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September 30, 2022

गणेश चतुर्थी पर्व आज, जानिए शुभ मुहूर्त, ऐसे करें पूजा, अर्पित करें ये वस्तुएं, राशि के मुताबिक करें पूजा, पढ़ें कथाएं

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आज गणेश चतुर्थी है। इस दिन भगवान गणेश की विधिवत पूजा-अर्चना कर उनसे बुद्धि, सौभाग्य और समृद्धि की प्रर्थना की जाती है। गणेश चतुर्थी महोत्सव पूरे 10 दिन तक चलता है। दसवें दिन अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति का विसर्जन किया जाता है। ऐसे में आज से गणेश महोत्सव की भी शुरुआत हो रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने 2 गणेश चतुर्थी पड़ती है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण की दोनों ही चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित है। भाद्रपद मास की अमावस्या के बाद आने वाली गणेश चतुर्थी का बेहद खास महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन धूमधाम के गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

ये है शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, इस बार गणेश चतुर्थी 31 अगस्त, बुधवार को यानी आज है। चतुर्थी तिथि की शुरुआत 30 अगस्त को शाम 3 बजकर 33 मिनट से शुरू हो चुकी है। वहीं चतुर्थी तिथि की समाप्ति 31 अगस्त 2022 को शाम 3 बजकर 22 मिनट पर होगी। भगवान गणेश की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 24 मिनट से दोपहर 1 बजकर 54 मिनट तक है। वहीं गणेश जी की प्रतिमा विसर्जन की तारीख 09 सितंबर है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इस बार बन रहे हैं ये खास योग
रवि योग- सुबह 6 बजकर 23 मिनट से 01 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 12 मिनट तक
विजय मुहूर्त- रात 12 बजकर 44 मिनट से रात 3 बजकर 34 मिनट तक है।
निशिता मुहूर्त- 1 सितंबर को सुबह 12 बजकर 16 मिनट से 1 बजकर 02 मिनट तक है।
गणेश चतुर्थी 2022 गणपति स्थापना मंत्र
गणेश चतुर्थी के दिन गणपति देवता की स्थापना करते समय इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
अस्य प्राणा प्रतिष्ठन्तु अस्य प्राणा: क्षरन्तु च. श्री गणपति त्वं सुप्रतिष्ठ वरदे भवेताम. गणेशपूजने कर्म यत् न्यूनमधिकम कृतम. तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्न अस्तु गणपति सदा मम। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

भगवान गणपति को अर्पित करें ये खास चीज
गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को दूर्वा जरूर अर्पित करें। दरअसल भगवान गणेश को दूर्वा घास बेहद प्रिय है। ऐसे में इस दिन दूर्गा को गंगाजल से शुद्ध करके उसकी माला बनाकर भागवान को अर्पित कर सकते हैं। गणेश जी को मोदक बेहद प्रिय है। ऐसे में भगवान गणेश को तरह तरह के मोदक का भोग लगा सकते हैं। भगवान गणेश को केला भी बेहद प्रिय है। केला अर्पित करने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। गणपति को सिंदूर भी अर्पित किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में सिंदूर को मंगल का प्रतीक माना जाता है। इसलिए गणेश चतुर्थी के दौरान भगवान गणेश को सिंदूर जरूर अर्पित करें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

राशि के अनुसार ऐसे करें पूजा
मेषः मेष राशि के जातक को भगवान गणेश के व्रकतुंड स्वरूप की पूजा करनी चाहिए और वक्रतुण्डाय महामंत्र का जाप करना चाहिए। साथ ही इन्हें गुण का भोग लगाना चाहिए।
वृषः वृष राशि के जातक गणए चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के शक्ति विनायक स्वरूप की पूजा करें और ‘ऊं हीं ग्रीं हीं’ मंत्र का जप करें। साथ ही इस दिन आप घी में मिश्री मिलाकर भोग लगाएं।
मिथुनः मिथुन राशि के जातक गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की लक्ष्मी जी के साथ पूजा करें और ‘ऊं गं गणपतये नमः मंत्र’ का जाप करें। इस दिन आप मूंग के लड्डू का भोग लगाएं।
कर्कः कर्क राशि के जातक इस दिन भगवान गणेश के मोदक स्वरूप की पूजा करें और वक्रतुण्ड मंत्र का जप करें। आप इस दिन मोदक का भोग लगाएं।
सिंहः सिंह राशि के जातक इस दिन गणेश जी के साथ लक्ष्मी जी की पूजा करे और ‘ऊं गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करें। आप इस दिन किशमिश का भोग लगाएं।
कन्याः आप इस दिन संकष्टी गणेश की पूजा करें और गणेश चालीसा का पाठ करें। कन्या राशि के जातक के जातक इस दिन सुखे मेवे का भोग लगाएं।
तुलाः तुला राशि के जातक इस दिन सिद्धि विनायक गणेश की पूजा करें और उन्हें नारियल का भोग लगाएं। आप इस दिन ‘ऊं गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करें।
वृश्चिकः वृश्चिक राशि के जातक गणेश चतुर्थी के दिन श्वेतार्क गणेश की पूजा करें और गणेश स्तुति का पाठ करें। आप इस दिन बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
धनुः धनु राशि के जातक गणेश चतुर्थी के दिन वक्रतुण्ड स्वरूप की पूजा करनी चाहिए और उन्हें मोतीचूर की लड्डू का भोग लगाएं।
मकरः आप गणेश चतुर्थी के दिन शक्ति विनायक की पूजा करें और ‘ऊं गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करें। साथ ही इस दिन उन्हें इलायची और लौंग अर्पित करें।
कुंभः कुंभ राशि के जातक को भगवान गणेश के शक्तिविनायक स्वरूप की पूजा करें और ऊं गण मुक्तये फट् मंत्र का जाप करें। आप इस दिन भगवान गणेश को सूखे मेवे का भोग लगाएं।
मीनः मीन राशि के जातक गणेश जन्मोत्सव के दिन हरिद्रा गणेश की पूजा करें और मोतीचूर का भोग लगाएं। इस दिन आपको ‘गजाननं भूत गणादि सेवितं’ का जाप करें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ये है पौराणिक कथा
शिवपुराण के अन्तर्गत रुद्रसंहिताके चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वार पाल बना दिया। शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिवगणोंने बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। इससे भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

