धान के खेत में बत्तख पालन से जैविक खेती, किसानों को चौतरफा लाभ, मालामाल होने का सटीक तरीका
ये खबर उन किसानों के लिए है, जो धान की खेती करते हैं। वे धान के खेत में बत्तख पालन से चौतरफा लाभ कमा सकते हैं। हो सकता है कि ज्यादा किसान अभी इस तरीके से की जा रही खेती से नहीं जुड़े हैं, तो ऐसे लोग इस तरीके को अपना सकते हैं। अब आपके मन में सवाल उठेगा कि बत्तख तो खेती को नुकसान पहुंचा देगी। हकीकत में ऐसा नहीं है। बत्तख से पैदावार और अधिक बढ़ जाएगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एक प्रचीन और जैविक खेती की तकनीक
धान के खेत में बत्तख पालना (राइस-डक फार्मिंग) एक प्राचीन और जैविक खेती तकनीक है। इसमें बत्तखें कीटनाशकों और उर्वरकों का प्राकृतिक विकल्प बनती हैं। ये कीड़ों और खरपतवार को खाती हैं, जबकि उनका मल (बीट) मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। इससे उत्पादन में बढ़ोतरी और रसायनों में कमी आती है। यह विधि टिकाऊ कृषि और अतिरिक्त आय का अच्छा साधन है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
किसानों को बड़ा फायदा
वैज्ञानिक विधि से बत्तख पालन (Duck farming) से किसानों को बड़ा फायदा होता है। एक रिसर्च के मुताबिक किसान राइस डक टेक्नोलॉजी से धान की खेती करके ज्यादा लाभ पा सकते हैं। केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान कटक के सहयोग से ओडिसा में बतख धान एकीकरण खेती की शुरुआत की गई थी। ब्रीडिंग के बाद बत्तखों को धान की कटाई से एक महीने पहले तक खेत में चरने की अनुमति दी जाती है। बत्तखें धान के खेतों में रोजाना 5-6 घंटे रहती हैं। इससे धान की उत्पादकता में 20 प्रतिशत वृद्धि देखने को मिली है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
धीरे धीरे किसान अपना रहे हैं ये तकनीक
ओडिशा के बाद झारखंड, यूपी सहित कई राज्यों में किसान बत्तखों को धान की खेती में शामिल करना भी शुरू किया है। बत्तख पालन से किसानों की अच्छी कमाई हो रही है। साथ ही उसको धान की खेती में शामिल करने से कई बेहतरीन शोध परिणाम मिले हैं। बत्तख पालन के लिए घास के मैदान और तालाबों को प्राकृतिक संसाधनों के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। कटाई के बाद धान का खेत बत्तखों के लिए उत्कृष्ट चारा प्रणाली का एक साधन प्रदान करता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम
इसके अलावा, तालाबों, नदियों, नहरों, घरों और अन्य जल निकायों जैसे विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र भी लाभ प्रदान करते हैं। बत्तख के लिए धान के गिरे हुए अनाज, कीड़े, घोंघे, केंचुए, छोटी मछलियां और शैवाल जैसे जल पौधे आदि सस्ते प्राकृतिक चारा संसाधनों के उपयोग किए जाते हैं। बत्तख चावल के खेतों में कीड़ों, घोंघों, खरपतवारों को खाकर साफ करते हैं। वे धान के खेतों को खाद के रूप में अपने मलमूत्र से समृद्ध करते हैं। इसलिए इनके जरिये रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को कम भी किया जा सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कम हो जाते हैं खरपतवारबत्तखों के कारण पानी की हलचल और पानी के अशांत होने पर प्रकाश संश्लेषण में कमी के माध्यम से खरपतवारों मे कमी आती है। उनकी गतिविधियां धान की जड़, डंठल और पत्ती के विकास को भी बढ़ाती हैं। इससे नाइट्रोजन की उपलब्धता में वृद्धि के कारण फसल की वृद्धि में तेजी आती है। फास्फोरस और पोटाश में भी वृद्धि होती है। लगभग 200-300 बत्तख एक हेक्टेयर धान के खेत के लिए उपयुक्त हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
किसानों की आय में वृद्धि
राइस डक टेक्नोलॉजी से चावल की खेती पहले मीथेन उत्सर्जन में कमी का कारण बनती है और बाद में ग्लोबल वार्मिंग में। केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक के सहयोग से बतख चावल एकीकरण की शुरुआत से किसानों की आय में वृद्धि हुई। धान से किसान की कमाई में 50 फीसदी तक का लाभ पहुंचा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस डक टेक्नोलॉजी के मुख्य लाभ
प्राकृतिक कीटनाशक: बत्तखें धान को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों, घोंघों और खरपतवार को खाकर नष्ट कर देती हैं।
जैविक खाद: बत्तखों की बीट (मल) में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम की उच्च मात्रा होती है, जो पौधों के लिए उत्तम खाद का काम करती है।
मिट्टी की जुताई: बत्तखें पानी में तैरते हुए अपनी चोंच से मिट्टी को कुरेदती हैं, जिससे मिट्टी में ऑक्सीजन का संचार (aeration) बढ़ता है और जड़ें मजबूत होती हैं।
अतिरिक्त आय: किसान धान के साथ-साथ बत्तखों के अंडे और मांस बेचकर दोगुना मुनाफा कमा सकते हैं।
पर्यावरण के अनुकूल: रसायनों का उपयोग कम होने से पर्यावरण और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है।
तकनीक और प्रबंधन:
कब छोड़ें: बत्तखों को धान की रोपाई के कुछ दिनों बाद (जब पौधे थोड़े बड़े हो जाएं) खेत में छोड़ा जाता है, आमतौर पर प्रति हेक्टेयर 200-300 बत्तखों का पालन किया जा सकता है।
नस्ल का चयन: धान के खेतों के लिए ‘इंडियल रनर’ जैसी सक्रिय नस्लें बेहतर मानी जाती हैं। यह एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System) न केवल लागत कम करती है, बल्कि कीटनाशकों के उपयोग को खत्म करके धान की जैविक खेती को बढ़ावा देती है।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।



