामारी के बीच हम जी रहे हैं। इस बीमारी का भी एक मुख्य कारण अस्वच्छ और अस्वस्थ जीवन शैली का होना है। ईश्वर ने मनुष्य को शाकाहारी दांत दिए हैं, लेकिन हमने अपने मुंह के स्वाद के लिए मांस भक्षण शुरू किया। अनेक प्रकार के बेजुबान जानवरों को मार कर के उन्हें अपने स्वाद में सम्मिलित किया। जिनमें चमगादड़, सूअर, कूकर, सांप अनेक प्रकार के जलचर, थलचर, नभचर शामिल हैं ।
एक चमगादड़ के सूप पीने के कारण कोरोना जैसी महामारी पूरे संसार को लील रही है और विश्व युद्धों से ज्यादा मानव जाति का संहार कर रही है। इसके लिए उचित था कि हम अपने पौराणिक धर्म ग्रंथों का सहारा लेते जो कि समय-समय पर हमें आगाह करते रहे कि हमारा आहार – विहार उचित हो । हमारा विश्राम, व्यायाम सुनियोजित हो। हम सदा सकारात्मक सोच के साथ जियें और स्वस्थ मनोरंजन करें।
उपाय
स्वच्छता बीमारियों से बचने का सबसे अच्छा माध्यम है। हमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक रूप से स्वस्थ जीवन जीना चाहिए। हम मंदिरों में जाते हैं, धार्मिक स्थलों में जाते हैं, सार्वजनिक स्थलों में जाते हैं तीर्थाटन और पर्यटन करते हैं, लेकिन स्वच्छता का ध्यान नहीं रखते हैं। कूड़ा करकट अपबिष्ट आदि इर्द-गिर्द फेंक देते हैं। जिसके कारण पर्यावरण दूषित होता है। हमारे जलस्रोत गंदे होते हैं। वातावरण में गंदगी फैलती है और कभी-कभी बीमारियों के रूप में यह जानलेवा हो जाता है। शैक्षिक स्तर सुधर जाने के कारण तथा शासकीय प्रबंधन के कारण आज लगभग “खुले में शौच” की व्यवस्था समाप्त हो चुकी है, लेकिन कूड़ा निस्तारण और अपविष्ट पदार्थों को इर्द-गिर्द फेंकने में हम आज भी संवेदनशील नहीं हैं ।
महापाप
अपने घर का कूड़ा दूसरे के घर के समीप डालना या बिखेरना सबसे बड़ा महा पाप है। हम सरकार के बनाए हुए नियमों का पालन करें और स्वयं कानून बनाने वाले लोग भी यह नियमों का पालन करें। सबसे बड़ा दुर्भाग्य हमारे देश का यह है कि हम लोग कानूनों का पालन करने में भी तौहीन महसूस करते हैं। ना हम इनका अक्षरश पालन करते हैं और उनका आदर करते हैं। जिसके कारण कभी-कभी हमें हानि उठानी पड़ती है और कभी-कभी संपूर्ण मानवता के लिए प्राणी जगत के लिए यह जानलेवा भी हो जाया हैं।
सर्वोच्च प्राथमिकता
जैसे कि बताया गया है कि स्वच्छता हमारा सर्वोच्च कर्तव्य होना चाहिए। कोरोना महामारी के बीच हमें अपने शरीर, हाथों, नाखून, किचन, आंगन, घर, परिवेश, बाजार, दुकान, सार्वजनिक स्थल आदि को स्वच्छ बनाए रखना चाहिए ।
हमेशा किचन में जो हमारा कपड़ा रहता है जिसको (हनबीडा) कहते हैं, उसको बदलते रहें। तौलीया स्वच्छ होना चाहिए और बदलना चाहिए। बेडशीट हफ्ते में अवश्य धूलें, दूषित जल को ग्रहण नहीं करना चाहिए। इसे उबालकर पिएं।
स्वच्छता संस्कृति का प्रतीक
अनेकों संक्रामक बीमारियों से बचने के लिए हम सार्वजनिक स्थलों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान रखें ।बच्चे और बड़ों का विशेष ख्याल रखें। स्वच्छता हमारी संस्कृति का प्रतीक है। स्वच्छ वातावरण में जीवन जीने से आयु बढ़ती है। मनुष्य का शरीर और आत्मा दोनों स्वस्थ और सुंदर रहते हैं। इसके लिए हमें छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना चाहिए।
फर्ज नहीं निभाया