शिवजी के निर्देश पर विष्णुजीउत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गज मुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को अ‌र्घ्य देकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। वर्ष पर्यन्त श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

दूसरी कथा
एक बार महादेवजी, पार्वती सहित नर्मदा के तट पर गए। वहाँ एक सुंदर स्थान पर पार्वती जी ने महादेवजी के साथ चौपड़ खेलने की इच्छा व्यक्त की। तब शिवजी ने कहा- हमारी हार-जीत का साक्षी कौन होगा? पार्वती ने तत्काल वहाँ की घास के तिनके बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उससे कहा- बेटा ! हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, किन्तु यहाँ हार-जीत का साक्षी कोई नहीं है। अतः खेल के अन्त में तुम हमारी हार-जीत के साक्षी होकर बताना कि हममें से जीता, कौन हारा? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

खेल आरंभ हुआ। दैवयोग से तीनों बार पार्वती जी ही जीतीं। जब अंत में बालक से हार-जीत का निर्णय कराया गया तो उसने महादेवजी को विजयी बताया। परिणामतः पार्वती जी ने क्रुद्ध होकर उसे एक पाँव से लंगड़ा होने और वहाँ के कीचड़ में पड़ा रहकर दुःख भोगने का श्राप दे दिया। बालक ने विनम्रतापूर्वक कहा- माँ! मुझसे अज्ञानवश ऐसा हो गया है। मैंने किसी कुटिलता या द्वेष के कारण ऐसा नहीं किया। मुझे क्षमा करें तथा शाप से मुक्ति का उपाय बताएँ। तब ममतारूपी माँ को उस पर दया आ गई और वे बोलीं- यहाँ नाग-कन्याएँ गणेश-पूजन करने आएँगी। उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे। इतना कहकर वे कैलाश पर्वत चली गईं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

एक वर्ष बाद वहाँ श्रावण में नाग-कन्याएँ गणेश पूजन के लिए आईं। नाग-कन्याओं ने गणेश व्रत करके उस बालक को भी व्रत की विधि बताई। तत्पश्चात बालक ने 12 दिन तक श्रीगणेशजी का व्रत किया। तब गणेशजी ने उसे दर्शन देकर कहा- मैं तुम्हारे व्रत से प्रसन्न हूँ। मनोवांछित वर माँगो। बालक बोला- भगवन! मेरे पाँव में इतनी शक्ति दे दो कि मैं कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास पहुँच सकूं और वे मुझ पर प्रसन्न हो जाएँ। गणेशजी ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्धान हो गए। बालक भगवान शिव के चरणों में पहुँच गया। शिवजी ने उससे वहाँ तक पहुँचने के साधन के बारे में पूछा। तब बालक ने सारी कथा शिवजी को सुना दी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

उधर उसी दिन से अप्रसन्न होकर पार्वती शिवजी से भी विमुख हो गई थीं। तदुपरांत भगवान शंकर ने भी बालक की तरह 21 दिन पर्यन्त श्रीगणेश का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पार्वती के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई। वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुँची। वहाँ पहुँचकर पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- भगवन! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ गई हूँ। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

शिवजी ने ‘गणेश व्रत’ का इतिहास उनसे कह दिया। तब पार्वतीजी ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिन पर्यन्त 21-21 की संख्या में दूर्वा, पुष्प तथा लड्डुओं से गणेशजी का पूजन किया। 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं ही पार्वतीजी से आ मिले। उन्होंने भी माँ के मुख से इस व्रत का माहात्म्य सुनकर व्रत किया। कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्रजी को बताया। विश्वामित्रजी ने व्रत करके गणेशजी से जन्म से मुक्त होकर ‘ब्रह्म-ऋषि’ होने का वर माँगा। गणेशजी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की। ऐसे हैं श्री गणेशजी, जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

तीसरी कथा
एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गए। उनके जाने के पश्चात पार्वती ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम ‘गणेश’ रखा। पार्वती ने उससे कहा- हे पुत्र! तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ। मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ। जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिवजी आए तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया। इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गए। पार्वती ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया। तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा- यह दूसरा थाल किसके लिए हैं? पार्वती जी बोलीं- पुत्र गणेश के लिए हैं, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुए। तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया। यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुःखी हुईं। वे विलाप करने लगीं। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया।[7] यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी। इसीलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।

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