कोरोना महामारी का दूसरा चरण विकराल रूप लिए हुए हैं। यह हमारी लापरवाही का कारण है। पिछले वर्ष जब शारीरिक दूरी बना करके हमने जीवन जिया तो इसके अच्छे परिणाम देखने को मिले। इस बार हम उन नियमों को भूल गए, जिसके कारण यह संक्रामक बीमारी फैलती गई और कमोबेश हर क्षेत्र आज इससे प्रभावित है। मृत्यु दर बढ़ती जा रही है। मनुष्य के मन मस्तिष्क पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है । हमारे राजनेता ,सामाजिक व्यक्ति और बुद्धिजीवी भी इस बीमारी के प्रति लापरवाह बने रहे। सामाजिक दूरी बनाए बिना सभा, गोष्टी और सम्मेलनों में मशगूल रहे। जिसका परिणाम यह हुआ किया छूत की बीमारी आज अपने उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी हैं। युवा वर्ग मानसिक अवसाद में जी रहा है। बुजुर्ग व्यक्ति आने वाली पीढ़ी के भविष्य के बारे में चिंतित हैं। मजदूर वर्ग को खाने के लाले पड़ रहे हैं। यह स्थिति क्यों और कैसे उत्पन्न हुई ? इसके कारक हम स्वयं है। हमने कुछ अपना फर्ज नहीं निभाया और कुछ लापरवाही की ।
हम जिम्मेदार
वातावरण को प्रदूषित बनाने में हमारा सबसे बड़ा योगदान है। कहने के लिए तो हम मानव हैं, लेकिन हमारा व्यवहार दानवों से भी बदतर है यदि इंसान बनना है तो इंसानियत से जीना भी सीखना होगा। स्वच्छता का ध्यान रखना है। जीवन को स्वस्थ बनाना है। मनोबल ऊंचा रखते लापरवाही से हटकर स्वच्छता के प्रति अपने फर्ज को निभाना है । इसी में जीवन का शाश्वत मोक्ष छुपा है।
इतिहास से सीख लें-स्वच्छता अनुशासन
हमारे बुजुर्ग स्वच्छता के प्रति सदैव संवेदनशील रहे हैं। स्वच्छता के महत्व को समझते हुए उन्होंने अनेक नियम बनाए, जो “स्वच्छता अनुशासन” के रूप में आज भी प्रचलित हैं। उन्होंने “छौं होना ” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जो आज भी सामूहिक भोज आदि में पर्वतीय क्षेत्रों की परंपरा मे बरकरार हैं। हजारों लोगों को मात्र एक या दो रसोईया (सरोले ) शांतिपूर्ण ढंग से भोजन बना कर करा देते हैं। जब तक अंतिम व्यक्ति भोजन नहीं कर लेता, तब तक कोई खड़ा नहीं उठता है। पत्तलों को इकट्ठा करके एक स्थान पर डाल कर के नष्ट किया जाता है। एक पंक्ति के उठने पर गोबर और पानी का छिड़काव किया जाता है तथा झाड़ू लगाया जाता है। तब दूसरी पंक्ति को बैठाया जाता है। सरोला के पास कोई व्यक्ति नहीं जाता। जूते उतारकर के भोजन करना पड़ता है। जिस प्रकार से हमें सीख लेनी चाहिए। यही हमारे शिक्षित होने का और सभ्य होने का प्रतीक है। नकल की प्रवृति से आज तक कोई भला नहीं हुआ है।
स्वच्छता के साथ जिजीविषा बनाएं रखें
गांधी जी ने जब प्रथम बार स्वच्छता के बारे में चंपावत से प्रयोग शुरू किया तो उस समय भी गंदगी के कारण अनेक प्रकार की बीमारियों से लोग पीड़ित थे। महिलाओं की बुरी दशा थी। मात्र तीन प्रकार की दवाइयां वह समय प्रचलित थी। कास्टिक , कुनैन और गंधक। आज अनेक प्रकार के औषधियां उपलब्ध है, लेकिन समय-समय पर बीमारियां भी नई-नई उत्पन्न होती जा रही हैं। हैजा, चेचक, प्लेग, खसरा, मलेरिया, टी बी, कुष्ट आदि रोगों पर हमने नियंत्रण पा लिया है। इसी प्रकार अवश्य हम “कोरोना की जंग” भी जीत जाएंगे। आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वच्छता के प्रति पूर्ण रूप से संवेदनशील रहे। स्वच्छ जीवन ही स्वस्थ जीवन की गारंटी है।
लेखक का परिचय
कवि एवं साहित्यकार-सोमवारी लाल सकलानी, निशांत ।
स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर, नगर पालिका परिषद चंबा, टिहरी गढ़वाल।
निवास- सुमन कॉलोनी चंबा टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड।




निशांत जी ने सुन्दर लेख लिखा है